तेरे ख़याल से फूटा था ख़्वाब कहते हैं तुझे हयात का लुब्ब-ए-लुबाब कहते हैं चुना है तू ने मुझे ज़िन्दगी के दामन में मुझे ये लोग तेरा इंतिख़ाब कहते हैं इसी का नाम रवानी है बर-सर-ए-दरिया इसी को दश्त में प्यासे शराब कहते हैं गुनाहगार है उस के सो उस की महफ़िल में हम उस के हुस्न को उस का नक़ाब कहते हैं
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पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं
Ali Zaryoun
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
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इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार' तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए
Khumar Barabankvi
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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ
Ali Zaryoun
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मेरी परछाइयाँ गुम हैं मेरी पहचान बाक़ी है सफ़र दम तोड़ने को है मगर सामान बाक़ी है अभी तो ख़्वाहिशों के दरमियाँ घमासान बाक़ी है अभी इस जिस्म-ए-फ़ानी में ज़रा सी जान बाक़ी है इसे तारीकियों ने क़ैद कर रक्खा है बरसों से मेरे कमरे में बस कहने को रौशनदान बाक़ी है तुम्हारा झूट चेहरे से अयाँ हो जाएगा इक दिन तुम्हारे दिल के अंदर था जो वो शैतान बाक़ी है गुज़ारी उम्र जिस की बंदगी में वो है ला-हासिल अजब सरमाया-कारी है नफ़ा'-नुक़सान बाक़ी है अभी ज़िंदा है बूढ़ा बाप घर की ज़िन्दगी बनकर फ़क़त कमरे जुदा हैं बीच में दालान बाक़ी है ग़ज़ल ज़िंदा है उर्दू के अदब-बरदार ज़िंदा हैं हमारी तर्बियत में अब भी हिंदोस्तान बाक़ी है
Abbas Qamar
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हम ऐसे सर-फिरे दुनिया को कब दरकार होते हैं अगर होते भी हैं बे-इंतिहा दुश्वार होते हैं ख़मोशी कह रही है अब ये दो-आबा रवाँ होगा हवा चुप हो तो बारिश के शदीद आसार होते हैं ज़रा सी बात है इस का तमाशा क्या बनाएँ हम इरादे टूटते हैं हौसले मिस्मार होते हैं शिकायत ज़िंदगी से क्यूँँ करें हम ख़ुद ही थम जाएँ जो कम-रफ़्तार होते हैं वो कम-रफ़्तार होते हैं गले में ज़िंदगी के रीसमान-ए-वक़्त है तो क्या परिंदे क़ैद में हों तो बहुत हुश्यार होते हैं जहाँ वाले मुक़य्यद हैं अभी तक अहद-ए-तिफ़्ली में यहाँ अब भी खिलौने रौनक़-ए-बाज़ार होते हैं गुलू-ए-ख़ुश्क उन को भेजता है दे के मश्कीज़ा कुछ आँसू तिश्ना-कामों के अलम-बरदार होते हैं बदन उन को कभी बाहर निकलने ही नहीं देता 'क़मर-अब्बास' तो बा-क़ाएदा तय्यार होते हैं
Abbas Qamar
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तेरी आग़ोश में सर रक्खा सिसक कर रोए मेरे सपने मेरी आँखों से छलक कर रोए सारी ख़ुशियों को सरे आम झटक कर रोए हम भी बच्चों की तरह पाँव पटक कर रोए रास्ता साफ़ था मंज़िल भी बहुत दूर न थी बीच रस्ते में मगर पाँव अटक कर रोए जिस घड़ी क़त्ल हवाओं ने चराग़ों का किया मेरे हमराह जो जुगनू थे फफक कर रोए क़ीमती ज़िद थी ग़रीबी भी भला क्या करती माँ के जज़्बात दुलारों को थपक कर रोए अपने हालात बयाँ कर के जो रोई धरती चाँद तारे किसी कोने में दुबक कर रोए बा-मशक्कत भी मुकम्मल न हुई अपनी ग़ज़ल चंद नुक्ते मेरे काग़ज़ से सरक कर रोए
Abbas Qamar
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हालत-ए-हाल से बेगाना बना रक्खा है ख़ुद को माज़ी का निहाँ-ख़ाना बना रक्खा है ख़ौफ़-ए-दोज़ख़ ने ही ईजाद किया है सज्दा डर ने इंसान को दीवाना बना रक्खा है मिम्बर-ए-इश्क़ से तक़रीर की ख़्वाहिश है हमें दिल को इस वास्ते मौलाना बना रक्खा है मातम-ए-शौक़ बपा करते हैं हर शाम यहाँ जिस्म को हम ने अज़ाँ-ख़ाना बना रक्खा है वक़्त-ए-रुख़्सत है मिरे चाहने वालों ने भी अब साँस को वक़्त का पैमाना बना रक्खा है जानते हैं वो परिंदा है नहीं ठहरेगा हम ने उस दिल को मगर दाना बना रक्खा है
Abbas Qamar
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जहाँ सारे हवा बनने की कोशिश कर रहे थे वहाँ भी हम दिया बनने की कोशिश कर रहे थे हमें ज़ोर-ए-तसव्वुर भी गँवाना पड़ गया हम तसव्वुर में ख़ुदा बनने की कोशिश कर रहे थे ज़मीं पर आ गिरे जब आसमाँ से ख़्वाब मेरे ज़मीं ने पूछा क्या बनने की कोशिश कर रहे थे उन्हें आँखों ने बे-दर्दी से बे-घर कर दिया है ये आँसू क़हक़हा बनने की कोशिश कर रहे थे हमें दुश्वारियों में मुस्कुराने की तलब थी हम इक तस्वीर सा बनने की कोशिश कर रहे थे
Abbas Qamar
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