कभी जो आँख पे गेसू-ए-यार होता है शराब-ख़ाने पे अब्र-ए-बहार होता है किसी का ग़म हो मिरे दिल पे बार होता है उसी का नाम ग़म-ए-रोज़गार होता है इलाही ख़ैर हो उन बे-ज़बाँ असीरों की क़फ़स के सामने ज़िक्र-ए-बहार होता है चमन में ऐसे भी दो चार हैं चमन वाले कि जिन को मौसम-ए-गुल नागवार होता है सवाल-ए-जाम तिरे मय-कदे में ऐ साक़ी जवाब-ए-गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार होता है हमें वफ़ा पे वफ़ा आज तक न रास आई उन्हें सितम पे सितम साज़गार होता है लबों पे आ गया दम बंद हो चुकीं आँखें चले भी आओ कि ख़त्म इंतिज़ार होता है कहाँ वो वस्ल की रातें कहाँ ये हिज्र के दिन ख़याल-ए-गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार होता है जुनूँ तो एक बड़ी चीज़ है मोहब्बत में ज़रा से अश्क से राज़ आश्कार होता है मिरे जनाज़े को देखा तो यास से बोले यहाँ पे आदमी बे-इख़्तियार होता है ख़ुदा रखे तुम्हें क्या कोई जौर भूल गए जो अब तलाश हमारा मज़ार होता है हमारा ज़ोर है क्या बाग़बाँ उठा लेंगे ये आशियाँ जो तुझे नागवार होता है अजीब कश्मकश-ए-बहर-ए-ग़म में दिल है 'क़मर' न डूबता है ये बेड़ा न पार होता है
Related Ghazal
कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे शाम हुए ख़ुश-बाश यहाँ के मेरे पास आ जाते हैं मेरे बुझने का नज़्ज़ारा करने आ जाते होंगे वो जो न आने वाला है ना उस से मुझ को मतलब था आने वालों से क्या मतलब आते हैं आते होंगे उस की याद की बाद-ए-सबा में और तो क्या होता होगा यूँँही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे मेरा साँस उखड़ते ही सब बैन करेंगे रोएँगे या'नी मेरे बा'द भी या'नी साँस लिए जाते होंगे
Jaun Elia
88 likes
हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए
Yasir Khan
92 likes
चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ
Ali Zaryoun
105 likes
आँख को आइना समझते हो तुम भी सबकी तरह समझते हो दोस्त अब क्यूँ नहीं समझते तुम तुम तो कहते थे ना समझते हो अपना ग़म तुम को कैसे समझाऊँ सब सेे हारा हुआ समझते हो मेरी दुनिया उजड़ गई इस में तुम इसे हादसा समझते हो आख़िरी रास्ता तो बाक़ी है आख़िरी रास्ता समझते हो
Himanshi babra KATIB
76 likes
मैं ने चाहा तो नहीं था कि कभी ऐसा हो लेकिन अब ठान चुके हो तो चलो अच्छा हो तुम से नाराज़ तो मैं और किसी बात पे हूँ तुम मगर और किसी वजह से शर्मिंदा हो अब कहीं जा के ये मालूम हुआ है मुझ को ठीक रह जाता है जो शख़्स तेरे जैसा हो ऐसे हालात में हो भी कोई हस्सास तो क्या और बे-हिस भी अगर हो तो कोई कितना हो ताकि तू समझे कि मर्दों के भी दुख होते हैं मैं ने चाहा भी यही था कि तेरा बेटा हो
Jawwad Sheikh
50 likes
More from Qamar Jalalvi
सुर्ख़ियाँ क्यूँँ ढूँढ़ कर लाऊँ फ़साने के लिए बस तुम्हारा नाम काफ़ी है ज़माने के लिए मौजें साहिल से हटाती हैं हबाबों का हुजूम वो चले आए हैं साहिल पर नहाने के लिए सोचता हूँ अब कहीं बिजली गिरी तो क्यूँँ गिरी तिनके लाया था कहाँ से आशियाने के लिए छोड़ कर बस्ती ये दीवाने कहाँ से आ गए दश्त की बैठी-बिठाई ख़ाक उड़ाने के लिए हँस के कहते हो ज़माना भर मुझी पर जान दे रह गए हो क्या तुम्हीं सारे ज़माने के लिए शाम को आओगे तुम अच्छा अभी होती है शाम गेसुओं को खोल दो सूरज छुपाने के लिए काएनात-ए-इश्क़ इक दिल के सिवा कुछ भी नहीं वो ही आने के लिए है वो ही जाने के लिए ऐ ज़माने भर को ख़ुशियाँ देने वाले ये बता क्या 'क़मर' ही रह गया है ग़म उठाने के लिए
Qamar Jalalvi
0 likes
किसी सूरत सहर नहीं होती रात इधर से उधर नहीं होती ख़ौफ़ सय्याद से न बर्क़ का डर बात ये अपने घर नहीं होती एक वो हैं कि रोज़ आते हैं एक हम हैं ख़बर नहीं होती अब मैं समझा हूँ काट कर शब-ए-ग़म ज़िंदगी मुख़्तसर नहीं होती कितनी पाबंद-ए-वज़्अ है शब-ए-ग़म कभी ग़ैरों के घर नहीं होती कितनी सीधी है राह-ए-मुल्क-ए-अदम हाजत-ए-राहबर नहीं होती सुन लिया होगा तुम ने हाल-ए-मरीज़ अब दवा कार-गर नहीं होती अर्श मिलता है मेरी आहों से लेकिन उन को ख़बर नहीं होती
Qamar Jalalvi
0 likes
बारिश में अहद तोड़ के गर मय-कशी हुई तौबा मरी फिरेगी कहाँ भीगती हुई पेश आए लाख रंज अगर इक ख़ुशी हुई परवरदिगार ये भी कोई ज़िंदगी हुई अच्छा तो दोनों वक़्त मिले कोसिए हुज़ूर फिर भी मरीज़-ए-ग़म की अगर ज़िंदगी हुई ऐ अंदलीब अपने नशेमन की ख़ैर माँग बिजली गई है सू-ए-चमन देखती हुई देखो चराग़-ए-क़ब्र उसे क्या जवाब दे आएगी शाम-ए-हिज्र मुझे पूछती हुई क़ासिद उन्हीं को जा के दिया था हमारा ख़त वो मिल गए थे उन से कोई बात भी हुई? जब तक कि तेरी बज़्म में चलता रहेगा जाम साक़ी रहेगी गर्दिश-ए-दौराँ रुकी हुई माना कि उन से रात का वा'दा है ऐ 'क़मर' कैसे वो आ सकेंगे अगर चाँदनी हुई
Qamar Jalalvi
0 likes
कब मेरा नशेमन अहल-ए-चमन गुलशन में गवारा करते हैं ग़ुंचे अपनी आवाज़ों में बिजली को पुकारा करते हैं अब नज़्अ' का आलम है मुझ पर तुम अपनी मोहब्बत वापस लो जब कश्ती डूबने लगती है तो बोझ उतारा करते हैं जाती हुई मय्यत देख के भी वल्लाह तुम उठ के आ न सके दो चार क़दम तो दुश्मन भी तकलीफ़ गवारा करते हैं बे-वजह न जाने क्यूँँ ज़िद है उन को शब-ए-फ़ुर्क़त वालों से वो रात बढ़ा देने के लिए गेसू को सँवारा करते हैं पोंछो न अरक़ रुख़्सारों से रंगीनी-ए-हुस्न को बढ़ने दो सुनते हैं कि शबनम के क़तरे फूलों को निखारा करते हैं कुछ हुस्न ओ इश्क़ में फ़र्क़ नहीं है भी तो फ़क़त रुस्वाई का तुम हो कि गवारा कर न सके हम हैं कि गवारा करते हैं तारों की बहारों में भी 'क़मर' तुम अफ़्सुर्दास रहते हो फूलों को तो देखो काँटों में हँस हँस के गुज़ारा करते हैं
Qamar Jalalvi
1 likes
किसी का नाम लो बे-नाम अफ़्साने बहुत से हैं न जाने किस को तुम कहते हो दीवाने बहुत से हैं जफ़ाओं के गले तुम से ख़ुदा जाने बहुत से हैं मगर महशर का दिन है अपने बेगाने बहुत से हैं बनाए दे रही हैं अजनबी नादारियाँ मुझ को तिरी महफ़िल में वर्ना जाने-पहचाने बहुत से हैं धरी रह जाएगी पाबंदी-ए-ज़िंदाँ जो अब छेड़ा ये दरबानों को समझा दो कि दीवाने बहुत से हैं बस अब सो जाओ नींद आँखों में है कल फिर सुनाएँगे ज़रा सी रह गई है रात अफ़्साने बहुत से हैं तुम्हें किस ने बुलाया मय-कशों से ये न कह साक़ी तबीअ'त मिल गई है वर्ना मयख़ाने बहुत से हैं बड़ी क़ुर्बानियों के बा'द रहना बाग़ में होगा अभी तो आशियाँ बिजली से जलवाने बहुत से हैं लिखी है ख़ाक उड़ानी ही अगर अपने मुक़द्दर में तिरे कूचे पे क्या मौक़ूफ़ वीराने बहुत से हैं न रो ऐ शम्अ'' मौजूदा पतंगों की मुसीबत पर अभी महफ़िल से बाहर तेरे परवाने बहुत से हैं मिरे कहने से होगी तर्क-ए-रस्म-ओ-राह ग़ैरों से बजा है आप ने कहने मिरे माने बहुत से हैं 'क़मर' अल्लाह साथ ईमान के मंज़िल पे पहुँचा दे हरम की राह में सुनते हैं बुत-ख़ाने बहुत से हैं
Qamar Jalalvi
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Qamar Jalalvi.
Similar Moods
More moods that pair well with Qamar Jalalvi's ghazal.







