ghazalKuch Alfaaz

de uthi lau jo tire saath guzari hui shaam hujra-e-jan ki har ik chiiz pe taari hui shaam umr bhar dhuup lapete rahe apne tan par ham se pahni na gai us ki utari hui shaam pahle to mujh se miri zaat ka matlab puchha aur phir apne hi ehsas se aari hui shaam ai junun puchh isi lamha-e-maujud se puchh lams ye kis ka uthaya hai ki bhari hui shaam do hi kirdar numayan hain kahani men miri be-karan dasht hua main to shikari hui shaam is taraf dasht-e-badan men koi suraj duuba us taraf sina-e-aflak se jaari hui shaam main nasen kaat ke suraj men utar hi jaata par khayal aaya tira hijr ki maari hui shaam kya faqat ham se savalat kiye jaenge kya faqat ham se mukhatib hai ye haari hui shaam ham ne har shai men utarte hue dekha khud ko yaad aai jo tire qurb pe vaari hui shaam de uthi lau jo tere sath guzari hui sham hujra-e-jaan ki har ek chiz pe tari hui sham umr bhar dhup lapete rahe apne tan par hum se pahni na gai us ki utari hui sham pahle to mujh se meri zat ka matlab puchha aur phir apne hi ehsas se aari hui sham ai junun puchh isi lamha-e-maujud se puchh lams ye kis ka uthaya hai ki bhaari hui sham do hi kirdar numayan hain kahani mein meri be-karan dasht hua main to shikari hui sham is taraf dasht-e-badan mein koi suraj duba us taraf sina-e-aflak se jari hui sham main nasen kat ke suraj mein utar hi jata par khayal aaya tera hijr ki mari hui sham kya faqat hum se sawalat kiye jaenge kya faqat hum se mukhatib hai ye haari hui sham hum ne har shai mein utarte hue dekha khud ko yaad aai jo tere qurb pe wari hui sham

Related Ghazal

ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

292 likes

वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

244 likes

उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

Waseem Barelvi

107 likes

वो मुँह लगाता है जब कोई काम होता है जो उस का होता है समझो ग़ुलाम होता है किसी का हो के दुबारा न आना मेरी तरफ़ मोहब्बतों में हलाला हराम होता है इसे भी गिनते हैं हम लोग अहल-ए-ख़ाना में हमारे याँ तो शजर का भी नाम होता है तुझ ऐसे शख़्स के होते हैं ख़ास दोस्त बहुत तुझ ऐसा शख़्स बहुत जल्द आम होता है कभी लगी है तुम्हें कोई शाम आख़िरी शाम हमारे साथ ये हर एक शाम होता है

Umair Najmi

81 likes

वो ज़माना गुज़र गया कब का था जो दीवाना मर गया कब का ढूँढ़ता था जो इक नई दुनिया लौट के अपने घर गया कब का वो जो लाया था हम को दरिया तक पार अकेले उतर गया कब का उस का जो हाल है वही जाने अपना तो ज़ख़्म भर गया कब का ख़्वाब-दर-ख़्वाब था जो शीराज़ा अब कहाँ है बिखर गया कब का

Javed Akhtar

62 likes

More from Abhishek Shukla

दर-ए-ख़याल भी खोलें सियाह शब भी करें फिर उस के बा'द तुझे सोचें ये ग़ज़ब भी करें वो जिस ने शाम के माथे पे हाथ फेरा है हम उस चराग़-ए-हवा-साज़ का अदब भी करें सियाहियाँ सी बिखरने लगी हैं सीने में अब उस सितारा-ए-शब-ताब की तलब भी करें ये इम्तियाज़ ज़रूरी है अब इबादत में वही दुआ जो नज़र कर रही है लब भी करें कि जैसे ख़्वाब दिखाना तसल्लियाँ देना कुछ एक काम मोहब्बत में बे-सबब भी करें मैं जानता हूँ कि ता'बीर ही नहीं मुमकिन वो मेरे ख़्वाब की तशरीह चाहे जब भी करें शिकस्त-ए-ख़्वाब की मंज़िल भी कब नई है हमें वही जो करते चले आएँ हैं सो अब भी करें

Abhishek shukla

0 likes

अभी तो आप ही हाइल है रास्ता शब का क़रीब आए तो देखेंगे हौसला शब का चली तो आई थी कुछ दूर साथ साथ मिरे फिर इस के बा'द ख़ुदा जाने क्या हुआ शब का मिरे ख़याल के वहशत-कदे में आते ही जुनूँ की नोक से फूटा है आबला शब का सहर की पहली किरन ने उसे बिखेर दिया मुझे समेटने आया था जब ख़ुदा शब का ज़मीं पे आ के सितारों ने ये कहा मुझ से तिरे क़रीब से गुज़रा है क़ाफ़िला शब का सहर का लम्स मिरी ज़िंदगी बढ़ा देता मगर गराँ था बहुत मुझ पे काटना शब का कभी कभी तो ये वहशत भी हम पे गुज़री है कि दिल के साथ ही देखा है डूबना शब का चटख़ उठी है रग-ए-जाँ तो ये ख़याल आया किसी की याद से जुड़ता है सिलसिला शब का

Abhishek shukla

1 likes

अब इख़्तियार में मौजें न ये रवानी है मैं बह रहा हूँ कि मेरा वजूद पानी है मैं और मेरी तरह तू भी एक हक़ीक़त है फिर इस के बा'द जो बचता है वो कहानी है तेरे वजूद में कुछ है जो इस ज़मीं का नहीं तेरे ख़याल की रंगत भी आसमानी है ज़रा भी दख़्ल नहीं इस में इन हवाओं का हमें तो मस्लहतन अपनी ख़ाक उड़ानी है ये ख़्वाब-गाह ये आँखें ये मेरा इश्क़-ए-क़दीम हर एक चीज़ मेरी ज़ात में पुरानी है वो एक दिन जो तुझे सोचने में गुज़रा था तमाम उम्र उसी दिन की तर्जुमानी है नवाह-ए-जाँ में भटकती हैं ख़ुशबुएँ जिस की वो एक फूल की लगता है रात-रानी है इरादतन तो कहीं कुछ नहीं हुआ लेकिन मैं जी रहा हूँ ये साँसों की ख़ुश-गुमानी है

Abhishek shukla

1 likes

तुझ सेे वाबस्ता कोई ग़म नहीं रखने वाले जिस को रखना हो रक्खे हम नहीं रखने वाले अपने उलझे हुए बालों की क़सम हम इस बार तेरी ज़ुल्फ़ों में कोई ख़म नहीं रखने वाले एक हव्वा की मुहब्बत के सिवा सीने में और कुछ हज़रत-ए-अदम नहीं रखने वाले

Abhishek shukla

2 likes

लहर का ख़्वाब हो के देखते हैं चल तह-ए-अब हो के देखते हैं उस पे इतना यक़ीन है हम को उस को बेताब हो के देखते हैं रात को रात हो के जाना था ख़्वाब को ख़्वाब हो के देखते हैं अपनी अरज़ानियों के सदक़े हम ख़ुद को नायाब हो के देखते हैं साहिलों की नज़र में आना है फिर तो ग़र्क़ाब हो के देखते हैं वो जो पायाब कह रहा था हमें उस को सैलाब हो के देखते हैं

Abhishek shukla

1 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Abhishek Shukla.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Abhishek Shukla's ghazal.