ghazalKuch Alfaaz

दौलत मिली जहान की नाम-ओ-निशाँ मिले सब कुछ मिला हमें न मगर मेहरबाँ मिले पहले भी जैसे देख चुके हों उन्हें कहीं अंजान वादियों में कुछ ऐसे निशाँ मिले बढ़ता गया मैं मंज़िल-ए-महबूब की तरफ़ हाइल अगरचे राह में संग-ए-गराँ मिले रोना पड़ा नसीब के हाथों हज़ार बार इक बार मुस्कुरा के जो तुम मेहरबाँ मिले हम को ख़ुशी मिली भी तो बस आरज़ी मिली लेकिन जो ग़म मिले वो ग़म-ए-जावेदाँ मिले बाक़ी रहेगी हश्र तक उन के करम की याद मुझ को रह-ए-हयात में जो मेहरबाँ मिले फिर क्यूँँ करे तलाश कोई और आस्ताँ वो ख़ुश-नसीब जिस को तिरा आस्ताँ मिले अहल-ए-सितम की दिल-शिकनी का सबब हुआ दिल का ये हौसला कि ग़म बे-कराँ मिले साक़ी की इक निगाह से काया पलट गई ज़ाहिद जो मय-कदे में मिले नौजवाँ मिले दैर-ओ-हरम के लोग भी दरमाँ न कर सके वो भी असीर-ए-कश्मकश-ए-ईन-ओ-आँ मिले नज़रें तलाश करती रहीं जिन को उम्र-भर 'दर्शन' को वो सुकून के लम्हे कहाँ मिले

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अक़्ल ने अच्छे अच्छों को बहकाया था शुक्र है हम पर कुछ वहशत का साया था तुम ने अपनी गर्दन ऊँची ही रक्खी वरना मैं तो माला ले कर आया था मैं अब तक उस के ही रंग में रंगा हूँ जिस ने सब सेे पहले रंग लगाया था मेरी राय सब सेे पहले ली जाए मैं ने सब सेे पहले धोख़ा खाया था सब को इल्म है फूल और ख़ुश्बू दोनों में सब सेे पहले किस ने हाथ छुड़ाया था इक लड़की ने फिर मुझ को बहकाया है इक लड़की ने अच्छे से समझाया था

Zubair Ali Tabish

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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन

Varun Anand

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अश्क-ए-नादाँ से कहो बा'द में पछताएँगे आप गिरकर मेरी आँखों से किधर जाएँगे अपने लफ़्ज़ों को तकल्लुम से गिरा कर जाना अपने लहजे की थकावट में बिखर जाएँगे इक तेरा घर था मेरी हद-ए-मुसाफ़ित लेकिन अब ये सोचा है कि हम हद से गुज़र जाएँगे अपने अफ़्कार जला डालेंगे काग़ज़ काग़ज़ सोच मर जाएगी तो हम आप भी मर जाएँगे इस सेे पहले कि जुदाई की ख़बर तुम सेे मिले हम ने सोचा है कि हम तुम सेे बिछड़ जाएँगे

Khalil Ur Rehman Qamar

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कभी मिलेंगे तो ये कर्ज़ भी उतारेंगे तुम्हारे चेहरे को पहरों तलक निहारेंगे ये क्या सितम कि खिलाड़ी बदल दिया उस ने हम इस उमीद पे बैठे थे हम ही हारेंगे हमारे बा'द तेरे इश्क़ में नए लड़के बदन तो चू मेंगे ज़ुल्फ़ें नहीं सँवारेंगे

Vikram Gaur Vairagi

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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

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