ghazalKuch Alfaaz

बाहर भी अब अंदर जैसा सन्नाटा है दरिया के उस पार भी गहरा सन्नाटा है शोर थमें तो शायद सदियाँ बीत चुकी हैं अब तक लेकिन सहमा सहमा सन्नाटा है किस से बोलूँ ये तो इक सहरा है जहाँ पर मैं हूँ या फिर गूँगा बहरा सन्नाटा है जैसे इक तूफ़ान से पहले की ख़ामोशी आज मिरी बस्ती में ऐसा सन्नाटा है नई सहर की चाप न जाने कब उभरेगी चारों जानिब रात का गहरा सन्नाटा है सोच रहे हो सोचो लेकिन बोल न पड़ना देख रहे हो शहर में कितना सन्नाटा है महव-ए-ख़्वाब हैं सारी देखने वाली आँखें जागने वाला बस इक अंधा सन्नाटा है डरना है तो अन-जानी आवाज़ से डरना ये तो 'आनिस' देखा-भाला सन्नाटा है

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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन

Varun Anand

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मैं ने चाहा तो नहीं था कि कभी ऐसा हो लेकिन अब ठान चुके हो तो चलो अच्छा हो तुम से नाराज़ तो मैं और किसी बात पे हूँ तुम मगर और किसी वजह से शर्मिंदा हो अब कहीं जा के ये मालूम हुआ है मुझ को ठीक रह जाता है जो शख़्स तेरे जैसा हो ऐसे हालात में हो भी कोई हस्सास तो क्या और बे-हिस भी अगर हो तो कोई कितना हो ताकि तू समझे कि मर्दों के भी दुख होते हैं मैं ने चाहा भी यही था कि तेरा बेटा हो

Jawwad Sheikh

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किस तरह होगा फ़कीरों का गुज़ारा सोचे उस सेे कहना कि वो इक बार दुबारा सोचे कैसे मुमकिन है उसे और कोई काम न हो कैसे मुमकिन है कि वो सिर्फ़ हमारा सोचे तेरे अफ़लाक पे जाए तो सितारा चमके मेरे अफ़लाक पे आए तो सितारा सोचे टूटे पतवार की कश्ती का मुक़द्दर क्या है ये तो दरिया ही बताए या किनारा सोचे ऐसा मौका हो कि बस एक ही बच सकता हो और उस वक़्त भी एक शख़्स तुम्हारा सोचे

Zahid Bashir

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सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा इतना मत चाहो उसे वो बे-वफ़ा हो जाएगा हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा कितनी सच्चाई से मुझ से ज़िंदगी ने कह दिया तू नहीं मेरा तो कोई दूसरा हो जाएगा मैं ख़ुदा का नाम ले कर पी रहा हूँ दोस्तो ज़हर भी इस में अगर होगा दवा हो जाएगा सब उसी के हैं हवा ख़ुशबू ज़मीन ओ आसमाँ मैं जहाँ भी जाऊँगा उस को पता हो जाएगा

Bashir Badr

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तेरे जैसा कोई मिला ही नहीं कैसे मिलता कहीं पे था ही नहीं घर के मलबे से घर बना ही नहीं ज़लज़ले का असर गया ही नहीं मुझ पे हो कर गुज़र गई दुनिया मैं तिरी राह से हटा ही नहीं कल से मसरूफ़-ए-ख़ैरियत मैं हूँ शे'र ताज़ा कोई हुआ ही नहीं रात भी हम ने ही सदारत की बज़्म में और कोई था ही नहीं यार तुम को कहाँ कहाँ ढूँडा जाओ तुम से मैं बोलता ही नहीं याद है जो उसी को याद करो हिज्र की दूसरी दवा ही नहीं

Fahmi Badayuni

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वो मेरे हाल पे रोया भी मुस्कुराया भी अजीब शख़्स है अपना भी है पराया भी ये इंतिज़ार सहर का था या तुम्हारा था दिया जलाया भी मैं ने दिया बुझाया भी मैं चाहता हूँ ठहर जाए चश्म-ए-दरिया में लरज़ता अक्स तुम्हारा भी मेरा साया भी बहुत महीन था पर्दा लरज़ती आँखों का मुझे दिखाया भी तू ने मुझे छुपाया भी बयाज़ भर भी गई और फिर भी सादा है तुम्हारे नाम को लिक्खा भी और मिटाया भी

Aanis Moin

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वो कुछ गहरी सोच में ऐसे डूब गया है बैठे बैठे नदी किनारे डूब गया है आज की रात न जाने कितनी लंबी होगी आज का सूरज शाम से पहले डूब गया है वो जो प्यासा लगता था सैलाब-ज़दा था पानी पानी कहते कहते डूब गया है मेरे अपने अंदर एक भँवर था जिस में मेरा सब कुछ साथ ही मेरे डूब गया है शोर तो यूँँ उट्ठा था जैसे इक तूफ़ाँ हो सन्नाटे में जाने कैसे डूब गया है आख़िरी ख़्वाहिश पूरी कर के जीना कैसा 'आनस' भी साहिल तक आ के डूब गया है

Aanis Moin

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