ghazalKuch Alfaaz

सुर्ख़ियाँ क्यूँँ ढूँढ़ कर लाऊँ फ़साने के लिए बस तुम्हारा नाम काफ़ी है ज़माने के लिए मौजें साहिल से हटाती हैं हबाबों का हुजूम वो चले आए हैं साहिल पर नहाने के लिए सोचता हूँ अब कहीं बिजली गिरी तो क्यूँँ गिरी तिनके लाया था कहाँ से आशियाने के लिए छोड़ कर बस्ती ये दीवाने कहाँ से आ गए दश्त की बैठी-बिठाई ख़ाक उड़ाने के लिए हँस के कहते हो ज़माना भर मुझी पर जान दे रह गए हो क्या तुम्हीं सारे ज़माने के लिए शाम को आओगे तुम अच्छा अभी होती है शाम गेसुओं को खोल दो सूरज छुपाने के लिए काएनात-ए-इश्क़ इक दिल के सिवा कुछ भी नहीं वो ही आने के लिए है वो ही जाने के लिए ऐ ज़माने भर को ख़ुशियाँ देने वाले ये बता क्या 'क़मर' ही रह गया है ग़म उठाने के लिए

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हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू क्या है न शो'ले में ये करिश्मा न बर्क़ में ये अदा कोई बताओ कि वो शोख़-ए-तुंद-ख़ू क्या है ये रश्क है कि वो होता है हम-सुख़न तुम से वगर्ना ख़ौफ़-ए-बद-आमोज़ी-ए-अदू क्या है चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन हमारे जैब को अब हाजत-ए-रफ़ू क्या है जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा कुरेदते हो जो अब राख जुस्तुजू क्या है रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है वो चीज़ जिस के लिए हम को हो बहिश्त अज़ीज़ सिवाए बादा-ए-गुलफ़ाम-ए-मुश्क-बू क्या है पि यूँँ शराब अगर ख़ुम भी देख लूँ दो-चार ये शीशा ओ क़दह ओ कूज़ा ओ सुबू क्या है रही न ताक़त-ए-गुफ़्तार और अगर हो भी तो किस उमीद पे कहिए कि आरज़ू क्या है हुआ है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता वगर्ना शहर में 'ग़ालिब' की आबरू क्या है

Mirza Ghalib

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मुझ ऐसे शख़्स से रिश्ता नहीं निकाल सका वो अपने हुस्न का सदक़ा नहीं निकाल सका मैं मिल रहा था उसे बा'द एक मुद्दत के सो उस सेे कोई भी रिश्ता नहीं निकाल सका तेरे लिए तो मुझे ज़िंदगी भी कम थी मगर मेरे लिए तो तू लम्हा नहीं निकाल सका तू देख पाई नहीं मुझ को ख़त्म होते हुए मैं तेरी आँख का कचरा नहीं निकाल सका इक ऐसी बात का ग़ुस्सा है मेरे लहजे में वो बात जिस का मैं ग़ुस्सा नहीं निकाल सका

Vikram Gaur Vairagi

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मेरे लिए तो इश्क़ का वा'दा है शा'इरी आधा सुरूर तुम हो तो आधा है शा'इरी रुद्राक्ष हाथ में है तो सीने में ओम है कृष्णा है मेरा दिल मेरी राधा है शा'इरी अपना तो मेल जोल ही बस आशिकों से है दरवेश का बस एक लबादा है शा'इरी हो आश्ना कोई तो दिखाती है अपना रंग बे रम्ज़ियों के वास्ते सादा है शा'इरी तुम सामने हो और मेरी दस्तरस में हो इस वक़्त मेरे दिल का इरादा है शा'इरी भगवान हो ख़ुदा हो मुहब्बत हो या बदन जिस सम्त भी चलो यही जादा है शा'इरी इस लिए भी इश्क़ ही लिखता हूँ मैं अली मेरा किसी से आख़री वा'दा है शा'इरी

Ali Zaryoun

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कोई उम्मीद बर नहीं आती कोई सूरत नज़र नहीं आती मौत का एक दिन मुअय्यन है नींद क्यूँँ रात भर नहीं आती आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी अब किसी बात पर नहीं आती जानता हूँ सवाब-ए-ताअत-ओ-ज़ोहद पर तबीअत इधर नहीं आती है कुछ ऐसी ही बात जो चुप हूँ वर्ना क्या बात कर नहीं आती क्यूँँ न चीख़ूँ कि याद करते हैं मेरी आवाज़ गर नहीं आती दाग़-ए-दिल गर नज़र नहीं आता बू भी ऐ चारा-गर नहीं आती हम वहाँ हैं जहाँ से हम को भी कुछ हमारी ख़बर नहीं आती मरते हैं आरज़ू में मरने की मौत आती है पर नहीं आती का'बा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब' शर्म तुम को मगर नहीं आती

Mirza Ghalib

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रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ कुछ तो मिरे पिंदार-ए-मोहब्बत का भरम रख तू भी तो कभी मुझ को मनाने के लिए आ पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो रस्म-ओ-रह-ए-दुनिया ही निभाने के लिए आ किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम तू मुझ से ख़फ़ा है तो ज़माने के लिए आ इक उम्र से हूँ लज़्ज़त-ए-गिर्या से भी महरूम ऐ राहत-ए-जाँ मुझ को रुलाने के लिए आ अब तक दिल-ए-ख़ुश-फ़हम को तुझ से हैं उम्मीदें ये आख़िरी शमएँ भी बुझाने के लिए आ

Ahmad Faraz

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कभी जो आँख पे गेसू-ए-यार होता है शराब-ख़ाने पे अब्र-ए-बहार होता है किसी का ग़म हो मिरे दिल पे बार होता है उसी का नाम ग़म-ए-रोज़गार होता है इलाही ख़ैर हो उन बे-ज़बाँ असीरों की क़फ़स के सामने ज़िक्र-ए-बहार होता है चमन में ऐसे भी दो चार हैं चमन वाले कि जिन को मौसम-ए-गुल नागवार होता है सवाल-ए-जाम तिरे मय-कदे में ऐ साक़ी जवाब-ए-गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार होता है हमें वफ़ा पे वफ़ा आज तक न रास आई उन्हें सितम पे सितम साज़गार होता है लबों पे आ गया दम बंद हो चुकीं आँखें चले भी आओ कि ख़त्म इंतिज़ार होता है कहाँ वो वस्ल की रातें कहाँ ये हिज्र के दिन ख़याल-ए-गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार होता है जुनूँ तो एक बड़ी चीज़ है मोहब्बत में ज़रा से अश्क से राज़ आश्कार होता है मिरे जनाज़े को देखा तो यास से बोले यहाँ पे आदमी बे-इख़्तियार होता है ख़ुदा रखे तुम्हें क्या कोई जौर भूल गए जो अब तलाश हमारा मज़ार होता है हमारा ज़ोर है क्या बाग़बाँ उठा लेंगे ये आशियाँ जो तुझे नागवार होता है अजीब कश्मकश-ए-बहर-ए-ग़म में दिल है 'क़मर' न डूबता है ये बेड़ा न पार होता है

Qamar Jalalvi

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किसी सूरत सहर नहीं होती रात इधर से उधर नहीं होती ख़ौफ़ सय्याद से न बर्क़ का डर बात ये अपने घर नहीं होती एक वो हैं कि रोज़ आते हैं एक हम हैं ख़बर नहीं होती अब मैं समझा हूँ काट कर शब-ए-ग़म ज़िंदगी मुख़्तसर नहीं होती कितनी पाबंद-ए-वज़्अ है शब-ए-ग़म कभी ग़ैरों के घर नहीं होती कितनी सीधी है राह-ए-मुल्क-ए-अदम हाजत-ए-राहबर नहीं होती सुन लिया होगा तुम ने हाल-ए-मरीज़ अब दवा कार-गर नहीं होती अर्श मिलता है मेरी आहों से लेकिन उन को ख़बर नहीं होती

Qamar Jalalvi

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किसी का नाम लो बे-नाम अफ़्साने बहुत से हैं न जाने किस को तुम कहते हो दीवाने बहुत से हैं जफ़ाओं के गले तुम से ख़ुदा जाने बहुत से हैं मगर महशर का दिन है अपने बेगाने बहुत से हैं बनाए दे रही हैं अजनबी नादारियाँ मुझ को तिरी महफ़िल में वर्ना जाने-पहचाने बहुत से हैं धरी रह जाएगी पाबंदी-ए-ज़िंदाँ जो अब छेड़ा ये दरबानों को समझा दो कि दीवाने बहुत से हैं बस अब सो जाओ नींद आँखों में है कल फिर सुनाएँगे ज़रा सी रह गई है रात अफ़्साने बहुत से हैं तुम्हें किस ने बुलाया मय-कशों से ये न कह साक़ी तबीअ'त मिल गई है वर्ना मयख़ाने बहुत से हैं बड़ी क़ुर्बानियों के बा'द रहना बाग़ में होगा अभी तो आशियाँ बिजली से जलवाने बहुत से हैं लिखी है ख़ाक उड़ानी ही अगर अपने मुक़द्दर में तिरे कूचे पे क्या मौक़ूफ़ वीराने बहुत से हैं न रो ऐ शम्अ'' मौजूदा पतंगों की मुसीबत पर अभी महफ़िल से बाहर तेरे परवाने बहुत से हैं मिरे कहने से होगी तर्क-ए-रस्म-ओ-राह ग़ैरों से बजा है आप ने कहने मिरे माने बहुत से हैं 'क़मर' अल्लाह साथ ईमान के मंज़िल पे पहुँचा दे हरम की राह में सुनते हैं बुत-ख़ाने बहुत से हैं

Qamar Jalalvi

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अब तो मुँह से बोल मुझ को देख दिन भर हो गया ऐ बुत-ए-ख़ामोश क्या सच-मुच का पत्थर हो गया अब तो चुप हो बाग़ में नालों से महशर हो गया ये भी ऐ बुलबुल कोई सय्याद का घर हो गया इल्तिमास-ए-क़त्ल पर कहते हो फ़ुर्सत ही नहीं अब तुम्हें इतना ग़ुरूर अल्लाहु-अकबर हो गया महफ़िल-ए-दुश्मन में जो गुज़री वो मेरे दिल से पूछ हर इशारा जुम्बिश-ए-अबरू का ख़ंजर हो गया आशियाने का बताएँ क्या पता ख़ाना-ब-दोश चार तिनके रख लिए जिस शाख़ पर घर हो गया हिर्स तो देखो फ़लक भी मुझ पे करता है सितम कोई पूछे तो भी क्या उन के बराबर हो गया सोख़्ता दिल में न मिलता तीर को ख़ूँ ऐ 'क़मर' ये भी कुछ मेहमाँ की क़िस्मत से मुयस्सर हो गया

Qamar Jalalvi

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बारिश में अहद तोड़ के गर मय-कशी हुई तौबा मरी फिरेगी कहाँ भीगती हुई पेश आए लाख रंज अगर इक ख़ुशी हुई परवरदिगार ये भी कोई ज़िंदगी हुई अच्छा तो दोनों वक़्त मिले कोसिए हुज़ूर फिर भी मरीज़-ए-ग़म की अगर ज़िंदगी हुई ऐ अंदलीब अपने नशेमन की ख़ैर माँग बिजली गई है सू-ए-चमन देखती हुई देखो चराग़-ए-क़ब्र उसे क्या जवाब दे आएगी शाम-ए-हिज्र मुझे पूछती हुई क़ासिद उन्हीं को जा के दिया था हमारा ख़त वो मिल गए थे उन से कोई बात भी हुई? जब तक कि तेरी बज़्म में चलता रहेगा जाम साक़ी रहेगी गर्दिश-ए-दौराँ रुकी हुई माना कि उन से रात का वा'दा है ऐ 'क़मर' कैसे वो आ सकेंगे अगर चाँदनी हुई

Qamar Jalalvi

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