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altaf bayan hon kab ham se ai jaan tumhari surat ke hain lakhon apni ankhon par ehsan tumhari surat ke munh dekhe ki ye baat nahin sach puchho to ab duniya men behosh kare hain pariyon ko insan tumhari surat ke aina-rukhon ki mahfil men jis vaqt ayaan tum hote ho sab aaina saan rah jaate hain hairan tumhari surat ke kuchh kahne par mauquf nahin maalum abhi ho javega khurshid muqabil ho dekhe ik aan tumhari surat ke ki arz 'nazir' ik bose ki jab hans kar chanchal bola yuun is munh se bosa lijiyega qurban tumhari surat ke altaf bayan hon kab hum se ai jaan tumhaari surat ke hain lakhon apni aankhon par ehsan tumhaari surat ke munh dekhe ki ye baat nahin sach puchho to ab duniya mein behosh kare hain pariyon ko insan tumhaari surat ke aaina-rukhon ki mahfil mein jis waqt ayan tum hote ho sab aaina san rah jate hain hairan tumhaari surat ke kuchh kahne par mauquf nahin malum abhi ho jawega khurshid muqabil ho dekhe ek aan tumhaari surat ke ki arz 'nazir' ek bose ki jab hans kar chanchal bola yun is munh se bosa lijiyega qurban tumhaari surat ke

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

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हर आन तुम्हारे छुपने से ऐसा ही अगर दुख पाएँगे हम तो हार के इक दिन इस की भी तदबीर कोई ठहराएँगे हम बेज़ार करेंगे ख़ातिर को पहले तो तुम्हारी चाहत से फिर दिल को भी कुछ मिन्नत से कुछ हैबत से समझाएँगे हम गर कहना दिल ने मान लिया और रुक बैठा तो बहत्तर है और चैन न लेने देवेगा तो भेस बदल कर आएँगे हम अव्वल तो नहीं पहचानोगे और लोगे भी पहचान तो फिर हर तौर से छुप कर देखेंगे और दिल को ख़ुश कर जाएँगे हम गर छुपना भी खुल जावेगा तो मिल कर अफ़्सूँ-साज़ों से कुछ और ही लटका सेहर-भरा उस वक़्त बहम पहुँचाएँगे हम जब वो भी पेश न जावेगा और शोहरत होवेगी फिर तो जिस सूरत से बन आवेगा तस्वीर खिंचा मंगवाएँगे हम मौक़ूफ़ करोगे छुपने को तो बेहतर वर्ना 'नज़ीर' आसा जो हर्फ़ ज़बाँ पर लाएँगे फिर वो ही कर दिखलाएँगे हम

Nazeer Akbarabadi

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