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इस क़दर भी तो न जज़्बात पे क़ाबू रक्खो थक गए हो तो मिरे काँधे पे बाज़ू रक्खो भूलने पाए न इस दश्त की वहशत दिल से शहर के बीच रहो बाग़ में आहू रक्खो ख़ुश्क हो जाएगी रोते हुए सहरा की तरह कुछ बचा कर भी तो इस आँख में आँसू रक्खो रौशनी होगी तो आ जाएगा रह-रव दिल का उस की यादों के दिए ताक़ में हर-सू रक्खो याद आएगी तुम्हारी ही सफ़र में उस को उस के रूमाल में इक अच्छी सी ख़ुश्बू रक्खो अब वो महबूब नहीं अपना मगर दोस्त तो है उस से ये एक तअ'ल्लुक़ ही बहर-सू रक्खो

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इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ

Mehshar Afridi

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ कुछ तो मिरे पिंदार-ए-मोहब्बत का भरम रख तू भी तो कभी मुझ को मनाने के लिए आ पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो रस्म-ओ-रह-ए-दुनिया ही निभाने के लिए आ किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम तू मुझ से ख़फ़ा है तो ज़माने के लिए आ इक उम्र से हूँ लज़्ज़त-ए-गिर्या से भी महरूम ऐ राहत-ए-जाँ मुझ को रुलाने के लिए आ अब तक दिल-ए-ख़ुश-फ़हम को तुझ से हैं उम्मीदें ये आख़िरी शमएँ भी बुझाने के लिए आ

Ahmad Faraz

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अश्क ज़ाएअ'' हो रहे थे देख कर रोता न था जिस जगह बनता था रोना मैं उधर रोता न था सिर्फ़ तेरी चुप ने मेरे गाल गीले कर दिए मैं तो वो हूँ जो किसी की मौत पर रोता न था मुझ पे कितने सानहे गुज़रे पर इन आँखों को क्या मेरा दुख ये है कि मेरा हम-सफ़र रोता न था मैं ने उस के वस्ल में भी हिज्र काटा है कहीं वो मिरे काँधे पे रख लेता था सर रोता न था प्यार तो पहले भी उस से था मगर इतना नहीं तब मैं उस को छू तो लेता था मगर रोता न था गिर्या-ओ-ज़ारी को भी इक ख़ास मौसम चाहिए मेरी आँखें देख लो मैं वक़्त पर रोता न था

Tehzeeb Hafi

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यहाँ हर शख़्स हर पल हादसा होने से डरता है खिलौना है जो मिट्टी का फ़ना होने से डरता है मिरे दिल के किसी कोने में इक मासूम सा बच्चा बड़ों की देख कर दुनिया बड़ा होने से डरता है न बस में ज़िंदगी उस के न क़ाबू मौत पर उस का मगर इंसान फिर भी कब ख़ुदा होने से डरता है अजब ये ज़िंदगी की क़ैद है दुनिया का हर इंसाँ रिहाई माँगता है और रिहा होने से डरता है

Rajesh Reddy

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लगेगा अजनबी अब क्यूँ न शहर भर मुझ को बचा गया है नज़र तू भी देख कर मुझ को मैं घूम फिर के उसी सम्त आ निकलता हूँ जकड़ रही है तिरे घर की रहगुज़र मुझ को झुलस रहा है बदन ज़ेर-ए-साया-ए-दीवार बुला रहा है कोई दश्त-ए-बे-शजर मुझ को मैं संग-दिल हूँ तुझे भूलता ही जाता हूँ मैं हँस रहा हूँ तो मिल के उदास कर मुझ को मैं देखता ही रहूँगा तुझे किनारे से तू ढूँढ़ता ही रहेगा भँवर भँवर मुझ को बनी हैं तुंद हवाओं की ज़र्द दीवारें उड़ा रहा है मगर शो'ला-ए-सफ़र मुझ को बना दिया है निडर ज़िद्दी ख़्वाहिशों ने 'नसीम' ख़ुद ए'तिमाद न था अपने आप पर मुझ को

Iftikhar Naseem

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ख़ुद को हुजूम-ए-दहर में खोना पड़ा मुझे जैसे थे लोग वैसा ही होना पड़ा मुझे दुश्मन को मरते देख के लोगों के सामने दिल हँस रहा था आँख से रोना पड़ा मुझे कुछ इस क़दर थे फूल ज़मीं पर खिले हुए तारों को आसमान में बोना पड़ा मुझे ऐसी शिकस्त थी कि कटी उँगलियों के साथ काँटों का एक हार पिरोना पड़ा मुझे कारी नहीं था वार मगर एक उम्र तक आब-ए-नमक से ज़ख़्म को धोना पड़ा मुझे आसाँ नहीं है लिखना ग़म-ए-दिल की वारदात अपना क़लम लहू में डुबोना पड़ा मुझे इतनी तवील ओ सर्द शब-ए-हिज्र थी 'नसीम' कितनी ही बार जागना सोना पड़ा मुझे

Iftikhar Naseem

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लिबास-ए-ख़ाक सही पर कहीं ज़रूर हूँ मैं बता रही है चमक आँख की कि नूर हूँ मैं कोई नहीं जो मिरी लौ से रास्ता देखे हवा-ए-तुंद बुझा दे तिरे हुज़ूर हूँ मैं पनाह देता नहीं कोई और सय्यारा भटक रहा हूँ ख़ला में ज़मीं से दूर हूँ मैं न हो गिरा के मुझे तू भी ख़ाक में मिल जाए मुझे गले से लगा ले तिरा ग़ुरूर हूँ मैं निकल पड़ा हूँ यूँँही इतनी बर्फ़-बारी में बदन के गर्म लहू का अजब सुरूर हूँ मैं सज़ा भी काट चुका हूँ मैं जिस ख़ता की 'नसीम' किसे पुकारूँ कहूँ इस में बे-क़ुसूर हूँ मैं

Iftikhar Naseem

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अपना सारा बोझ ज़मीं पर फेंक दिया तुझ को ख़त लिक्खा और लिख कर फेंक दिया ख़ुद को साकिन देखा ठहरे पानी में जाने क्या कुछ सोच के पत्थर फेंक दिया दीवारें क्यूँँ ख़ाली ख़ाली लगती हैं किस ने सब कुछ घर से बाहर फेंक दिया मैं तो अपना जिस्म सुखाने निकला था बारिश ने फिर मुझ पे समुंदर फेंक दिया वो कैसा था उस को कहाँ पर देखा था अपनी आँखों ने हर मंज़र फेंक दिया

Iftikhar Naseem

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न जाने कब वो पलट आएँ दर खुला रखना गए हुए के लिए दिल में कुछ जगह रखना हज़ार तल्ख़ हों यादें मगर वो जब भी मिले ज़बाँ पे अच्छे दिनों का ही ज़ाइक़ा रखना न हो कि क़ुर्ब ही फिर मर्ग-ए-रब्त बन जाए वो अब मिले तो ज़रा उस से फ़ासला रखना उतार फेंक दे ख़ुश-फ़हमियों के सारे ग़िलाफ़ जो शख़्स भूल गया उस को याद क्या रखना अभी न इल्म हो उस को लहू की लज़्ज़त का ये राज़ उस से बहुत देर तक छुपा रखना कभी न लाना मसाइल घरों के दफ़्तर में ये दोनों पहलू हमेशा जुदा जुदा रखना उड़ा दिया है जिसे चूम कर हवा में 'नसीम' उसे हमेशा हिफ़ाज़त में ऐ ख़ुदा रखना

Iftikhar Naseem

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