दशरथ जी की बंजर आँखें कैकेई की विषधर आँखें राम गए वन बनने भगवन कौशल्या की पत्थर आँखें भाई लखन सा कोई न दूजा चलने को हैं तत्पर आँखें आग लगी है सब आँखों में माँ सीता हैं पुष्कर आँखें उर्मिल को कोई क्या लिक्खे तन्हाई का अंबर आँखें काट गई हैं कर्म की रेखा इक दासी की ख़ंजर आँखें छोड़ नगर को जाते रघुवर सब लोगों की झर-झर आँखें
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पिता के माथे आया बस शिकन का दुख किसी मुफ़्लिस से पूछो पैरहन का दुख सभी ने राम का ही कष्ट देखा बस था दशरथ की भी आँखों में वचन का दुख फ़क़त दिलबर के जिस्मों तक ही सीमित है न जाने क्यूँ सुख़न-वर के सुख़न का दुख मोहब्बत में कलाई काटने वाले समझते ही नहीं अक्सर बहन का दुख बिना मर्ज़ी किसी से ब्याह दी जाए वही लड़की बताएगी छुअन का दुख गले भी लग न पाए वस्ल में उस के भला अब और क्या होगा बदन का दुख यहाँ हर शख़्स ख़ूँ का प्यासा लगता है यक़ीनन मज़हबी घिन है वतन का दुख मुझे फुटपाथ का मंज़र बताता है कि मज़दूरों ने चक्खा है थकन का दुख
Harsh saxena
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मैं राह-ए-जन्नत का अस्ल नक़्शा चुरा रहा था सो उँगलियों को तेरे लबों पर फिरा रहा था मैं इस लिए भी सर अपना हाँ में हिला रहा था मुझे पता है तू सिर्फ़ बातें बना रहा था बिछड़ के हम सेे हमारी ग़लती गिना रहा था हमारा ग़म था हमीं को आँखें दिखा रहा था वो ख़ुद को दुनिया का एक हिस्सा बना चुकी थी मैं अपने हिस्से का प्यार जिस पर लुटा रहा था तुम्हीं ने जाने को कह दिया है तुम्हीं कहोगे उसे बुलाओ, वो शे'र अच्छे सुना रहा था
Vikram Gaur Vairagi
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मैं कब तन्हा हुआ था याद होगा तुम्हारा फ़ैसला था याद होगा बहुत से उजले उजले फूल ले कर कोई तुम से मिला था याद होगा बिछी थीं हर तरफ़ आँखें ही आँखें कोई आँसू गिरा था याद होगा उदासी और बढ़ती जा रही थी वो चेहरा बुझ रहा था याद होगा वो ख़त पागल हवा के आँचलों पर किसे तुम ने लिखा था याद होगा
Bashir Badr
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मैं चाहता हूँ कि दिल में तिरा ख़याल न हो अजब नहीं कि मिरी ज़िंदगी वबाल न हो मैं चाहता हूँ तू यक-दम ही छोड़ जाए मुझे ये हर घड़ी तिरे जाने का एहतिमाल न हो मैं चाहता हूँ मोहब्बत पे अब की बार आए ज़वाल ऐसा कि जिस को कभी ज़वाल न हो मैं चाहता हूँ मोहब्बत सिरे से मिट जाए मैं चाहता हूँ उसे सोचना मुहाल न हो मैं चाहता हूँ मोहब्बत मुझे फ़ना कर दे फ़ना भी ऐसा कि जिस की कोई मिसाल न हो मैं चाहता हूँ मोहब्बत मिरा वो हाल करे कि ख़्वाब में भी दोबारा कभी मजाल न हो मैं चाहता हूँ कि इतना ही रब्त रह जाए वो याद आए मगर भूलना मुहाल न हो मैं चाहता हूँ मिरी आँखें नोच ली जाएँ तिरा ख़याल किसी तौर पाएमाल न हो मैं चाहता हूँ कि मैं ज़ख़्म ज़ख़्म हो जाऊँ और इस तरह कि कभी ख़ौफ़-ए-इंदिमाल न हो मिरी मिसाल हो सब की निगाह में 'जव्वाद' मैं चाहता हूँ किसी और का ये हाल न हो
Jawwad Sheikh
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तुम्हारे पास आते हैं तो साँसें भीग जाती हैं मोहब्बत इतनी मिलती है कि आँखें भीग जाती हैं तबस्सुम इत्र जैसा है हँसी बरसात जैसी है वो जब भी बात करती है तो बातें भीग जाती हैं तुम्हारी याद से दिल में उजाला होने लगता है तुम्हें जब गुनगुनाता हूँ तो रातें भीग जाती हैं ज़मीं की गोद भरती है तो क़ुदरत भी चहकती है नए पत्तों की आहट से भी शाख़ें भीग जाती हैं तिरे एहसास की ख़ुशबू हमेशा ताज़ा रहती है तिरी रहमत की बारिश से मुरादें भीग जाती हैं
Aalok Shrivastav
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