बे-ख़याली में यूँँ ही बस इक इरादा कर लिया अपने दिल के शौक़ को हद से ज़ियादा कर लिया जानते थे दोनों हम उस को निभा सकते नहीं उस ने वा'दा कर लिया मैं ने भी वा'दा कर लिया ग़ैर से नफ़रत जो पा ली ख़र्च ख़ुद पर हो गई जितने हम थे हम ने ख़ुद को उस से आधा कर लिया शाम के रंगों में रख कर साफ़ पानी का गिलास आब-ए-सादा को हरीफ़-ए-रंग-ए-बादा कर लिया हिजरतों का ख़ौफ़ था या पुर-कशिश कोहना मक़ाम क्या था जिस को हम ने ख़ुद दीवार-ए-जादा कर लिया एक ऐसा शख़्स बनता जा रहा हूँ मैं 'मुनीर' जिस ने ख़ुद पर बंद हुस्न ओ जाम-ओ-बादा कर लिया
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है
Shabeena Adeeb
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला
Tehzeeb Hafi
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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
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हँसी छुपा भी गया और नज़र मिला भी गया ये इक झलक का तमाशा जिगर जला भी गया उठा तो जा भी चुका था अजीब मेहमाँ था सदाएँ दे के मुझे नींद से जगा भी गया ग़ज़ब हुआ जो अँधेरे में जल उठी बिजली बदन किसी का तिलिस्मात कुछ दिखा भी गया न आया कोई लब-ए-बाम शाम ढलने लगी वुफ़ूर-ए-शौक़ से आँखों में ख़ून आ भी गया हवा थी गहरी घटा थी हिना की ख़ुशबू थी ये एक रात का क़िस्सा लहू रुला भी गया चलो 'मुनीर' चलें अब यहाँ रहें भी तो क्या वो संग-दिल तो यहाँ से कहीं चला भी गया
Muneer Niyazi
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ज़िंदा रहें तो क्या है जो मर जाएँ हम तो क्या दुनिया से ख़ामुशी से गुज़र जाएँ हम तो क्या हस्ती ही अपनी क्या है ज़माने के सामने इक ख़्वाब हैं जहाँ में बिखर जाएँ हम तो क्या अब कौन मुंतज़िर है हमारे लिए वहाँ शाम आ गई है लौट के घर जाएँ हम तो क्या दिल की ख़लिश तो साथ रहेगी तमाम उम्र दरिया-ए-ग़म के पार उतर जाएँ हम तो क्या
Muneer Niyazi
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