वो एक अश्क जो हासिल है ज़िंदगानी का तमाम उम्र के मंज़र निचोड़ कर निकला
Writer
Ameer Imam
@ameer-imam
6
Sher
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Ghazal
1
Nazm
लुत्फ़ आता है बहुत सोच के मुझ को कि रक़ीब रंगत-ए-लब को तेरी पान समझते होंगे
बे-सबब मरने से अच्छा है कि हो कोई सबब दोस्तों सिगरेट पियो मय-ख़्वारियाँ करते रहो
असर करती है कोई-कोई बात आहिस्ता आहिस्ता समझ में आते हैं कुछ मोजज़ात आहिस्ता आहिस्ता
अब सुलगती है हथेली तो ख़याल आता है वो बदन सिर्फ़ निहारा भी तो जा सकता था
पूछ मुझ सेे कि तेरे होंठ पे तिल है क्यूँँ कर ऐसा नुक़्ता कहीं नादान समझते होंगे
ख़ुद हुस्न से न पूछिए ता'रीफ़ हुस्न की दीवाने से ये पूछिए दीवाना क्यूँँ हुआ
ख़ाक को ख़ाक से मिलने नहीं देती दुनिया मर भी जाएँ तो कफ़न बीच में आ जाता है
कर ही क्या सकती है दुनिया और तुझ को देख कर देखती जाएगी और हैरान होती जाएगी
तू ने जिस बात को इज़हार-ए-मुहब्बत समझा बात करने को बस इक बात रखी थी हम ने
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