मकाँ है क़ब्र जिसे लोग ख़ुद बनाते हैं मैं अपने घर में हूँ या मैं किसी मज़ार में हूँ

Writer
Muneer Niyazi
@muneer-niyazi
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Nazm
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sherKuch Alfaaz
sherKuch Alfaaz
मोहब्बत अब नहीं होगी ये कुछ दिन बा'द में होगी गुज़र जाएँगे जब ये दिन ये उन की याद में होगी
sherKuch Alfaaz
हम भी 'मुनीर' अब दुनिया-दारी कर के वक़्त गुज़ारेंगे होते होते जीने के भी लाख बहाने आ जाते हैं
sherKuch Alfaaz
ख़्वाब होते हैं देखने के लिए उन में जा कर मगर रहा न करो
sherKuch Alfaaz
ग़म की बारिश ने भी तेरे नक़्श को धोया नहीं तू ने मुझ को खो दिया मैं ने तुझे खोया नहीं
sherKuch Alfaaz
हम भी घर से 'मुनीर' तब निकले बात अपनों की जब सही न गई
sherKuch Alfaaz
कुछ वक़्त चाहते थे कि सोचें तिरे लिए तू ने वो वक़्त हम को ज़माने नहीं दिया
sherKuch Alfaaz
महक उठे रंग-ए-सुर्ख़ जैसे खिले चमन में गुलाब इतने
sherKuch Alfaaz
वक़्त किस तेज़ी से गुज़रा रोज़-मर्रा में 'मुनीर' आज कल होता गया और दिन हवा होते गए
sherKuch Alfaaz
शहर का तब्दील होना शाद रहना और उदास रौनक़ें जितनी यहाँ हैं औरतों के दम से हैं
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