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छुप जाता है फिर सूरज जिस वक़्त निकलता है कोई इन आँखों में सारी रात टहलता है चम्पई सुब्हें पीली दो-पहरें सुरमई शा में दिन ढलने से पहले कितने रंग बदलता है दिन में धूपें बन कर जाने कौन सुलगता था रात में शबनम बन कर जाने कौन पिघलता है ख़ामोशी के नाख़ुन से छिल जाया करते हैं कोई फिर इन ज़ख़्मों पर आवाज़ें मलता है रात उगलता रहता है वो एक बड़ा साया छोटे छोटे साए जो हर शाम निगलता है

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

Waseem Barelvi

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बग़ैर उस को बताए निभाना पड़ता है ये इश्क़ राज़ है इस को छुपाना पड़ता है मैं अपने ज़ेहन की ज़िदस बहुत परेशाँ हूँ तेरे ख़याल की चौखट पे आना पड़ता है तेरे बग़ैर ही अच्छे थे क्या मुसीबत है ये कैसा प्यार है हर दिन जताना पड़ता है

Mehshar Afridi

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सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो कहीं नहीं कोई सूरज धुआँ धुआँ है फ़ज़ा ख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो यही है ज़िंदगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो

Nida Fazli

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नया इक रिश्ता पैदा क्यूँँ करें हम बिछड़ना है तो झगड़ा क्यूँँ करें हम ख़मोशी से अदा हो रस्म-ए-दूरी कोई हंगामा बरपा क्यूँँ करें हम ये काफ़ी है कि हम दुश्मन नहीं हैं वफ़ा-दारी का दावा क्यूँँ करें हम वफ़ा इख़्लास क़ुर्बानी मोहब्बत अब इन लफ़्ज़ों का पीछा क्यूँँ करें हम हमारी ही तमन्ना क्यूँँ करो तुम तुम्हारी ही तमन्ना क्यूँँ करें हम किया था अहद जब लम्हों में हम ने तो सारी उम्र ईफ़ा क्यूँँ करें हम नहीं दुनिया को जब पर्वा हमारी तो फिर दुनिया की पर्वा क्यूँँ करें हम ये बस्ती है मुसलामानों की बस्ती यहाँ कार-ए-मसीहा क्यूँँ करें हम

Jaun Elia

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उन को ख़ला में कोई नज़र आना चाहिए आँखों को टूटे ख़्वाब का हर्जाना चाहिए वो काम रह के करना पड़ा शहर में हमें मजनूँ को जिस के वास्ते वीराना चाहिए इस ज़ख़्म-ए-दिल पे आज भी सुर्ख़ी को देख कर इतरा रहे हैं हम हमें इतराना चाहिए तन्हाइयों पे अपनी नज़र कर ज़रा कभी ऐ बेवक़ूफ़ दिल तुझे घबराना चाहिए है हिज्र तो कबाब न खाने से क्या उसूल गर इश्क़ है तो क्या हमें मर जाना चाहिए दानाइयाँ भी ख़ूब हैं लेकिन अगर मिले धोखा हसीन सा तो उसे खाना चाहिए बीते दिनों की कोई निशानी तो साथ हो जान-ए-हया तुम्हें ज़रा शर्माना चाहिए इस शाइ'री में कुछ नहीं नक़्क़ाद के लिए दिलदार चाहिए कोई दीवाना चाहिए

Ameer Imam

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कि जैसे कोई मुसाफ़िर वतन में लौट आए हुई जो शाम तो फिर से थकन में लौट आए न आबशार न सहरा लगा सके क़ीमत हम अपनी प्यास को ले कर दहन में लौट आए सफ़र तवील बहुत था किसी की आँखों तक तो उस के बा'द हम अपने बदन में लौट आए कभी गए थे हवाओं का सामना करने सभी चराग़ उसी अंजुमन में लौट आए किसी तरह तो फ़ज़ाओं की ख़ामुशी टूटे तो फिर से शोर-ए-सलासिल चलन में लौट आए 'अमीर' इमाम बताओ ये माजरा क्या है तुम्हारे शे'र उसी बाँकपन में लौट आए

Ameer Imam

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ज़मीं के सारे मनाज़िर से कट के सोता हूँ मैं आसमाँ के सफ़र से पलट के सोता हूँ मैं जम्अ'' करता हूँ शब के सियाही क़तरों को ब-वक़्त-ए-सुब्ह फिर उन को पलट के सोता हूँ तलाश धूप में करता हूँ सारा दिन ख़ुद को तमाम-रात सितारों में बट के सोता हूँ कहाँ सुकूँ कि शब-ओ-रोज़ घूमना उस का ज़रा ज़मीन के मेहवर से हट के सोता हूँ तिरे बदन की ख़लाओं में आँख खुलती है हवा के जिस्म से जब जब लिपट के सोता हूँ मैं जाग जाग के रातें गुज़ारने वाला इक ऐसी रात भी आती है डट के सोता हूँ

Ameer Imam

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वो अपने बंद-ए-क़बा खोलती तो क्या लगती ख़ुदा के वास्ते कोई कहे ख़ुदा-लगती यक़ीन थी तो यक़ीं में समा गई कैसे गुमान थी तो गुमाँ से भी मावरा लगती अगर बिखरती तो सूरज कभी नहीं उगता तिरा ख़याल कि वो ज़ुल्फ़ बस घटा लगती तिरे मरीज़ को दुनिया में कुछ नहीं लगता दवा लगे न रक़ीबों की बद-दुआ' लगती हुई है क़ैद ज़माने में रौशनी किस से भला वो जिस्म और उस को कोई क़बा लगती लगी वो तुझ सी तो आलम में मुनफ़रिद ठहरी वगर्ना आम सी लगती अगर जुदा लगती

Ameer Imam

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हर आह-ए-सर्द इश्क़ है हर वाह इश्क़ है होती है जो भी जुरअत-ए-निगाह इश्क़ है दरबान बन के सर को झुकाए खड़ी है अक़्ल दरबार-ए-दिल कि जिस का शहंशाह इश्क़ है सुन ऐ ग़ुरूर-ए-हुस्न तिरा तज़्किरा है क्या असरार-ए-काएनात से आगाह इश्क़ है जब्बार भी रहीम भी क़हहार भी वही सारे उसी के नाम हैं अल्लाह इश्क़ है मेहनत का फल है सदक़ा-ओ-ख़ैरात क्यूँँ कहें जीने की हम जो पाते हैं तनख़्वाह इश्क़ है चेहरे फ़क़त पड़ाव हैं मंज़िल नहीं तिरी ऐ कारवान-ए-इ'श्क़ तिरी राह इश्क़ है ऐसे हैं हम तो कोई हमारी ख़ता नहीं लिल्लाह इश्क़ है हमें वल्लाह इश्क़ है हों वो 'अमीर-इमाम' कि फ़रहाद-ओ-क़ैस हों आओ कि हर शहीद की दरगाह इश्क़ है

Ameer Imam

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