किसे फ़ुर्सत-ए-मह-ओ-साल है ये सवाल है कोई वक़्त है भी कि जाल है ये सवाल है न है फ़िक्र-ए-गर्दिश-ए-आसमाँ न ख़याल-ए-जाँ मुझे फिर ये कैसा मलाल है ये सवाल है वो सवाल जिस का जवाब है मेरी ज़िन्दगी मेरी ज़िन्दगी का सवाल है ये सवाल है मैं बिछड़ के तुझ सेे बुलंदियों पे जो पस्त हूँ ये उरूज है कि ज़वाल है ये सवाल है
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सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई क्यूँँ चीख़ चीख़ कर न गला छील ले कोई साबित हुआ सुकून-ए-दिल-ओ-जाँ कहीं नहीं रिश्तों में ढूँढ़ता है तो ढूँडा करे कोई तर्क-ए-तअल्लुक़ात कोई मसअला नहीं ये तो वो रास्ता है कि बस चल पड़े कोई दीवार जानता था जिसे मैं वो धूल थी अब मुझ को ए'तिमाद की दावत न दे कोई मैं ख़ुद ये चाहता हूँ कि हालात हों ख़राब मेरे ख़िलाफ़ ज़हर उगलता फिरे कोई ऐ शख़्स अब तो मुझ को सभी कुछ क़ुबूल है ये भी क़ुबूल है कि तुझे छीन ले कोई हाँ ठीक है मैं अपनी अना का मरीज़ हूँ आख़िर मेरे मिज़ाज में क्यूँँ दख़्ल दे कोई इक शख़्स कर रहा है अभी तक वफ़ा का ज़िक्र काश उस ज़बाँ-दराज़ का मुँह नोच ले कोई
Jaun Elia
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अब मेरे साथ नहीं है समझे ना समझाने की बात नहीं है समझे ना तुम माँगोगे और तुम्हें मिल जाएगा प्यार है ये ख़ैरात नहीं है समझे ना मैं बादल हूँ जिस पर चाहूँ बरसूँगा मेरी कोई ज़ात नहीं है समझे ना अपना ख़ाली हाथ मुझे मत दिखलाओ इस में मेरा हाथ नहीं है समझे ना
Zubair Ali Tabish
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उस ने दो चार कर दिया मुझ को ज़ेहनी बीमार कर दिया मुझ को क्यूँ नहीं दस्तरस में तू मेरे क्यूँ तलबगार कर दिया मुझ को कभी पत्थर कभी ख़ुदा उस ने चाहा जो यार कर दिया मुझ को उस सेे कोई सवाल मत करना उस ने इनकार कर दिया मुझ को एक इंसान ही तो माँगा था उस को भी मार कर दिया मुझ को
Himanshi babra KATIB
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हर अँधेरा रौशनी में लग गया जिस को देखो शा'इरी में लग गया हम को मर जाने की फ़ुर्सत कब मिली वक़्त सारा ज़िन्दगी में लग गया अपना मैख़ाना बना सकते थे हम इतना पैसा मैकशी में लग गया ख़ुद से इतनी दूर जा निकले थे हम इक ज़माना वापसी में लग गया
Mehshar Afridi
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अगर तू बे-वफ़ा है ध्यान रखना मुझे सब कुछ पता है ध्यान रखना बिछड़ते वक़्त हम ने कह दिया था हमारा दिल दुखा है ध्यान रखना ख़ुदा जिस की मोहब्बत में बनी हो वो कइयों का ख़ुदा है ध्यान रखना जिसे तुम दोस्त केवल जानती हो वो तुम को चाहता है ध्यान रखना
Anand Raj Singh
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मेरी परछाइयाँ गुम हैं मेरी पहचान बाक़ी है सफ़र दम तोड़ने को है मगर सामान बाक़ी है अभी तो ख़्वाहिशों के दरमियाँ घमासान बाक़ी है अभी इस जिस्म-ए-फ़ानी में ज़रा सी जान बाक़ी है इसे तारीकियों ने क़ैद कर रक्खा है बरसों से मेरे कमरे में बस कहने को रौशनदान बाक़ी है तुम्हारा झूट चेहरे से अयाँ हो जाएगा इक दिन तुम्हारे दिल के अंदर था जो वो शैतान बाक़ी है गुज़ारी उम्र जिस की बंदगी में वो है ला-हासिल अजब सरमाया-कारी है नफ़ा'-नुक़सान बाक़ी है अभी ज़िंदा है बूढ़ा बाप घर की ज़िन्दगी बनकर फ़क़त कमरे जुदा हैं बीच में दालान बाक़ी है ग़ज़ल ज़िंदा है उर्दू के अदब-बरदार ज़िंदा हैं हमारी तर्बियत में अब भी हिंदोस्तान बाक़ी है
Abbas Qamar
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हम ऐसे सर-फिरे दुनिया को कब दरकार होते हैं अगर होते भी हैं बे-इंतिहा दुश्वार होते हैं ख़मोशी कह रही है अब ये दो-आबा रवाँ होगा हवा चुप हो तो बारिश के शदीद आसार होते हैं ज़रा सी बात है इस का तमाशा क्या बनाएँ हम इरादे टूटते हैं हौसले मिस्मार होते हैं शिकायत ज़िंदगी से क्यूँँ करें हम ख़ुद ही थम जाएँ जो कम-रफ़्तार होते हैं वो कम-रफ़्तार होते हैं गले में ज़िंदगी के रीसमान-ए-वक़्त है तो क्या परिंदे क़ैद में हों तो बहुत हुश्यार होते हैं जहाँ वाले मुक़य्यद हैं अभी तक अहद-ए-तिफ़्ली में यहाँ अब भी खिलौने रौनक़-ए-बाज़ार होते हैं गुलू-ए-ख़ुश्क उन को भेजता है दे के मश्कीज़ा कुछ आँसू तिश्ना-कामों के अलम-बरदार होते हैं बदन उन को कभी बाहर निकलने ही नहीं देता 'क़मर-अब्बास' तो बा-क़ाएदा तय्यार होते हैं
Abbas Qamar
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तेरी आग़ोश में सर रक्खा सिसक कर रोए मेरे सपने मेरी आँखों से छलक कर रोए सारी ख़ुशियों को सरे आम झटक कर रोए हम भी बच्चों की तरह पाँव पटक कर रोए रास्ता साफ़ था मंज़िल भी बहुत दूर न थी बीच रस्ते में मगर पाँव अटक कर रोए जिस घड़ी क़त्ल हवाओं ने चराग़ों का किया मेरे हमराह जो जुगनू थे फफक कर रोए क़ीमती ज़िद थी ग़रीबी भी भला क्या करती माँ के जज़्बात दुलारों को थपक कर रोए अपने हालात बयाँ कर के जो रोई धरती चाँद तारे किसी कोने में दुबक कर रोए बा-मशक्कत भी मुकम्मल न हुई अपनी ग़ज़ल चंद नुक्ते मेरे काग़ज़ से सरक कर रोए
Abbas Qamar
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जहाँ सारे हवा बनने की कोशिश कर रहे थे वहाँ भी हम दिया बनने की कोशिश कर रहे थे हमें ज़ोर-ए-तसव्वुर भी गँवाना पड़ गया हम तसव्वुर में ख़ुदा बनने की कोशिश कर रहे थे ज़मीं पर आ गिरे जब आसमाँ से ख़्वाब मेरे ज़मीं ने पूछा क्या बनने की कोशिश कर रहे थे उन्हें आँखों ने बे-दर्दी से बे-घर कर दिया है ये आँसू क़हक़हा बनने की कोशिश कर रहे थे हमें दुश्वारियों में मुस्कुराने की तलब थी हम इक तस्वीर सा बनने की कोशिश कर रहे थे
Abbas Qamar
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तेरे ख़याल से फूटा था ख़्वाब कहते हैं तुझे हयात का लुब्ब-ए-लुबाब कहते हैं चुना है तू ने मुझे ज़िन्दगी के दामन में मुझे ये लोग तेरा इंतिख़ाब कहते हैं इसी का नाम रवानी है बर-सर-ए-दरिया इसी को दश्त में प्यासे शराब कहते हैं गुनाहगार है उस के सो उस की महफ़िल में हम उस के हुस्न को उस का नक़ाब कहते हैं
Abbas Qamar
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