ghazalKuch Alfaaz

लिबास-ए-ख़ाक सही पर कहीं ज़रूर हूँ मैं बता रही है चमक आँख की कि नूर हूँ मैं कोई नहीं जो मिरी लौ से रास्ता देखे हवा-ए-तुंद बुझा दे तिरे हुज़ूर हूँ मैं पनाह देता नहीं कोई और सय्यारा भटक रहा हूँ ख़ला में ज़मीं से दूर हूँ मैं न हो गिरा के मुझे तू भी ख़ाक में मिल जाए मुझे गले से लगा ले तिरा ग़ुरूर हूँ मैं निकल पड़ा हूँ यूँँही इतनी बर्फ़-बारी में बदन के गर्म लहू का अजब सुरूर हूँ मैं सज़ा भी काट चुका हूँ मैं जिस ख़ता की 'नसीम' किसे पुकारूँ कहूँ इस में बे-क़ुसूर हूँ मैं

Related Ghazal

कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

435 likes

चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का

Waseem Barelvi

103 likes

वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

244 likes

तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन

Varun Anand

81 likes

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

130 likes

More from Iftikhar Naseem

इस क़दर भी तो न जज़्बात पे क़ाबू रक्खो थक गए हो तो मिरे काँधे पे बाज़ू रक्खो भूलने पाए न इस दश्त की वहशत दिल से शहर के बीच रहो बाग़ में आहू रक्खो ख़ुश्क हो जाएगी रोते हुए सहरा की तरह कुछ बचा कर भी तो इस आँख में आँसू रक्खो रौशनी होगी तो आ जाएगा रह-रव दिल का उस की यादों के दिए ताक़ में हर-सू रक्खो याद आएगी तुम्हारी ही सफ़र में उस को उस के रूमाल में इक अच्छी सी ख़ुश्बू रक्खो अब वो महबूब नहीं अपना मगर दोस्त तो है उस से ये एक तअ'ल्लुक़ ही बहर-सू रक्खो

Iftikhar Naseem

0 likes

सराए छोड़ के वो फिर कभी नहीं आया चला गया जो मुसाफ़िर कभी नहीं आया हर एक शय मिरे घर में उसी के ज़ौक़ की है जो मेरे घर में ब-ज़ाहिर कभी नहीं आया ये कौन मुझ को अधूरा बना के छोड़ गया पलट के मेरा मुसव्विर कभी नहीं आया मकाँ हूँ जिस में कोई भी मकीं नहीं रहता शजर हूँ जिस पे कि ताइर कभी नहीं आया

Iftikhar Naseem

0 likes

ख़ुद को हुजूम-ए-दहर में खोना पड़ा मुझे जैसे थे लोग वैसा ही होना पड़ा मुझे दुश्मन को मरते देख के लोगों के सामने दिल हँस रहा था आँख से रोना पड़ा मुझे कुछ इस क़दर थे फूल ज़मीं पर खिले हुए तारों को आसमान में बोना पड़ा मुझे ऐसी शिकस्त थी कि कटी उँगलियों के साथ काँटों का एक हार पिरोना पड़ा मुझे कारी नहीं था वार मगर एक उम्र तक आब-ए-नमक से ज़ख़्म को धोना पड़ा मुझे आसाँ नहीं है लिखना ग़म-ए-दिल की वारदात अपना क़लम लहू में डुबोना पड़ा मुझे इतनी तवील ओ सर्द शब-ए-हिज्र थी 'नसीम' कितनी ही बार जागना सोना पड़ा मुझे

Iftikhar Naseem

0 likes

न जाने कब वो पलट आएँ दर खुला रखना गए हुए के लिए दिल में कुछ जगह रखना हज़ार तल्ख़ हों यादें मगर वो जब भी मिले ज़बाँ पे अच्छे दिनों का ही ज़ाइक़ा रखना न हो कि क़ुर्ब ही फिर मर्ग-ए-रब्त बन जाए वो अब मिले तो ज़रा उस से फ़ासला रखना उतार फेंक दे ख़ुश-फ़हमियों के सारे ग़िलाफ़ जो शख़्स भूल गया उस को याद क्या रखना अभी न इल्म हो उस को लहू की लज़्ज़त का ये राज़ उस से बहुत देर तक छुपा रखना कभी न लाना मसाइल घरों के दफ़्तर में ये दोनों पहलू हमेशा जुदा जुदा रखना उड़ा दिया है जिसे चूम कर हवा में 'नसीम' उसे हमेशा हिफ़ाज़त में ऐ ख़ुदा रखना

Iftikhar Naseem

0 likes

अपनी मजबूरी बताता रहा रो कर मुझ को वो मिला भी तो किसी और का हो कर मुझ को मैं ख़ुदा तो नहीं जो उस को दिखाई न दिया ढूँढ़ता मेरा पुजारी कभी खो कर मुझ को पा लिया जिस ने तह-ए-आब भी अपना साहिल मुतमइन था मिरा तूफ़ान डुबो कर मुझ को रेग-ए-साहिल पे लिखी वक़्त की तहरीर हूँ मैं मौज आए तो चली जाएगी धो कर मुझ को नींद ही जैसे कोई कुंज-ए-अमाँ है अब तो चैन मिलता है बहुत देर से सो कर मुझ को फ़स्ल-ए-गुल हो तो निकाले मुझे इस बर्ज़ख़ से भूल जाए न तह-ए-संग वो बो कर मुझ को

Iftikhar Naseem

2 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Iftikhar Naseem.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Iftikhar Naseem's ghazal.