देख रहा है किस का चेहरा, आगे बढ़ मिल जाएगा तुझ को रस्ता, आगे बढ़ बैठे-बैठे केवल उतना मिलता है जितना छोड़े आगे वाला, आगे बढ़ इस रण में जय और पराजय मेरी है तू गाण्डीव उठा, कर हमला, आगे बढ़ मासूमों की भूख की क़ीमत क्या होगी दो गाली, रुपया, और ताना, आगे बढ़ भीगी आँखें, टूटा दिल और चिल्लाना सदियों का ये खेल पुराना, आगे बढ़ तूफ़ाँ, बिजली और बवंडर तो होंगे हिम्मत से बस नाव चलाना, आगे बढ़
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है
Shabeena Adeeb
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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला
Tehzeeb Hafi
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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
Ahmad Faraz
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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बिछड़ कर मिल रहे हैं सब, पुराने यार सालों बा'द बदल कर भी नहीं बदले, हैं ये मक्कार सालों बा'द अकेला है निपट कोई, ज़माने से कटा सा है तो कोई एक से बढ़ कर, हुआ दो-चार सालों बा'द किसी को मिल नहीं पाया, कभी इज़हार का मौक़ा अभी तक है अधूरा ही, किसी का प्यार सालों बा'द किसी में कुछ नहीं बदला, मगर हाँ ये तो बदला है मिरे सब यार अब लगते, हैं ज़िम्मेदार सालों बा'द
Divy Kamaldhwaj
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दास्तान-ए-ज़िन्दगी के सिर्फ़ कुछ किरदार सच झूठ है ज़ाती मकाँ और सब किराया-दार सच ये ज़बाँ खुलती नहीं वैसे तो सबके सामने पूछता है तो बता दूँगा तुझे दो-चार सच झूठ कहना छोड़ दूँगा बस मुझे इतना बता कौन अब तक कह सका हर एक को हर बार सच जो ख़ुदा को चाहता है उस को जन्नत सच लगे और काफ़िर को तो लगता है यही संसार सच
Divy Kamaldhwaj
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राज़ जो भी था नज़र में आ गया आप का चेहरा नज़र में आ गया वक़्त आया था बुरा सो देख लो आप का लहजा नज़र में आ गया डूबने वाली थी कश्ती इश्क़ की और इक तिनका नज़र में आ गया पाक था मैं और दामन था सफ़ेद ख़ून का धब्बा नज़र में आ गया काम भी सारा किया और चुप रहे बोलने वाला नज़र में आ गया कल पिताजी हँस रहे थे और तभी पैर का छाला नज़र में आ गया
Divy Kamaldhwaj
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