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ज़मीं के सारे मनाज़िर से कट के सोता हूँ मैं आसमाँ के सफ़र से पलट के सोता हूँ मैं जम्अ'' करता हूँ शब के सियाही क़तरों को ब-वक़्त-ए-सुब्ह फिर उन को पलट के सोता हूँ तलाश धूप में करता हूँ सारा दिन ख़ुद को तमाम-रात सितारों में बट के सोता हूँ कहाँ सुकूँ कि शब-ओ-रोज़ घूमना उस का ज़रा ज़मीन के मेहवर से हट के सोता हूँ तिरे बदन की ख़लाओं में आँख खुलती है हवा के जिस्म से जब जब लिपट के सोता हूँ मैं जाग जाग के रातें गुज़ारने वाला इक ऐसी रात भी आती है डट के सोता हूँ

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर

Anwar Shaoor

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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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यूँँ मिरे होने को मुझ पर आश्कार उस ने किया मुझ में पोशीदा किसी दरिया को पार उस ने किया पहले सहरा से मुझे लाया समुंदर की तरफ़ नाव पर काग़ज़ की फिर मुझ को सवार उस ने किया मैं था इक आवाज़ मुझ को ख़ामुशी से तोड़ कर किर्चियों को देर तक मेरी शुमार उस ने किया दिन चढ़ा तो धूप की मुझ को सलीबें दे गया रात आई तो मिरे बिस्तर को दार उस ने किया जिस को उस ने रौशनी समझा था मेरी धूप थी शाम होने का मिरी फिर इंतिज़ार उस ने किया देर तक बुनता रहा आँखों के करघे पर मुझे बुन गया जब मैं तो मुझ को तार तार उस ने किया

Ameer Imam

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आग के साथ मैं बहता हुआ पानी सुनना रात-भर अपने अनासिर की सुनानी सुनना देखना रोज़ अँधेरों में शुआ'ओं की नुमू पत्थरों में किसी दरिया की रवानी सुनना वो सुनाएँगी कभी मेरी कहानी तुम को तुम हवाओं से कभी मेरी कहानी सुनना मेरी ख़ामोशी मिरी मश्क़ है इस मश्क़ में तुम मार कर तीर मिरी तिश्ना-दहानी सुनना उम्र ना-काफ़ी है इस हिज्रत-ए-अव्वल के लिए फिर जनम लूँ तो मिरी हिजरत-ए-सानी सुनना कम-सिनी पर है अजब हाल तुम्हारा यारो सुन लो आसान नहीं उस की जवानी सुनना गीत मेरे जो पसंद आते हैं इतने तुम को इन्हीं गीतों की कभी मर्सिया-ख़्वानी सुनना क्या नया तुम को सुनाऊँ कि नया कुछ भी नहीं नए लफ़्ज़ों में वही बात पुरानी सुनना

Ameer Imam

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कि जैसे कोई मुसाफ़िर वतन में लौट आए हुई जो शाम तो फिर से थकन में लौट आए न आबशार न सहरा लगा सके क़ीमत हम अपनी प्यास को ले कर दहन में लौट आए सफ़र तवील बहुत था किसी की आँखों तक तो उस के बा'द हम अपने बदन में लौट आए कभी गए थे हवाओं का सामना करने सभी चराग़ उसी अंजुमन में लौट आए किसी तरह तो फ़ज़ाओं की ख़ामुशी टूटे तो फिर से शोर-ए-सलासिल चलन में लौट आए 'अमीर' इमाम बताओ ये माजरा क्या है तुम्हारे शे'र उसी बाँकपन में लौट आए

Ameer Imam

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हर आह-ए-सर्द इश्क़ है हर वाह इश्क़ है होती है जो भी जुरअत-ए-निगाह इश्क़ है दरबान बन के सर को झुकाए खड़ी है अक़्ल दरबार-ए-दिल कि जिस का शहंशाह इश्क़ है सुन ऐ ग़ुरूर-ए-हुस्न तिरा तज़्किरा है क्या असरार-ए-काएनात से आगाह इश्क़ है जब्बार भी रहीम भी क़हहार भी वही सारे उसी के नाम हैं अल्लाह इश्क़ है मेहनत का फल है सदक़ा-ओ-ख़ैरात क्यूँँ कहें जीने की हम जो पाते हैं तनख़्वाह इश्क़ है चेहरे फ़क़त पड़ाव हैं मंज़िल नहीं तिरी ऐ कारवान-ए-इ'श्क़ तिरी राह इश्क़ है ऐसे हैं हम तो कोई हमारी ख़ता नहीं लिल्लाह इश्क़ है हमें वल्लाह इश्क़ है हों वो 'अमीर-इमाम' कि फ़रहाद-ओ-क़ैस हों आओ कि हर शहीद की दरगाह इश्क़ है

Ameer Imam

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ये किसी शख़्स को खोने की तलाफ़ी ठहरा मेरा होना मिरे होने में इज़ाफ़ी ठहरा जुर्म-ए-आदम तिरी पादाश थी दुनिया सारी आख़िरश हर कोई हक़दार-ए-मुआ'फ़ी ठहरा ये है तफ़्सील कि यक-लम्हा-ए-हैरत था कोई मुख़्तसर ये कि मिरी उम्र को काफ़ी ठहरा कुछ अयाँ हो न सका था तिरी आँखों जैसा वो बदन हो के बरहना भी ग़िलाफ़ी ठहरा जब ज़मीं घूम रही हो तो ठहरना कैसा कोई ठहरा तो ठहरने के मुनाफ़ी ठहरा क़ाफ़िया मिलते गए उम्र ग़ज़ल होती गई और चेहरा तिरा बुनियाद-ए-क़वाफ़ी ठहरा

Ameer Imam

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