ghazalKuch Alfaaz

बंदा तो हुज़ूर आप के काम आया बहुत है ये भी है बजा आप ने ठुकराया बहुत है उल्फ़त है कि है दिल-लगी मुझ को नहीं मालूम फिर चाँद मुझे देख के मुस्काया बहुत है दुनिया मुझे सूली पे चढ़ा दे तो चढ़ा दे उल्फ़त का सबक़ मैं ने भी दोहराया बहुत है ये बात बजा की है मदद शुक्रिया साहिब एहसान मगर आप ने जतलाया बहुत है गुम-सुम सा कई रोज़ से दिखता है वो ज़ालिम शायद मिरा दिल तोड़ के पछताया बहुत है ख़ुद की भी कभी शक्ल ज़रा देख लें साहिब आईना मुझे आप ने दिखलाया बहुत है अब अक़्ल का दुश्मन जो न समझे तो न समझे मैं ने दिल-ए-नादान को समझाया बहुत है अफ़्सोस नहीं क़त्ल का मुझ को मिरे क़ातिल ग़म है यही तू ने मुझे तड़पाया बहुत है ईमान ओ धरम ताक पे देखो तो 'अकेला' पैसे के लिए आदमी पगलाया बहुत है

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

Waseem Barelvi

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मैं ने जो कुछ भी सोचा हुआ है, मैं वो वक़्त आने पे कर जाऊँगा तुम मुझे ज़हर लगते हो और मैं किसी दिन तुम्हें पी के मर जाऊँगा तू तो बीनाई है मेरी तेरे अलावा मुझे कुछ भी दिखता नहीं मैं ने तुझ को अगर तेरे घर पे उतारा तो मैं कैसे घर जाऊँगा चाहता हूँ तुम्हें और बहुत चाहता हूँ, तुम्हें ख़ुद भी मालूम है हाँ अगर मुझ सेे पूछा किसी ने तो मैं सीधा मुँह पर मुकर जाऊँगा तेरे दिल से तेरे शहर से तेरे घर से तेरी आँख से तेरे दर से तेरी गलियों से तेरे वतन से निकाला हुआ हूँ किधर जाऊँगा

Tehzeeb Hafi

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मुझे उदास कर गए हो ख़ुश रहो मिरे मिज़ाज पर गए हो ख़ुश रहो मिरे लिए न रुक सके तो क्या हुआ जहाँ कहीं ठहर गए हो ख़ुश रहो ख़ुशी हुई है आज तुम को देख कर बहुत निखर सँवर गए हो ख़ुश रहो उदास हो किसी की बे-वफ़ाई पर वफ़ा कहीं तो कर गए हो ख़ुश रहो गली में और लोग भी थे आश्ना हमें सलाम कर गए हो ख़ुश रहो तुम्हें तो मेरी दोस्ती पे नाज़ था इसी से अब मुकर गए हो ख़ुश रहो किसी की ज़िन्दगी बनो कि बंदगी मिरे लिए तो मर गए हो ख़ुश रहो

Fazil Jamili

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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा

Fahmi Badayuni

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पहले तेरी जेब टटोली जाएगी फिर यारी की भाषा बोली जाएगी तेरी तह ली जाएगी तत्परता से ख़ुद के मन की गाँठ न खोली जाएगी नैतिकता की मैली होती ये चादर दौलत के साबुन से धो ली जाएगी टूटी इक उम्मीद पे ये मातम कैसा फिर कोई उम्मीद संजो ली जाएगी कौन तुम्हारा दुख अपना दुख समझेगा दिखलाने को आँख भिगो ली जाएगी कह दे कह दे फिर मुस्का कर कह दे तू तेरे ही घर मेरी डोली जाएगी झूटी शान 'अकेला' कितने दिन की है एक ही बारिश में रंगोली जाएगी

Virendra Khare Akela

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अदावत दिल में रखते हैं मगर यारी दिखाते हैं न जाने लोग भी क्या क्या अदाकारी दिखाते हैं यक़ीनन उन का जी भरने लगा है मेज़बानी से वो कुछ दिन से हमें जाती हुई लॉरी दिखाते हैं उलझना है हमें बंजर ज़मीनों की हक़ीक़त से उन्हें क्या वो तो बस काग़ज़ पे फुलवारी दिखाते हैं मदद करने से पहले तुम हक़ीक़त भी परख लेना यहाँ पर आदतन कुछ लोग लाचारी दिखाते हैं डराना चाहते हैं वो हमें भी धमकियाँ दे कर बड़े नादान हैं पानी को चिंगारी दिखाते हैं दरख़्तों की हिफ़ाज़त करने वालो डर नहीं जाना दिखाने दो अगर कुछ सर-फिरे आरी दिखाते हैं हिमाक़त क़ाबिल-ए-तारीफ़ है उन की 'अकेला' जी हमीं से काम है हम को ही रंग-दारी दिखाते हैं

Virendra Khare Akela

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पहले तेरी जेब टटोली जाएगी फिर यारी की भाषा बोली जाएगी तेरी तह ली जाएगी तत्परता से ख़ुद के मन की गाँठ न खोली जाएगी नैतिकता की मैली होती ये चादर दौलत के साबुन से धो ली जाएगी टूटी इक उम्मीद पे ये मातम कैसा फिर कोई उम्मीद संजो ली जाएगी कौन तुम्हारा दुख अपना दुख समझेगा दिखलाने को आँख भिगो ली जाएगी कह दे कह दे फिर मुस्का कर कह दे तू तेरे ही घर मेरी डोली जाएगी झूटी शान 'अकेला' कितने दिन की है एक ही बारिश में रंगोली जाएगी

Virendra Khare Akela

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ख़्वाब ख़ुश-फ़हमी ख़ुशी सब कुछ मिटा कर रख दिया उस ने दो ही रोज़ में मुझ को भुला कर रख दिया ये करिश्मा कम से कम इंसान के बस का नहीं किस ने फिर पत्थर पे ये पौधा उगा कर रख दिया सब की नज़रों में ये दौलत आ न जाए इस लिए मैं ने तेरा दर्द ग़ज़लों में छुपा कर रख दिया तर्क-ए-मय करने ही वाला था मगर अब क्या करूँँ जाम साक़ी ने मिरे हाथों पे ला कर रख दिया सिर्फ़ असली बात ही बोली नहीं कम्बख़्त ने कुल-जहाँ का यूँँ तो अफ़्साना सुना कर रख दिया क्या हसीं क्या पुर-सुकूँ सपना अधूरा रह गया और सो लेने दिया होता जगा कर रख दिया ऐ 'अकेला' हो गई अपनी भी रुस्वाई बहुत हम ने उस रुख़ से मगर पर्दा हटा कर रख दिया

Virendra Khare Akela

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कुछ ऐसे ही तुम्हारे बिन ये दिल मेरा तरसता है खिलौनों के लिए मुफ़्लिस का ज्यूँँ बच्चा तरसता है गए वो दिन कि जब ये तिश्नगी फ़रियाद करती थी बुझाने को हमारी प्यास अब दरिया तरसता है नफ़ा नुक़सान का झंझट तो होता है तिजारत में मोहब्बत हो तो पीतल के लिए सोना तरसता है न जाने कब तलक होगी मेहरबानी घटाओं की चमन के वास्ते कितना ये वीराना तरसता है यही अंजाम अक्सर हम ने देखा है मोहब्बत का कहीं राधा तरसती है कहीं कान्हा तरसता है पता कुछ भी नहीं हम को मगर हम सब समझते हैं किसी बस्ती की ख़ातिर क्यूँ वो बंजारा तरसता है कि आख़िर ऐ 'अकेला' सब्र भी रक्खे कहाँ तक दिल बहुत कुछ बोलने को अब तो ये गूँगा तरसता है

Virendra Khare Akela

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