तुझ सेे वाबस्ता कोई ग़म नहीं रखने वाले जिस को रखना हो रक्खे हम नहीं रखने वाले अपने उलझे हुए बालों की क़सम हम इस बार तेरी ज़ुल्फ़ों में कोई ख़म नहीं रखने वाले एक हव्वा की मुहब्बत के सिवा सीने में और कुछ हज़रत-ए-अदम नहीं रखने वाले
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तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं तुझे हर बहाने से हम देखते हैं हमारी तरफ़ अब वो कम देखते हैं वो नज़रें नहीं जिन को हम देखते हैं ज़माने के क्या क्या सितम देखते हैं हमीं जानते हैं जो हम देखते हैं
Dagh Dehlvi
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ
Ali Zaryoun
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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
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अब इख़्तियार में मौजें न ये रवानी है मैं बह रहा हूँ कि मेरा वजूद पानी है मैं और मेरी तरह तू भी एक हक़ीक़त है फिर इस के बा'द जो बचता है वो कहानी है तेरे वजूद में कुछ है जो इस ज़मीं का नहीं तेरे ख़याल की रंगत भी आसमानी है ज़रा भी दख़्ल नहीं इस में इन हवाओं का हमें तो मस्लहतन अपनी ख़ाक उड़ानी है ये ख़्वाब-गाह ये आँखें ये मेरा इश्क़-ए-क़दीम हर एक चीज़ मेरी ज़ात में पुरानी है वो एक दिन जो तुझे सोचने में गुज़रा था तमाम उम्र उसी दिन की तर्जुमानी है नवाह-ए-जाँ में भटकती हैं ख़ुशबुएँ जिस की वो एक फूल की लगता है रात-रानी है इरादतन तो कहीं कुछ नहीं हुआ लेकिन मैं जी रहा हूँ ये साँसों की ख़ुश-गुमानी है
Abhishek shukla
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दर-ए-ख़याल भी खोलें सियाह शब भी करें फिर उस के बा'द तुझे सोचें ये ग़ज़ब भी करें वो जिस ने शाम के माथे पे हाथ फेरा है हम उस चराग़-ए-हवा-साज़ का अदब भी करें सियाहियाँ सी बिखरने लगी हैं सीने में अब उस सितारा-ए-शब-ताब की तलब भी करें ये इम्तियाज़ ज़रूरी है अब इबादत में वही दुआ जो नज़र कर रही है लब भी करें कि जैसे ख़्वाब दिखाना तसल्लियाँ देना कुछ एक काम मोहब्बत में बे-सबब भी करें मैं जानता हूँ कि ता'बीर ही नहीं मुमकिन वो मेरे ख़्वाब की तशरीह चाहे जब भी करें शिकस्त-ए-ख़्वाब की मंज़िल भी कब नई है हमें वही जो करते चले आएँ हैं सो अब भी करें
Abhishek shukla
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अभी तो आप ही हाइल है रास्ता शब का क़रीब आए तो देखेंगे हौसला शब का चली तो आई थी कुछ दूर साथ साथ मिरे फिर इस के बा'द ख़ुदा जाने क्या हुआ शब का मिरे ख़याल के वहशत-कदे में आते ही जुनूँ की नोक से फूटा है आबला शब का सहर की पहली किरन ने उसे बिखेर दिया मुझे समेटने आया था जब ख़ुदा शब का ज़मीं पे आ के सितारों ने ये कहा मुझ से तिरे क़रीब से गुज़रा है क़ाफ़िला शब का सहर का लम्स मिरी ज़िंदगी बढ़ा देता मगर गराँ था बहुत मुझ पे काटना शब का कभी कभी तो ये वहशत भी हम पे गुज़री है कि दिल के साथ ही देखा है डूबना शब का चटख़ उठी है रग-ए-जाँ तो ये ख़याल आया किसी की याद से जुड़ता है सिलसिला शब का
Abhishek shukla
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लहर का ख़्वाब हो के देखते हैं चल तह-ए-अब हो के देखते हैं उस पे इतना यक़ीन है हम को उस को बेताब हो के देखते हैं रात को रात हो के जाना था ख़्वाब को ख़्वाब हो के देखते हैं अपनी अरज़ानियों के सदक़े हम ख़ुद को नायाब हो के देखते हैं साहिलों की नज़र में आना है फिर तो ग़र्क़ाब हो के देखते हैं वो जो पायाब कह रहा था हमें उस को सैलाब हो के देखते हैं
Abhishek shukla
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हम ऐसे सोए भी कब थे हमें जगा लाते कुछ एक ख़्वाब तो शब-ख़ून से बचा लाते ज़ियाँ तो दोनों तरह से है अपनी मिट्टी का हम आब लाते कि अपने लिए हवा लाते पता जो होता कि निकलेगा चाँद जैसा कुछ हम अपने साथ सितारों को भी उठा लाते हमें यक़ीन नहीं था ख़ुद अपनी रंगत पर हम इस ज़मीं की हथेली पे रंग क्या लाते बस और कुछ भी नहीं चाहता था मैं तुम से ज़रा सी चीज़ थी दुनिया कहीं छुपा लाते हमारे अज़्म की शिद्दत अगर समझनी थी तो इस सफ़र में कोई सख़्त मरहला लाते
Abhishek shukla
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