ghazalKuch Alfaaz

दास्तान-ए-ज़िन्दगी के सिर्फ़ कुछ किरदार सच झूठ है ज़ाती मकाँ और सब किराया-दार सच ये ज़बाँ खुलती नहीं वैसे तो सबके सामने पूछता है तो बता दूँगा तुझे दो-चार सच झूठ कहना छोड़ दूँगा बस मुझे इतना बता कौन अब तक कह सका हर एक को हर बार सच जो ख़ुदा को चाहता है उस को जन्नत सच लगे और काफ़िर को तो लगता है यही संसार सच

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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जाम सिगरेट कश और बस कुछ धुआँ आख़िरश और बस मौत तक ज़िंदगी का सफ़र रात-दिन कश्मकश और बस पी गया पेड़ आँधी मगर गिर पड़ा खा के ग़श और बस ज़िंदगी जलती सिगरेट है सिर्फ़ दो-चार कश और बस सूखते पेड़ की लकड़ियाँ आख़िरी पेशकश और बस

Sandeep Thakur

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किसे ख़बर है कि उम्र बस उस पे ग़ौर करने में कट रही है कि ये उदासी हमारे जिस्मों से किस ख़ुशी में लिपट रही है अजीब दुख है हम उस के होकर भी उस को छूने से डर रहे हैं अजीब दुख है हमारे हिस्से की आग औरों में बट रही है मैं उस को हर रोज़ बस यही एक झूठ सुनने को फ़ोन करता सुनो यहाँ कोई मस’अला है तुम्हारी आवाज़ कट रही है मुझ ऐसे पेड़ों के सूखने और सब्ज़ होने से क्या किसी को ये बेल शायद किसी मुसीबत में है जो मुझ से लिपट रही है ये वक़्त आने पे अपनी औलाद अपने अज़्दाद बेच देगी जो फ़ौज दुश्मन को अपना सालार गिरवी रख कर पलट रही है सो इस तअ'ल्लुक़ में जो ग़लत-फ़हमियाँ थीं अब दूर हो रही हैं रुकी हुई गाड़ियों के चलने का वक़्त है धुँध छट रही है

Tehzeeb Hafi

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उसे भी साथ रखता, और तुझे भी अपना बना लेता अगर मैं चाहता, तो दिल में कोई चोर दरवाज़ा बना लेता ख़्वाब मिलाएगा कर के ख़ुश हूँ, पर ये पछतावा नहीं जाता के मुस्तक़बिल बनाने से तो अच्छा था, तुझे अपना बना लेता अकेला आदमी हूँ, और अचानक आए हो जो कुछ था हाज़िर है, और तुम आने से, पहले बता देते, तो कुछ अच्छा बना लेता

Tehzeeb Hafi

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सबने दिल से उसे उतारा था वो मरी कब थी उस को मारा था पैरों में गिरके जीता था जिस को उस को पाने में ख़ुद को हारा था तेरे मेरे में बट गया सब कुछ एक टाइम था सब हमारा था उस की यादों में दिल जले है अब जिस का चेहरा नहीं गवारा था मैं ने वो खोया जो मेरा नहीं था तुम ने वो खोया जो तुम्हारा था जीत सकता था उस सेे मैं कातिब पर बड़े हौसले से हारा था

Himanshi babra KATIB

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देख रहा है किस का चेहरा, आगे बढ़ मिल जाएगा तुझ को रस्ता, आगे बढ़ बैठे-बैठे केवल उतना मिलता है जितना छोड़े आगे वाला, आगे बढ़ इस रण में जय और पराजय मेरी है तू गाण्डीव उठा, कर हमला, आगे बढ़ मासूमों की भूख की क़ीमत क्या होगी दो गाली, रुपया, और ताना, आगे बढ़ भीगी आँखें, टूटा दिल और चिल्लाना सदियों का ये खेल पुराना, आगे बढ़ तूफ़ाँ, बिजली और बवंडर तो होंगे हिम्मत से बस नाव चलाना, आगे बढ़

Divy Kamaldhwaj

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बिछड़ कर मिल रहे हैं सब, पुराने यार सालों बा'द बदल कर भी नहीं बदले, हैं ये मक्कार सालों बा'द अकेला है निपट कोई, ज़माने से कटा सा है तो कोई एक से बढ़ कर, हुआ दो-चार सालों बा'द किसी को मिल नहीं पाया, कभी इज़हार का मौक़ा अभी तक है अधूरा ही, किसी का प्यार सालों बा'द किसी में कुछ नहीं बदला, मगर हाँ ये तो बदला है मिरे सब यार अब लगते, हैं ज़िम्मेदार सालों बा'द

Divy Kamaldhwaj

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राज़ जो भी था नज़र में आ गया आप का चेहरा नज़र में आ गया वक़्त आया था बुरा सो देख लो आप का लहजा नज़र में आ गया डूबने वाली थी कश्ती इश्क़ की और इक तिनका नज़र में आ गया पाक था मैं और दामन था सफ़ेद ख़ून का धब्बा नज़र में आ गया काम भी सारा किया और चुप रहे बोलने वाला नज़र में आ गया कल पिताजी हँस रहे थे और तभी पैर का छाला नज़र में आ गया

Divy Kamaldhwaj

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