तेरी आग़ोश में सर रक्खा सिसक कर रोए मेरे सपने मेरी आँखों से छलक कर रोए सारी ख़ुशियों को सरे आम झटक कर रोए हम भी बच्चों की तरह पाँव पटक कर रोए रास्ता साफ़ था मंज़िल भी बहुत दूर न थी बीच रस्ते में मगर पाँव अटक कर रोए जिस घड़ी क़त्ल हवाओं ने चराग़ों का किया मेरे हमराह जो जुगनू थे फफक कर रोए क़ीमती ज़िद थी ग़रीबी भी भला क्या करती माँ के जज़्बात दुलारों को थपक कर रोए अपने हालात बयाँ कर के जो रोई धरती चाँद तारे किसी कोने में दुबक कर रोए बा-मशक्कत भी मुकम्मल न हुई अपनी ग़ज़ल चंद नुक्ते मेरे काग़ज़ से सरक कर रोए
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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हम ऐसे सर-फिरे दुनिया को कब दरकार होते हैं अगर होते भी हैं बे-इंतिहा दुश्वार होते हैं ख़मोशी कह रही है अब ये दो-आबा रवाँ होगा हवा चुप हो तो बारिश के शदीद आसार होते हैं ज़रा सी बात है इस का तमाशा क्या बनाएँ हम इरादे टूटते हैं हौसले मिस्मार होते हैं शिकायत ज़िंदगी से क्यूँँ करें हम ख़ुद ही थम जाएँ जो कम-रफ़्तार होते हैं वो कम-रफ़्तार होते हैं गले में ज़िंदगी के रीसमान-ए-वक़्त है तो क्या परिंदे क़ैद में हों तो बहुत हुश्यार होते हैं जहाँ वाले मुक़य्यद हैं अभी तक अहद-ए-तिफ़्ली में यहाँ अब भी खिलौने रौनक़-ए-बाज़ार होते हैं गुलू-ए-ख़ुश्क उन को भेजता है दे के मश्कीज़ा कुछ आँसू तिश्ना-कामों के अलम-बरदार होते हैं बदन उन को कभी बाहर निकलने ही नहीं देता 'क़मर-अब्बास' तो बा-क़ाएदा तय्यार होते हैं
Abbas Qamar
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जहाँ सारे हवा बनने की कोशिश कर रहे थे वहाँ भी हम दिया बनने की कोशिश कर रहे थे हमें ज़ोर-ए-तसव्वुर भी गँवाना पड़ गया हम तसव्वुर में ख़ुदा बनने की कोशिश कर रहे थे ज़मीं पर आ गिरे जब आसमाँ से ख़्वाब मेरे ज़मीं ने पूछा क्या बनने की कोशिश कर रहे थे उन्हें आँखों ने बे-दर्दी से बे-घर कर दिया है ये आँसू क़हक़हा बनने की कोशिश कर रहे थे हमें दुश्वारियों में मुस्कुराने की तलब थी हम इक तस्वीर सा बनने की कोशिश कर रहे थे
Abbas Qamar
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मेरी परछाइयाँ गुम हैं मेरी पहचान बाक़ी है सफ़र दम तोड़ने को है मगर सामान बाक़ी है अभी तो ख़्वाहिशों के दरमियाँ घमासान बाक़ी है अभी इस जिस्म-ए-फ़ानी में ज़रा सी जान बाक़ी है इसे तारीकियों ने क़ैद कर रक्खा है बरसों से मेरे कमरे में बस कहने को रौशनदान बाक़ी है तुम्हारा झूट चेहरे से अयाँ हो जाएगा इक दिन तुम्हारे दिल के अंदर था जो वो शैतान बाक़ी है गुज़ारी उम्र जिस की बंदगी में वो है ला-हासिल अजब सरमाया-कारी है नफ़ा'-नुक़सान बाक़ी है अभी ज़िंदा है बूढ़ा बाप घर की ज़िन्दगी बनकर फ़क़त कमरे जुदा हैं बीच में दालान बाक़ी है ग़ज़ल ज़िंदा है उर्दू के अदब-बरदार ज़िंदा हैं हमारी तर्बियत में अब भी हिंदोस्तान बाक़ी है
Abbas Qamar
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हालत-ए-हाल से बेगाना बना रक्खा है ख़ुद को माज़ी का निहाँ-ख़ाना बना रक्खा है ख़ौफ़-ए-दोज़ख़ ने ही ईजाद किया है सज्दा डर ने इंसान को दीवाना बना रक्खा है मिम्बर-ए-इश्क़ से तक़रीर की ख़्वाहिश है हमें दिल को इस वास्ते मौलाना बना रक्खा है मातम-ए-शौक़ बपा करते हैं हर शाम यहाँ जिस्म को हम ने अज़ाँ-ख़ाना बना रक्खा है वक़्त-ए-रुख़्सत है मिरे चाहने वालों ने भी अब साँस को वक़्त का पैमाना बना रक्खा है जानते हैं वो परिंदा है नहीं ठहरेगा हम ने उस दिल को मगर दाना बना रक्खा है
Abbas Qamar
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क्यूँ ढूँढ़ रहे हो कोई मुझ सा मेरे अंदर कुछ भी न मिलेगा तुम्हें मेरा मेरे अंदर गवारा-ए-उम्मीद सजाए हुए हर रोज़ सो जाता है मासूम सा बच्चा मेरे अंदर बाहर से तबस्सुम की क़बा ओढ़े हुए हूँ दरअस्ल हैं महशर कई बरपा मेरे अंदर ज़ेबाइश-ए-माज़ी में सियह-मस्त सा इक दिल देता है बग़ावत को बढ़ावा मेरे अंदर सपनों के तआक़ुब में है आज़ुर्दा हक़ीक़त होता है यही रोज़ तमाशा मेरे अंदर मैं कितना अकेला हूँ तुम्हें कैसे बताऊँ तन्हाई भी हो जाती है तन्हा मेरे अंदर अंदोह की मौजों को इन आँखों में पढ़ो तो शायद ये समझ पाओ है क्या क्या मेरे अंदर
Abbas Qamar
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