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भूल जाना था तो फिर अपना बनाया क्यूँँ था तुम ने उल्फ़त का यक़ीं मुझ को दिलाया क्यूँँ था एक भटके हुए राही को सहारा दे कर झूटी मंज़िल का निशाँ तुम ने दिखाया क्यूँँ था ख़ुद ही तूफ़ान उठाना था मोहब्बत में अगर डूबने से मिरी कश्ती को बचाया क्यूँँ था जिस की ता'बीर अब अश्कों के सिवा कुछ भी नहीं ख़्वाब ऐसा मेरी आँखों को दिखाया क्यूँँ था अपने अंजाम पे अब क्यूँँ हो पशेमान 'सबा' एक बे-दर्द से दिल तुम ने लगाया क्यूँँ था

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो

Tehzeeb Hafi

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थोड़ा लिक्खा और ज़ियादा छोड़ दिया आने वालों के लिए रस्ता छोड़ दिया तुम क्या जानो उस दरिया पर क्या गुज़री तुम ने तो बस पानी भरना छोड़ दिया लड़कियाँ इश्क़ में कितनी पागल होती हैं फ़ोन बजा और चूल्हा जलता छोड़ दिया रोज़ इक पत्ता मुझ में आ गिरता है जब से मैं ने जंगल जाना छोड़ दिया बस कानों पर हाथ रखे थे थोड़ी देर और फिर उस आवाज़ ने पीछा छोड़ दिए

Tehzeeb Hafi

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हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए

Yasir Khan

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तेरा चुप रहना मेरे ज़ेहन में क्या बैठ गया इतनी आवाज़ें तुझे दीं कि गला बैठ गया यूँँ नहीं है कि फ़क़त मैं ही उसे चाहता हूँ जो भी उस पेड़ की छाँव में गया बैठ गया इतना मीठा था वो ग़ुस्से भरा लहजा मत पूछ उस ने जिस को भी जाने का कहा, बैठ गया अपना लड़ना भी मोहब्बत है तुम्हें इल्म नहीं चीख़ती तुम रही और मेरा गला बैठ गया उस की मर्ज़ी वो जिसे पास बिठा ले अपने इस पे क्या लड़ना फुलाँ मेरी जगह बैठ गया बात दरियाओं की, सूरज की, न तेरी है यहाँ दो क़दम जो भी मेरे साथ चला बैठ गया बज़्म-ए-जानाँ में नशिस्तें नहीं होतीं मख़्सूस जो भी इक बार जहाँ बैठ गया बैठ गया

Tehzeeb Hafi

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गुलशन की फ़क़त फूलों से नहीं काँटों से भी ज़ीनत होती है जीने के लिए इस दुनिया में ग़म की भी ज़रूरत होती है हर शाम-ओ-सहर क़ुर्बां जिस पर दुनिया-ए-मसर्रत होती है वो पैकर-ए-राहत क्या जाने कैसी शब-ए-फ़ुर्क़त होती है ऐ वाइज़-ए-नादाँ करता है तू एक क़यामत का चर्चा याँ रोज़ निगाहें मिलती हैं याँ रोज़ क़यामत होती है करना ही पड़ेगा ज़ब्त-ए-अलम पीने ही पड़ेंगे ये आँसू फ़रियाद-ओ-फ़ुग़ाँ से ऐ नादाँ तौहीन-ए-मोहब्बत होती है वो पुर्सिश-ए-ग़म को आए हैं कुछ कह न सकूँ चुप रह न सकूँ ख़ामोश रहूँ तो मुश्किल है कह दूँ तो शिकायत होती है ऐ दोस्त जुदाई में तेरी कुछ ऐसे भी लम्हे आते हैंसजों पे भी तड़पा करता हूँ काँटों पे भी राहत होती है जो आ के रुके दामन पे 'सबा' वो अश्क नहीं है पानी है जो अश्क न छलके आँखों से उस अश्क की क़ीमत होती है

Saba Afghani

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