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अपनी मजबूरी बताता रहा रो कर मुझ को वो मिला भी तो किसी और का हो कर मुझ को मैं ख़ुदा तो नहीं जो उस को दिखाई न दिया ढूँढ़ता मेरा पुजारी कभी खो कर मुझ को पा लिया जिस ने तह-ए-आब भी अपना साहिल मुतमइन था मिरा तूफ़ान डुबो कर मुझ को रेग-ए-साहिल पे लिखी वक़्त की तहरीर हूँ मैं मौज आए तो चली जाएगी धो कर मुझ को नींद ही जैसे कोई कुंज-ए-अमाँ है अब तो चैन मिलता है बहुत देर से सो कर मुझ को फ़स्ल-ए-गुल हो तो निकाले मुझे इस बर्ज़ख़ से भूल जाए न तह-ए-संग वो बो कर मुझ को

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा

Hasan Abbasi

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इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ

Mehshar Afridi

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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इस क़दर भी तो न जज़्बात पे क़ाबू रक्खो थक गए हो तो मिरे काँधे पे बाज़ू रक्खो भूलने पाए न इस दश्त की वहशत दिल से शहर के बीच रहो बाग़ में आहू रक्खो ख़ुश्क हो जाएगी रोते हुए सहरा की तरह कुछ बचा कर भी तो इस आँख में आँसू रक्खो रौशनी होगी तो आ जाएगा रह-रव दिल का उस की यादों के दिए ताक़ में हर-सू रक्खो याद आएगी तुम्हारी ही सफ़र में उस को उस के रूमाल में इक अच्छी सी ख़ुश्बू रक्खो अब वो महबूब नहीं अपना मगर दोस्त तो है उस से ये एक तअ'ल्लुक़ ही बहर-सू रक्खो

Iftikhar Naseem

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लगेगा अजनबी अब क्यूँ न शहर भर मुझ को बचा गया है नज़र तू भी देख कर मुझ को मैं घूम फिर के उसी सम्त आ निकलता हूँ जकड़ रही है तिरे घर की रहगुज़र मुझ को झुलस रहा है बदन ज़ेर-ए-साया-ए-दीवार बुला रहा है कोई दश्त-ए-बे-शजर मुझ को मैं संग-दिल हूँ तुझे भूलता ही जाता हूँ मैं हँस रहा हूँ तो मिल के उदास कर मुझ को मैं देखता ही रहूँगा तुझे किनारे से तू ढूँढ़ता ही रहेगा भँवर भँवर मुझ को बनी हैं तुंद हवाओं की ज़र्द दीवारें उड़ा रहा है मगर शो'ला-ए-सफ़र मुझ को बना दिया है निडर ज़िद्दी ख़्वाहिशों ने 'नसीम' ख़ुद ए'तिमाद न था अपने आप पर मुझ को

Iftikhar Naseem

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ख़ुद को हुजूम-ए-दहर में खोना पड़ा मुझे जैसे थे लोग वैसा ही होना पड़ा मुझे दुश्मन को मरते देख के लोगों के सामने दिल हँस रहा था आँख से रोना पड़ा मुझे कुछ इस क़दर थे फूल ज़मीं पर खिले हुए तारों को आसमान में बोना पड़ा मुझे ऐसी शिकस्त थी कि कटी उँगलियों के साथ काँटों का एक हार पिरोना पड़ा मुझे कारी नहीं था वार मगर एक उम्र तक आब-ए-नमक से ज़ख़्म को धोना पड़ा मुझे आसाँ नहीं है लिखना ग़म-ए-दिल की वारदात अपना क़लम लहू में डुबोना पड़ा मुझे इतनी तवील ओ सर्द शब-ए-हिज्र थी 'नसीम' कितनी ही बार जागना सोना पड़ा मुझे

Iftikhar Naseem

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लिबास-ए-ख़ाक सही पर कहीं ज़रूर हूँ मैं बता रही है चमक आँख की कि नूर हूँ मैं कोई नहीं जो मिरी लौ से रास्ता देखे हवा-ए-तुंद बुझा दे तिरे हुज़ूर हूँ मैं पनाह देता नहीं कोई और सय्यारा भटक रहा हूँ ख़ला में ज़मीं से दूर हूँ मैं न हो गिरा के मुझे तू भी ख़ाक में मिल जाए मुझे गले से लगा ले तिरा ग़ुरूर हूँ मैं निकल पड़ा हूँ यूँँही इतनी बर्फ़-बारी में बदन के गर्म लहू का अजब सुरूर हूँ मैं सज़ा भी काट चुका हूँ मैं जिस ख़ता की 'नसीम' किसे पुकारूँ कहूँ इस में बे-क़ुसूर हूँ मैं

Iftikhar Naseem

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न जाने कब वो पलट आएँ दर खुला रखना गए हुए के लिए दिल में कुछ जगह रखना हज़ार तल्ख़ हों यादें मगर वो जब भी मिले ज़बाँ पे अच्छे दिनों का ही ज़ाइक़ा रखना न हो कि क़ुर्ब ही फिर मर्ग-ए-रब्त बन जाए वो अब मिले तो ज़रा उस से फ़ासला रखना उतार फेंक दे ख़ुश-फ़हमियों के सारे ग़िलाफ़ जो शख़्स भूल गया उस को याद क्या रखना अभी न इल्म हो उस को लहू की लज़्ज़त का ये राज़ उस से बहुत देर तक छुपा रखना कभी न लाना मसाइल घरों के दफ़्तर में ये दोनों पहलू हमेशा जुदा जुदा रखना उड़ा दिया है जिसे चूम कर हवा में 'नसीम' उसे हमेशा हिफ़ाज़त में ऐ ख़ुदा रखना

Iftikhar Naseem

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