ghazalKuch Alfaaz

मेरी परछाइयाँ गुम हैं मेरी पहचान बाक़ी है सफ़र दम तोड़ने को है मगर सामान बाक़ी है अभी तो ख़्वाहिशों के दरमियाँ घमासान बाक़ी है अभी इस जिस्म-ए-फ़ानी में ज़रा सी जान बाक़ी है इसे तारीकियों ने क़ैद कर रक्खा है बरसों से मेरे कमरे में बस कहने को रौशनदान बाक़ी है तुम्हारा झूट चेहरे से अयाँ हो जाएगा इक दिन तुम्हारे दिल के अंदर था जो वो शैतान बाक़ी है गुज़ारी उम्र जिस की बंदगी में वो है ला-हासिल अजब सरमाया-कारी है नफ़ा'-नुक़सान बाक़ी है अभी ज़िंदा है बूढ़ा बाप घर की ज़िन्दगी बनकर फ़क़त कमरे जुदा हैं बीच में दालान बाक़ी है ग़ज़ल ज़िंदा है उर्दू के अदब-बरदार ज़िंदा हैं हमारी तर्बियत में अब भी हिंदोस्तान बाक़ी है

Abbas Qamar12 Likes

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं तुझे हर बहाने से हम देखते हैं हमारी तरफ़ अब वो कम देखते हैं वो नज़रें नहीं जिन को हम देखते हैं ज़माने के क्या क्या सितम देखते हैं हमीं जानते हैं जो हम देखते हैं

Dagh Dehlvi

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हालत-ए-हाल से बेगाना बना रक्खा है ख़ुद को माज़ी का निहाँ-ख़ाना बना रक्खा है ख़ौफ़-ए-दोज़ख़ ने ही ईजाद किया है सज्दा डर ने इंसान को दीवाना बना रक्खा है मिम्बर-ए-इश्क़ से तक़रीर की ख़्वाहिश है हमें दिल को इस वास्ते मौलाना बना रक्खा है मातम-ए-शौक़ बपा करते हैं हर शाम यहाँ जिस्म को हम ने अज़ाँ-ख़ाना बना रक्खा है वक़्त-ए-रुख़्सत है मिरे चाहने वालों ने भी अब साँस को वक़्त का पैमाना बना रक्खा है जानते हैं वो परिंदा है नहीं ठहरेगा हम ने उस दिल को मगर दाना बना रक्खा है

Abbas Qamar

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हम ऐसे सर-फिरे दुनिया को कब दरकार होते हैं अगर होते भी हैं बे-इंतिहा दुश्वार होते हैं ख़मोशी कह रही है अब ये दो-आबा रवाँ होगा हवा चुप हो तो बारिश के शदीद आसार होते हैं ज़रा सी बात है इस का तमाशा क्या बनाएँ हम इरादे टूटते हैं हौसले मिस्मार होते हैं शिकायत ज़िंदगी से क्यूँँ करें हम ख़ुद ही थम जाएँ जो कम-रफ़्तार होते हैं वो कम-रफ़्तार होते हैं गले में ज़िंदगी के रीसमान-ए-वक़्त है तो क्या परिंदे क़ैद में हों तो बहुत हुश्यार होते हैं जहाँ वाले मुक़य्यद हैं अभी तक अहद-ए-तिफ़्ली में यहाँ अब भी खिलौने रौनक़-ए-बाज़ार होते हैं गुलू-ए-ख़ुश्क उन को भेजता है दे के मश्कीज़ा कुछ आँसू तिश्ना-कामों के अलम-बरदार होते हैं बदन उन को कभी बाहर निकलने ही नहीं देता 'क़मर-अब्बास' तो बा-क़ाएदा तय्यार होते हैं

Abbas Qamar

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लम्हा-दर-लम्हा तिरी राह तका करती है एक खिड़की तिरी आमद की दुआ करती है सिलवटें चीख़ती रहती हैं मिरे बिस्तर की करवटों में ही मिरी रात कटा करती है वक़्त थम जाता है अब रात गुज़रती ही नहीं जाने दीवार-घड़ी रात में क्या करती है चाँद खिड़की में जो आता था नहीं आता अब तीरगी चारों तरफ़ रक़्स किया करती है मेरे कमरे में उदासी है क़यामत की मगर एक तस्वीर पुरानी सी हँसा करती है

Abbas Qamar

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अश्कों को आरज़ू-ए-रिहाई है रोइए आँखों की अब इसी में भलाई है रोइए रोना इलाज-ए-ज़ुल्मत-ए-दुनिया नहीं तो क्या कम-अज़-कम एहतिजाज-ए-ख़ुदाई है रोइए तस्लीम कर लिया है जो ख़ुद को चराग़-ए-हक़ दुनिया क़दम क़दम पे सबाई है रोइए ख़ुश हैं तो फिर मुसाफ़िर-ए-दुनिया नहीं हैं आप इस दश्त में बस आबला-पाई है रोइए हम हैं असीर-ए-ज़ब्त इजाज़त नहीं हमें रो पा रहे हैं आप बधाई है रोइए

Abbas Qamar

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उस की पेशानी पे जो बल आए दो-जहाँ में उथल-पुथल आए ख़्वाब का बोझ इतना भारी था नींद पलकों पे हम कुचल आए इस क़दर जज़्ब हो गए दोनों दर्द खेंचूँ तो दिल निकल आए रूह का नंगापन छिपाने को जिस्म कपड़े बदल बदल आए जिस पे हर चीज़ टाल रक्खी है जाने किस रोज़ मेरा कल आए गुलमोहर की तलाश थी मुझ को मेरे हिस्से मगर कँवल आए

Abbas Qamar

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