बारिश में अहद तोड़ के गर मय-कशी हुई तौबा मरी फिरेगी कहाँ भीगती हुई पेश आए लाख रंज अगर इक ख़ुशी हुई परवरदिगार ये भी कोई ज़िंदगी हुई अच्छा तो दोनों वक़्त मिले कोसिए हुज़ूर फिर भी मरीज़-ए-ग़म की अगर ज़िंदगी हुई ऐ अंदलीब अपने नशेमन की ख़ैर माँग बिजली गई है सू-ए-चमन देखती हुई देखो चराग़-ए-क़ब्र उसे क्या जवाब दे आएगी शाम-ए-हिज्र मुझे पूछती हुई क़ासिद उन्हीं को जा के दिया था हमारा ख़त वो मिल गए थे उन से कोई बात भी हुई? जब तक कि तेरी बज़्म में चलता रहेगा जाम साक़ी रहेगी गर्दिश-ए-दौराँ रुकी हुई माना कि उन से रात का वा'दा है ऐ 'क़मर' कैसे वो आ सकेंगे अगर चाँदनी हुई
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है
Shabeena Adeeb
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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला
Tehzeeb Hafi
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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
Ahmad Faraz
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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है
Waseem Barelvi
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कभी जो आँख पे गेसू-ए-यार होता है शराब-ख़ाने पे अब्र-ए-बहार होता है किसी का ग़म हो मिरे दिल पे बार होता है उसी का नाम ग़म-ए-रोज़गार होता है इलाही ख़ैर हो उन बे-ज़बाँ असीरों की क़फ़स के सामने ज़िक्र-ए-बहार होता है चमन में ऐसे भी दो चार हैं चमन वाले कि जिन को मौसम-ए-गुल नागवार होता है सवाल-ए-जाम तिरे मय-कदे में ऐ साक़ी जवाब-ए-गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार होता है हमें वफ़ा पे वफ़ा आज तक न रास आई उन्हें सितम पे सितम साज़गार होता है लबों पे आ गया दम बंद हो चुकीं आँखें चले भी आओ कि ख़त्म इंतिज़ार होता है कहाँ वो वस्ल की रातें कहाँ ये हिज्र के दिन ख़याल-ए-गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार होता है जुनूँ तो एक बड़ी चीज़ है मोहब्बत में ज़रा से अश्क से राज़ आश्कार होता है मिरे जनाज़े को देखा तो यास से बोले यहाँ पे आदमी बे-इख़्तियार होता है ख़ुदा रखे तुम्हें क्या कोई जौर भूल गए जो अब तलाश हमारा मज़ार होता है हमारा ज़ोर है क्या बाग़बाँ उठा लेंगे ये आशियाँ जो तुझे नागवार होता है अजीब कश्मकश-ए-बहर-ए-ग़म में दिल है 'क़मर' न डूबता है ये बेड़ा न पार होता है
Qamar Jalalvi
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सुर्ख़ियाँ क्यूँँ ढूँढ़ कर लाऊँ फ़साने के लिए बस तुम्हारा नाम काफ़ी है ज़माने के लिए मौजें साहिल से हटाती हैं हबाबों का हुजूम वो चले आए हैं साहिल पर नहाने के लिए सोचता हूँ अब कहीं बिजली गिरी तो क्यूँँ गिरी तिनके लाया था कहाँ से आशियाने के लिए छोड़ कर बस्ती ये दीवाने कहाँ से आ गए दश्त की बैठी-बिठाई ख़ाक उड़ाने के लिए हँस के कहते हो ज़माना भर मुझी पर जान दे रह गए हो क्या तुम्हीं सारे ज़माने के लिए शाम को आओगे तुम अच्छा अभी होती है शाम गेसुओं को खोल दो सूरज छुपाने के लिए काएनात-ए-इश्क़ इक दिल के सिवा कुछ भी नहीं वो ही आने के लिए है वो ही जाने के लिए ऐ ज़माने भर को ख़ुशियाँ देने वाले ये बता क्या 'क़मर' ही रह गया है ग़म उठाने के लिए
Qamar Jalalvi
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किसी सूरत सहर नहीं होती रात इधर से उधर नहीं होती ख़ौफ़ सय्याद से न बर्क़ का डर बात ये अपने घर नहीं होती एक वो हैं कि रोज़ आते हैं एक हम हैं ख़बर नहीं होती अब मैं समझा हूँ काट कर शब-ए-ग़म ज़िंदगी मुख़्तसर नहीं होती कितनी पाबंद-ए-वज़्अ है शब-ए-ग़म कभी ग़ैरों के घर नहीं होती कितनी सीधी है राह-ए-मुल्क-ए-अदम हाजत-ए-राहबर नहीं होती सुन लिया होगा तुम ने हाल-ए-मरीज़ अब दवा कार-गर नहीं होती अर्श मिलता है मेरी आहों से लेकिन उन को ख़बर नहीं होती
Qamar Jalalvi
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किसी का नाम लो बे-नाम अफ़्साने बहुत से हैं न जाने किस को तुम कहते हो दीवाने बहुत से हैं जफ़ाओं के गले तुम से ख़ुदा जाने बहुत से हैं मगर महशर का दिन है अपने बेगाने बहुत से हैं बनाए दे रही हैं अजनबी नादारियाँ मुझ को तिरी महफ़िल में वर्ना जाने-पहचाने बहुत से हैं धरी रह जाएगी पाबंदी-ए-ज़िंदाँ जो अब छेड़ा ये दरबानों को समझा दो कि दीवाने बहुत से हैं बस अब सो जाओ नींद आँखों में है कल फिर सुनाएँगे ज़रा सी रह गई है रात अफ़्साने बहुत से हैं तुम्हें किस ने बुलाया मय-कशों से ये न कह साक़ी तबीअ'त मिल गई है वर्ना मयख़ाने बहुत से हैं बड़ी क़ुर्बानियों के बा'द रहना बाग़ में होगा अभी तो आशियाँ बिजली से जलवाने बहुत से हैं लिखी है ख़ाक उड़ानी ही अगर अपने मुक़द्दर में तिरे कूचे पे क्या मौक़ूफ़ वीराने बहुत से हैं न रो ऐ शम्अ'' मौजूदा पतंगों की मुसीबत पर अभी महफ़िल से बाहर तेरे परवाने बहुत से हैं मिरे कहने से होगी तर्क-ए-रस्म-ओ-राह ग़ैरों से बजा है आप ने कहने मिरे माने बहुत से हैं 'क़मर' अल्लाह साथ ईमान के मंज़िल पे पहुँचा दे हरम की राह में सुनते हैं बुत-ख़ाने बहुत से हैं
Qamar Jalalvi
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राज़-ए-दिल क्यूँँ न कहूँ सामने दीवानों के ये तो वो लोग हैं अपनों के न बेगानों के वो भी क्या दौर थे साक़ी तिरे मस्तानों के रास्ते राह तका करते थे मय-ख़ानों के बादलों पर ये इशारे तिरे दीवानों के टुकड़े पहुँचे हैं कहाँ उड़ के गरेबानों के रास्ते बंद किए देते हो दीवानों के ढेर लग जाएँगे बस्ती में गरेबानों के न अज़ाँ देता न हुशियार बरहमन होता दर तो उस शैख़ ने खुलवाए हैं बुतख़ानों के आप दिन-रात सँवारा करें गेसू तो क्या कहीं हालात बदलते हैं परेशानों के मनअ' कर गिर्या-ए-शबनम पे न ये फूल हँसें लाले पड़ जाएँगे ऐ बाद-ए-सबा जानों के क्या ज़माना था उधर शाम इधर हाथ में जाम सुब्ह तक दौर चला करते थे पैमानों के वो भी क्या दिन थे उधर शाम इधर हाथ में जाम अब तो रस्ते भी रहे याद न मय-ख़ानों के आज तक तो मिरी कश्ती ने न पाई मंज़िल क़ाफ़िले सैंकड़ों गुम हो गए तूफ़ानों के ख़ाक-ए-सहरा पे लकीरें हैं उन्हें फिर देखो कहीं ये ख़त न हों लिक्खे हुए दीवानों के देखिए चर्ख़ पे तारे भी हैं क्या बे-तरतीब जैसे बिखरे हुए टुकड़े मिरे पैमानों के हाथ ख़ाली हैं मगर मुल्क-ए-अदम का है सफ़र हौसले देखिए उन बे-सर-ओ-सामानों के सर झुकाए हुए बैठे हैं जो का'बे में 'क़मर' ऐसे होते हैं निकाले हुए बुतख़ानों के
Qamar Jalalvi
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