ghazalKuch Alfaaz

कब मेरा नशेमन अहल-ए-चमन गुलशन में गवारा करते हैं ग़ुंचे अपनी आवाज़ों में बिजली को पुकारा करते हैं अब नज़्अ' का आलम है मुझ पर तुम अपनी मोहब्बत वापस लो जब कश्ती डूबने लगती है तो बोझ उतारा करते हैं जाती हुई मय्यत देख के भी वल्लाह तुम उठ के आ न सके दो चार क़दम तो दुश्मन भी तकलीफ़ गवारा करते हैं बे-वजह न जाने क्यूँँ ज़िद है उन को शब-ए-फ़ुर्क़त वालों से वो रात बढ़ा देने के लिए गेसू को सँवारा करते हैं पोंछो न अरक़ रुख़्सारों से रंगीनी-ए-हुस्न को बढ़ने दो सुनते हैं कि शबनम के क़तरे फूलों को निखारा करते हैं कुछ हुस्न ओ इश्क़ में फ़र्क़ नहीं है भी तो फ़क़त रुस्वाई का तुम हो कि गवारा कर न सके हम हैं कि गवारा करते हैं तारों की बहारों में भी 'क़मर' तुम अफ़्सुर्दास रहते हो फूलों को तो देखो काँटों में हँस हँस के गुज़ारा करते हैं

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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कभी जो आँख पे गेसू-ए-यार होता है शराब-ख़ाने पे अब्र-ए-बहार होता है किसी का ग़म हो मिरे दिल पे बार होता है उसी का नाम ग़म-ए-रोज़गार होता है इलाही ख़ैर हो उन बे-ज़बाँ असीरों की क़फ़स के सामने ज़िक्र-ए-बहार होता है चमन में ऐसे भी दो चार हैं चमन वाले कि जिन को मौसम-ए-गुल नागवार होता है सवाल-ए-जाम तिरे मय-कदे में ऐ साक़ी जवाब-ए-गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार होता है हमें वफ़ा पे वफ़ा आज तक न रास आई उन्हें सितम पे सितम साज़गार होता है लबों पे आ गया दम बंद हो चुकीं आँखें चले भी आओ कि ख़त्म इंतिज़ार होता है कहाँ वो वस्ल की रातें कहाँ ये हिज्र के दिन ख़याल-ए-गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार होता है जुनूँ तो एक बड़ी चीज़ है मोहब्बत में ज़रा से अश्क से राज़ आश्कार होता है मिरे जनाज़े को देखा तो यास से बोले यहाँ पे आदमी बे-इख़्तियार होता है ख़ुदा रखे तुम्हें क्या कोई जौर भूल गए जो अब तलाश हमारा मज़ार होता है हमारा ज़ोर है क्या बाग़बाँ उठा लेंगे ये आशियाँ जो तुझे नागवार होता है अजीब कश्मकश-ए-बहर-ए-ग़म में दिल है 'क़मर' न डूबता है ये बेड़ा न पार होता है

Qamar Jalalvi

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किसी का नाम लो बे-नाम अफ़्साने बहुत से हैं न जाने किस को तुम कहते हो दीवाने बहुत से हैं जफ़ाओं के गले तुम से ख़ुदा जाने बहुत से हैं मगर महशर का दिन है अपने बेगाने बहुत से हैं बनाए दे रही हैं अजनबी नादारियाँ मुझ को तिरी महफ़िल में वर्ना जाने-पहचाने बहुत से हैं धरी रह जाएगी पाबंदी-ए-ज़िंदाँ जो अब छेड़ा ये दरबानों को समझा दो कि दीवाने बहुत से हैं बस अब सो जाओ नींद आँखों में है कल फिर सुनाएँगे ज़रा सी रह गई है रात अफ़्साने बहुत से हैं तुम्हें किस ने बुलाया मय-कशों से ये न कह साक़ी तबीअ'त मिल गई है वर्ना मयख़ाने बहुत से हैं बड़ी क़ुर्बानियों के बा'द रहना बाग़ में होगा अभी तो आशियाँ बिजली से जलवाने बहुत से हैं लिखी है ख़ाक उड़ानी ही अगर अपने मुक़द्दर में तिरे कूचे पे क्या मौक़ूफ़ वीराने बहुत से हैं न रो ऐ शम्अ'' मौजूदा पतंगों की मुसीबत पर अभी महफ़िल से बाहर तेरे परवाने बहुत से हैं मिरे कहने से होगी तर्क-ए-रस्म-ओ-राह ग़ैरों से बजा है आप ने कहने मिरे माने बहुत से हैं 'क़मर' अल्लाह साथ ईमान के मंज़िल पे पहुँचा दे हरम की राह में सुनते हैं बुत-ख़ाने बहुत से हैं

Qamar Jalalvi

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सुर्ख़ियाँ क्यूँँ ढूँढ़ कर लाऊँ फ़साने के लिए बस तुम्हारा नाम काफ़ी है ज़माने के लिए मौजें साहिल से हटाती हैं हबाबों का हुजूम वो चले आए हैं साहिल पर नहाने के लिए सोचता हूँ अब कहीं बिजली गिरी तो क्यूँँ गिरी तिनके लाया था कहाँ से आशियाने के लिए छोड़ कर बस्ती ये दीवाने कहाँ से आ गए दश्त की बैठी-बिठाई ख़ाक उड़ाने के लिए हँस के कहते हो ज़माना भर मुझी पर जान दे रह गए हो क्या तुम्हीं सारे ज़माने के लिए शाम को आओगे तुम अच्छा अभी होती है शाम गेसुओं को खोल दो सूरज छुपाने के लिए काएनात-ए-इश्क़ इक दिल के सिवा कुछ भी नहीं वो ही आने के लिए है वो ही जाने के लिए ऐ ज़माने भर को ख़ुशियाँ देने वाले ये बता क्या 'क़मर' ही रह गया है ग़म उठाने के लिए

Qamar Jalalvi

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किसी सूरत सहर नहीं होती रात इधर से उधर नहीं होती ख़ौफ़ सय्याद से न बर्क़ का डर बात ये अपने घर नहीं होती एक वो हैं कि रोज़ आते हैं एक हम हैं ख़बर नहीं होती अब मैं समझा हूँ काट कर शब-ए-ग़म ज़िंदगी मुख़्तसर नहीं होती कितनी पाबंद-ए-वज़्अ है शब-ए-ग़म कभी ग़ैरों के घर नहीं होती कितनी सीधी है राह-ए-मुल्क-ए-अदम हाजत-ए-राहबर नहीं होती सुन लिया होगा तुम ने हाल-ए-मरीज़ अब दवा कार-गर नहीं होती अर्श मिलता है मेरी आहों से लेकिन उन को ख़बर नहीं होती

Qamar Jalalvi

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कभी कहा न किसी से तिरे फ़साने को न जाने कैसे ख़बर हो गई ज़माने को दुआ बहार की माँगी तो इतने फूल खिले कहीं जगह न रही मेरे आशियाने को मिरी लहद पे पतंगों का ख़ून होता है हुज़ूर शम्अ'' न लाया करें जलाने को सुना है ग़ैर की महफ़िल में तुम न जाओगे कहो तो आज सजा लूँ ग़रीब-ख़ाने को दबा के क़ब्र में सब चल दिए दुआ न सलाम ज़रा सी देर में क्या हो गया ज़माने को अब आगे इस में तुम्हारा भी नाम आएगा जो हुक्म हो तो यहीं छोड़ दूँ फ़साने को 'क़मर' ज़रा भी नहीं तुम को ख़ौफ़-ए-रुस्वाई चले हो चाँदनी शब में उन्हें बुलाने को

Qamar Jalalvi

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