aurat huun magar surat-e-kohsar khadi huun ik sach ke tahaffuz ke liye sab se ladi huun vo mujh se sitaron ka pata puchh raha hai patthar ki tarah jis ki anguthi men jadi huun alfaz na avaz na hamraz na dam-saz ye kaise dorahe pe main khamosh khadi huun is dasht-e-bala men na samajh khud ko akela main chob ki surat tire kheme men gadi huun phulon pe barasti huun kabhi surat-e-shabnam badli hui rut men kabhi savan ki jhadi huun aurat hun magar surat-e-kohsar khadi hun ek sach ke tahaffuz ke liye sab se ladi hun wo mujh se sitaron ka pata puchh raha hai patthar ki tarah jis ki anguthi mein jadi hun alfaz na aawaz na hamraaz na dam-saz ye kaise dorahe pe main khamosh khadi hun is dasht-e-bala mein na samajh khud ko akela main chob ki surat tere kheme mein gadi hun phulon pe barasti hun kabhi surat-e-shabnam badli hui rut mein kabhi sawan ki jhadi hun
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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वो तो अच्छा है ग़ज़ल तेरा सहारा है मुझे वर्ना फ़िक्रों ने तो बस घेर के मारा है मुझे जिस की तस्वीर मैं काग़ज़ पे बना भी न सका उस ने मेहँदी से हथेली पे उतारा है मुझे ग़ैर के हाथ से मरहम मुझे मंज़ूर नहीं तुम मगर ज़ख़्म भी दे दो तो गवारा है मुझे
Abrar Kashif
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सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं सुना है रब्त है उस को ख़राब-हालों से सो अपने आप को बर्बाद कर के देखते हैं सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उस की सो हम भी उस की गली से गुज़र के देखते हैं सुना है उस को भी है शे'र ओ शा'इरी से शग़फ़ सो हम भी मो'जिज़े अपने हुनर के देखते हैं सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं सुना है हश्र हैं उस की ग़ज़ाल सी आँखें सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उस की सुना है शाम को साए गुज़र के देखते हैं सुना है उस की सियह-चश्मगी क़यामत है सो उस को सुरमा-फ़रोश आह भर के देखते हैं सुना है उस के लबों से गुलाब जलते हैं सो हम बहार पे इल्ज़ाम धर के देखते हैं सुना है आइना तिमसाल है जबीं उस की जो सादा दिल हैं उसे बन-सँवर के देखते हैं सुना है जब से हमाइल हैं उस की गर्दन में मिज़ाज और ही लाल ओ गुहर के देखते हैं सुना है चश्म-ए-तसव्वुर से दश्त-ए-इम्काँ में पलंग ज़ाविए उस की कमर के देखते हैं सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है कि फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं वो सर्व-क़द है मगर बे-गुल-ए-मुराद नहीं कि उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं बस इक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का सो रह-रवान-ए-तमन्ना भी डर के देखते हैं सुना है उस के शबिस्ताँ से मुत्तसिल है बहिश्त मकीं उधर के भी जल्वे इधर के देखते हैं रुके तो गर्दिशें उस का तवाफ़ करती हैं चले तो उस को ज़माने ठहर के देखते हैं किसे नसीब कि बे-पैरहन उसे देखे कभी कभी दर ओ दीवार घर के देखते हैं कहानियाँ ही सही सब मुबालग़े ही सही अगर वो ख़्वाब है ता'बीर कर के देखते हैं अब उस के शहर में ठहरें कि कूच कर जाएँ 'फ़राज़' आओ सितारे सफ़र के देखते हैं
Ahmad Faraz
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ये प्यार तेरी भूल है क़ुबूल है मैं संग हूँ तू फूल है क़ुबूल है दग़ा भी दूँगा प्यार में कभी कभी कि ये मिरा उसूल है क़ुबूल है तुझे जहाँ अज़ीज़ है तो छोड़ जा मुझे ये शय फ़ुज़ूल है क़ुबूल है तू रूठेगी तो मैं मनाऊँगा नहीं जो रूल है वो रूल है क़ुबूल है लिपट ऐ शाखे गुल मगर ये सोच कर मेरा बदन बबूल है क़ुबूल है यही है गर तिरी रज़ा तो बोल फिर क़ुबूल है क़ुबूल है क़ुबूल है
Varun Anand
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ग़ज़ल तो सब को मीठी लग रही थी मगर नातिक को मिर्ची लग रही थी तुम्हारे लब नहीं चू में थे जब तक मुझे हर चीज़ कड़वी लग रही थी मैं जिस दिन छोड़ने वाला था उस को वो उस दिन सब सेे प्यारी लग रही थी
Zubair Ali Tabish
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