पहले तेरी जेब टटोली जाएगी फिर यारी की भाषा बोली जाएगी तेरी तह ली जाएगी तत्परता से ख़ुद के मन की गाँठ न खोली जाएगी नैतिकता की मैली होती ये चादर दौलत के साबुन से धो ली जाएगी टूटी इक उम्मीद पे ये मातम कैसा फिर कोई उम्मीद संजो ली जाएगी कौन तुम्हारा दुख अपना दुख समझेगा दिखलाने को आँख भिगो ली जाएगी कह दे कह दे फिर मुस्का कर कह दे तू तेरे ही घर मेरी डोली जाएगी झूटी शान 'अकेला' कितने दिन की है एक ही बारिश में रंगोली जाएगी
Related Ghazal
कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला
Tehzeeb Hafi
435 likes
उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है
Waseem Barelvi
107 likes
मैं ने जो कुछ भी सोचा हुआ है, मैं वो वक़्त आने पे कर जाऊँगा तुम मुझे ज़हर लगते हो और मैं किसी दिन तुम्हें पी के मर जाऊँगा तू तो बीनाई है मेरी तेरे अलावा मुझे कुछ भी दिखता नहीं मैं ने तुझ को अगर तेरे घर पे उतारा तो मैं कैसे घर जाऊँगा चाहता हूँ तुम्हें और बहुत चाहता हूँ, तुम्हें ख़ुद भी मालूम है हाँ अगर मुझ सेे पूछा किसी ने तो मैं सीधा मुँह पर मुकर जाऊँगा तेरे दिल से तेरे शहर से तेरे घर से तेरी आँख से तेरे दर से तेरी गलियों से तेरे वतन से निकाला हुआ हूँ किधर जाऊँगा
Tehzeeb Hafi
241 likes
मफ़रूर परिंदों को ये ऐलान गया है सय्याद नशेमन का पता जान गया है या'नी जिसे दीमक लगी जाती थी वो मैं था अब जा के मेरा मेरी तरफ़ ध्यान गया है शीशे में भले उस ने मेरी नक़्ल उतारी ख़ुश हूँ कि मुझे कोई तो पहचान गया है अब बात तेरी कुन पे है कुछ कर मेरे मौला इक शख़्स तेरे दर से परेशान गया है ये नाम-ओ-नसब जा के ज़माने को बताओ दरवेश तो दस्तक से ही पहचान गया है
Ahmad Abdullah
50 likes
जिस तरह वक़्त गुज़रने के लिए होता है आदमी शक्ल पे मरने के लिए होता है तेरी आँखों से मुलाक़ात हुई तब ये खुला डूबने वाला उभरने के लिए होता है इश्क़ क्यूँँ पीछे हटा बात निभाने से मियाँ हुस्न तो ख़ैर मुकरने के लिए होता है आँख होती है किसी राह को तकने के लिए दिल किसी पाँव पे धरने के लिए होता है दिल की दिल्ली का चुनाव ही अलग है साहब जब भी होता है ये हरने के लिए होता है कोई बस्ती हो उजड़ने के लिए बसती है कोई मज़मा हो बिखरने के लिए होता है
Ali Zaryoun
61 likes
More from Virendra Khare Akela
पहले तेरी जेब टटोली जाएगी फिर यारी की भाषा बोली जाएगी तेरी तह ली जाएगी तत्परता से ख़ुद के मन की गाँठ न खोली जाएगी नैतिकता की मैली होती ये चादर दौलत के साबुन से धो ली जाएगी टूटी इक उम्मीद पे ये मातम कैसा फिर कोई उम्मीद संजो ली जाएगी कौन तुम्हारा दुख अपना दुख समझेगा दिखलाने को आँख भिगो ली जाएगी कह दे कह दे फिर मुस्का कर कह दे तू तेरे ही घर मेरी डोली जाएगी झूटी शान 'अकेला' कितने दिन की है एक ही बारिश में रंगोली जाएगी
Virendra Khare Akela
0 likes
अदावत दिल में रखते हैं मगर यारी दिखाते हैं न जाने लोग भी क्या क्या अदाकारी दिखाते हैं यक़ीनन उन का जी भरने लगा है मेज़बानी से वो कुछ दिन से हमें जाती हुई लॉरी दिखाते हैं उलझना है हमें बंजर ज़मीनों की हक़ीक़त से उन्हें क्या वो तो बस काग़ज़ पे फुलवारी दिखाते हैं मदद करने से पहले तुम हक़ीक़त भी परख लेना यहाँ पर आदतन कुछ लोग लाचारी दिखाते हैं डराना चाहते हैं वो हमें भी धमकियाँ दे कर बड़े नादान हैं पानी को चिंगारी दिखाते हैं दरख़्तों की हिफ़ाज़त करने वालो डर नहीं जाना दिखाने दो अगर कुछ सर-फिरे आरी दिखाते हैं हिमाक़त क़ाबिल-ए-तारीफ़ है उन की 'अकेला' जी हमीं से काम है हम को ही रंग-दारी दिखाते हैं
Virendra Khare Akela
0 likes
बंदा तो हुज़ूर आप के काम आया बहुत है ये भी है बजा आप ने ठुकराया बहुत है उल्फ़त है कि है दिल-लगी मुझ को नहीं मालूम फिर चाँद मुझे देख के मुस्काया बहुत है दुनिया मुझे सूली पे चढ़ा दे तो चढ़ा दे उल्फ़त का सबक़ मैं ने भी दोहराया बहुत है ये बात बजा की है मदद शुक्रिया साहिब एहसान मगर आप ने जतलाया बहुत है गुम-सुम सा कई रोज़ से दिखता है वो ज़ालिम शायद मिरा दिल तोड़ के पछताया बहुत है ख़ुद की भी कभी शक्ल ज़रा देख लें साहिब आईना मुझे आप ने दिखलाया बहुत है अब अक़्ल का दुश्मन जो न समझे तो न समझे मैं ने दिल-ए-नादान को समझाया बहुत है अफ़्सोस नहीं क़त्ल का मुझ को मिरे क़ातिल ग़म है यही तू ने मुझे तड़पाया बहुत है ईमान ओ धरम ताक पे देखो तो 'अकेला' पैसे के लिए आदमी पगलाया बहुत है
Virendra Khare Akela
0 likes
लोग भी किया हैं किसी का दिल दुखा कर ख़ुश हुए फूल पर बैठी हुई तितली उड़ा कर ख़ुश हुए प्यास हम अपनी बुझा लें ये इजाज़त है कहाँ फिर भी ऐ दरिया तिरे नज़दीक आ कर ख़ुश हुए मर्ज़ को पाले हुए रखना समझदारी नहीं लोग फिर भी ख़ामियाँ अपनी छुपा कर ख़ुश हुए शक्ल-ओ-सूरत देखने लाएक़ थी तब सय्याद की क़ैद पंछी जब परों को फड़फड़ा कर ख़ुश हुए आख़िरश करते भी किया जब क्लास में टीचर न था सारे बच्चा बच्चियाँ ऊधम मचा कर ख़ुश हुए बोझ दिल का एक ही झटके में हल्क़ा हो गया हम तुम्हारी याद में ख़ुद को रुला कर ख़ुश हुए ऐ 'अकेला' और क्या होना था बस इतना हुआ सर-फिरे झोंके चराग़ों को बुझा कर ख़ुश हुए
Virendra Khare Akela
0 likes
ख़्वाब ख़ुश-फ़हमी ख़ुशी सब कुछ मिटा कर रख दिया उस ने दो ही रोज़ में मुझ को भुला कर रख दिया ये करिश्मा कम से कम इंसान के बस का नहीं किस ने फिर पत्थर पे ये पौधा उगा कर रख दिया सब की नज़रों में ये दौलत आ न जाए इस लिए मैं ने तेरा दर्द ग़ज़लों में छुपा कर रख दिया तर्क-ए-मय करने ही वाला था मगर अब क्या करूँँ जाम साक़ी ने मिरे हाथों पे ला कर रख दिया सिर्फ़ असली बात ही बोली नहीं कम्बख़्त ने कुल-जहाँ का यूँँ तो अफ़्साना सुना कर रख दिया क्या हसीं क्या पुर-सुकूँ सपना अधूरा रह गया और सो लेने दिया होता जगा कर रख दिया ऐ 'अकेला' हो गई अपनी भी रुस्वाई बहुत हम ने उस रुख़ से मगर पर्दा हटा कर रख दिया
Virendra Khare Akela
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Virendra Khare Akela.
Similar Moods
More moods that pair well with Virendra Khare Akela's ghazal.







