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दर-ए-ख़याल भी खोलें सियाह शब भी करें फिर उस के बा'द तुझे सोचें ये ग़ज़ब भी करें वो जिस ने शाम के माथे पे हाथ फेरा है हम उस चराग़-ए-हवा-साज़ का अदब भी करें सियाहियाँ सी बिखरने लगी हैं सीने में अब उस सितारा-ए-शब-ताब की तलब भी करें ये इम्तियाज़ ज़रूरी है अब इबादत में वही दुआ जो नज़र कर रही है लब भी करें कि जैसे ख़्वाब दिखाना तसल्लियाँ देना कुछ एक काम मोहब्बत में बे-सबब भी करें मैं जानता हूँ कि ता'बीर ही नहीं मुमकिन वो मेरे ख़्वाब की तशरीह चाहे जब भी करें शिकस्त-ए-ख़्वाब की मंज़िल भी कब नई है हमें वही जो करते चले आएँ हैं सो अब भी करें

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सारे का सारा तो मेरा भी नहीं और वो शख़्स बे-वफ़ा भी नहीं ग़ौर से देखने पे बोली है शादी से पहले सोचना भी नहीं अच्छी सेहत का है मेरा महबूब धोखे देते हुए थका भी नहीं जितना बर्बाद कर दिया तू ने उतना आबाद तो मैं था भी नहीं मुझ को बस इतना दीन आता है जहाँ मैं ख़ुद नहीं ख़ुदा भी नहीं

Kushal Dauneria

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अश्क-ए-नादाँ से कहो बा'द में पछताएँगे आप गिरकर मेरी आँखों से किधर जाएँगे अपने लफ़्ज़ों को तकल्लुम से गिरा कर जाना अपने लहजे की थकावट में बिखर जाएँगे इक तेरा घर था मेरी हद-ए-मुसाफ़ित लेकिन अब ये सोचा है कि हम हद से गुज़र जाएँगे अपने अफ़्कार जला डालेंगे काग़ज़ काग़ज़ सोच मर जाएगी तो हम आप भी मर जाएँगे इस सेे पहले कि जुदाई की ख़बर तुम सेे मिले हम ने सोचा है कि हम तुम सेे बिछड़ जाएँगे

Khalil Ur Rehman Qamar

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किसे फ़ुर्सत-ए-मह-ओ-साल है ये सवाल है कोई वक़्त है भी कि जाल है ये सवाल है न है फ़िक्र-ए-गर्दिश-ए-आसमाँ न ख़याल-ए-जाँ मुझे फिर ये कैसा मलाल है ये सवाल है वो सवाल जिस का जवाब है मेरी ज़िन्दगी मेरी ज़िन्दगी का सवाल है ये सवाल है मैं बिछड़ के तुझ सेे बुलंदियों पे जो पस्त हूँ ये उरूज है कि ज़वाल है ये सवाल है

Abbas Qamar

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कभी मिलेंगे तो ये कर्ज़ भी उतारेंगे तुम्हारे चेहरे को पहरों तलक निहारेंगे ये क्या सितम कि खिलाड़ी बदल दिया उस ने हम इस उमीद पे बैठे थे हम ही हारेंगे हमारे बा'द तेरे इश्क़ में नए लड़के बदन तो चू मेंगे ज़ुल्फ़ें नहीं सँवारेंगे

Vikram Gaur Vairagi

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अब मेरे साथ नहीं है समझे ना समझाने की बात नहीं है समझे ना तुम माँगोगे और तुम्हें मिल जाएगा प्यार है ये ख़ैरात नहीं है समझे ना मैं बादल हूँ जिस पर चाहूँ बरसूँगा मेरी कोई ज़ात नहीं है समझे ना अपना ख़ाली हाथ मुझे मत दिखलाओ इस में मेरा हाथ नहीं है समझे ना

Zubair Ali Tabish

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अब इख़्तियार में मौजें न ये रवानी है मैं बह रहा हूँ कि मेरा वजूद पानी है मैं और मेरी तरह तू भी एक हक़ीक़त है फिर इस के बा'द जो बचता है वो कहानी है तेरे वजूद में कुछ है जो इस ज़मीं का नहीं तेरे ख़याल की रंगत भी आसमानी है ज़रा भी दख़्ल नहीं इस में इन हवाओं का हमें तो मस्लहतन अपनी ख़ाक उड़ानी है ये ख़्वाब-गाह ये आँखें ये मेरा इश्क़-ए-क़दीम हर एक चीज़ मेरी ज़ात में पुरानी है वो एक दिन जो तुझे सोचने में गुज़रा था तमाम उम्र उसी दिन की तर्जुमानी है नवाह-ए-जाँ में भटकती हैं ख़ुशबुएँ जिस की वो एक फूल की लगता है रात-रानी है इरादतन तो कहीं कुछ नहीं हुआ लेकिन मैं जी रहा हूँ ये साँसों की ख़ुश-गुमानी है

Abhishek shukla

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अभी तो आप ही हाइल है रास्ता शब का क़रीब आए तो देखेंगे हौसला शब का चली तो आई थी कुछ दूर साथ साथ मिरे फिर इस के बा'द ख़ुदा जाने क्या हुआ शब का मिरे ख़याल के वहशत-कदे में आते ही जुनूँ की नोक से फूटा है आबला शब का सहर की पहली किरन ने उसे बिखेर दिया मुझे समेटने आया था जब ख़ुदा शब का ज़मीं पे आ के सितारों ने ये कहा मुझ से तिरे क़रीब से गुज़रा है क़ाफ़िला शब का सहर का लम्स मिरी ज़िंदगी बढ़ा देता मगर गराँ था बहुत मुझ पे काटना शब का कभी कभी तो ये वहशत भी हम पे गुज़री है कि दिल के साथ ही देखा है डूबना शब का चटख़ उठी है रग-ए-जाँ तो ये ख़याल आया किसी की याद से जुड़ता है सिलसिला शब का

Abhishek shukla

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तुझ सेे वाबस्ता कोई ग़म नहीं रखने वाले जिस को रखना हो रक्खे हम नहीं रखने वाले अपने उलझे हुए बालों की क़सम हम इस बार तेरी ज़ुल्फ़ों में कोई ख़म नहीं रखने वाले एक हव्वा की मुहब्बत के सिवा सीने में और कुछ हज़रत-ए-अदम नहीं रखने वाले

Abhishek shukla

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ख़ला के जैसा कोई दरमियान भी पड़ता फिर इस सफ़र में कहीं आसमान भी पड़ता मैं चोट कर तो रहा हूँ हवा के माथे पर मज़ा तो जब था कि कोई निशान भी पड़ता अजीब ख़्वाहिशें उठती हैं इस ख़राबे में गुज़र रहे हैं तो अपना मकान भी पड़ता हमीं जहान के पीछे पड़े रहें कब तक हमारे पीछे कभी ये जहान भी पड़ता ये इक कमी कि जो अब ज़िंदगी सी लगती है हमारी धूप में वो साएबान भी पड़ता हर एक रोज़ इसी ज़िंदगी की तय्यारी सो चाहते हैं कभी इम्तिहान भी पड़ता

Abhishek shukla

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अपनी जैसी ही किसी शक्ल में ढालेंगे तुम्हें हम बिगड़ जाएँगे इतना की बना लेंगे तुम्हें जाने क्या कुछ हो छुपा तुम में मोहब्बत के सिवा हम तसल्ली के लिए फिर से खँगालेंगे तुम्हें हम ने सोचा है कि इस बार जुनूँ करते हुए ख़ुद को इस तरह से खो देंगे कि पा लेंगे तुम्हें मुझ में पैवस्त हो तुम यूँँ कि ज़माने वाले मेरी मिट्टी से मेरे बा'द निकालेंगे तुम्हें

Abhishek shukla

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