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यूँँ मिरे होने को मुझ पर आश्कार उस ने किया मुझ में पोशीदा किसी दरिया को पार उस ने किया पहले सहरा से मुझे लाया समुंदर की तरफ़ नाव पर काग़ज़ की फिर मुझ को सवार उस ने किया मैं था इक आवाज़ मुझ को ख़ामुशी से तोड़ कर किर्चियों को देर तक मेरी शुमार उस ने किया दिन चढ़ा तो धूप की मुझ को सलीबें दे गया रात आई तो मिरे बिस्तर को दार उस ने किया जिस को उस ने रौशनी समझा था मेरी धूप थी शाम होने का मिरी फिर इंतिज़ार उस ने किया देर तक बुनता रहा आँखों के करघे पर मुझे बुन गया जब मैं तो मुझ को तार तार उस ने किया

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा

Hasan Abbasi

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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो

Jaun Elia

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उन को ख़ला में कोई नज़र आना चाहिए आँखों को टूटे ख़्वाब का हर्जाना चाहिए वो काम रह के करना पड़ा शहर में हमें मजनूँ को जिस के वास्ते वीराना चाहिए इस ज़ख़्म-ए-दिल पे आज भी सुर्ख़ी को देख कर इतरा रहे हैं हम हमें इतराना चाहिए तन्हाइयों पे अपनी नज़र कर ज़रा कभी ऐ बेवक़ूफ़ दिल तुझे घबराना चाहिए है हिज्र तो कबाब न खाने से क्या उसूल गर इश्क़ है तो क्या हमें मर जाना चाहिए दानाइयाँ भी ख़ूब हैं लेकिन अगर मिले धोखा हसीन सा तो उसे खाना चाहिए बीते दिनों की कोई निशानी तो साथ हो जान-ए-हया तुम्हें ज़रा शर्माना चाहिए इस शाइ'री में कुछ नहीं नक़्क़ाद के लिए दिलदार चाहिए कोई दीवाना चाहिए

Ameer Imam

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ज़मीं के सारे मनाज़िर से कट के सोता हूँ मैं आसमाँ के सफ़र से पलट के सोता हूँ मैं जम्अ'' करता हूँ शब के सियाही क़तरों को ब-वक़्त-ए-सुब्ह फिर उन को पलट के सोता हूँ तलाश धूप में करता हूँ सारा दिन ख़ुद को तमाम-रात सितारों में बट के सोता हूँ कहाँ सुकूँ कि शब-ओ-रोज़ घूमना उस का ज़रा ज़मीन के मेहवर से हट के सोता हूँ तिरे बदन की ख़लाओं में आँख खुलती है हवा के जिस्म से जब जब लिपट के सोता हूँ मैं जाग जाग के रातें गुज़ारने वाला इक ऐसी रात भी आती है डट के सोता हूँ

Ameer Imam

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है एक लाश की सूरत पड़ी हुई दुनिया सलीब-ए-वक़्त के ऊपर जड़ी हुई दुनिया हम ऐसे लोग ही ख़ुराक थे सदा इस की हमारे ख़ून को पी कर बड़ी हुई दुनिया तमाम उम्र भी दौड़ो न हाथ आएगी अजीब शय है ये साकित खड़ी हुई दुनिया हर एक शख़्स है पीछे पड़ा हुआ इस के हर एक शख़्स के पीछे पड़ी हुई दुनिया जदीद शे'र की सूरत जदीद शाइ'र के जदीद होने की ज़िद पर अड़ी हुई दुनिया हसीन लड़कियाँ ख़ुशबूएँ चाँदनी रातें और इन के बा'द भी ऐसी सड़ी हुई दुनिया 'अमीर इमाम' ने कूड़े में फेंक दी कब की जिसे तलब हो उठा ले पड़ी हुई दुनिया

Ameer Imam

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वो अपने बंद-ए-क़बा खोलती तो क्या लगती ख़ुदा के वास्ते कोई कहे ख़ुदा-लगती यक़ीन थी तो यक़ीं में समा गई कैसे गुमान थी तो गुमाँ से भी मावरा लगती अगर बिखरती तो सूरज कभी नहीं उगता तिरा ख़याल कि वो ज़ुल्फ़ बस घटा लगती तिरे मरीज़ को दुनिया में कुछ नहीं लगता दवा लगे न रक़ीबों की बद-दुआ' लगती हुई है क़ैद ज़माने में रौशनी किस से भला वो जिस्म और उस को कोई क़बा लगती लगी वो तुझ सी तो आलम में मुनफ़रिद ठहरी वगर्ना आम सी लगती अगर जुदा लगती

Ameer Imam

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रूदाद-ए-जाँ कहें जो ज़रा दम मिले हमें उस दिल के रास्ते में कई ख़म मिले हमें लब्बैक पहले हम ने कहा था रसूल-ए-हुस्न हो कार-ज़ार-ए-इश्क़ तो परचम मिले हमें आए इक ऐसा ज़ख़्म जो भरना न हो कभी या'नी हर एक ज़ख़्म का मरहम मिले हमें दिन में जहाँ सराब मिले थे हमें वहाँ आई जो रात क़तरा-ए-शबनम मिले हमें तुम जैसे और लोग भी होंगे जहान में ये बात और है कि बहुत कम मिले हमें जब साथ थे तो मिल के भी मिलना न हो सका जब से बिछड़ गए हो तो पैहम मिले हमें और फिर हमें भी ख़ुद पे बहुत प्यार आ गया उस की तरफ़ खड़े हुए जब हम मिले हमें जो उम्र-भर का साथ निभाता न मिल सका वैसे तो ज़िंदगी में बहुत ग़म मिले हमें

Ameer Imam

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