ghazalKuch Alfaaz

सबने दिल से उसे उतारा था वो मरी कब थी उस को मारा था पैरों में गिरके जीता था जिस को उस को पाने में ख़ुद को हारा था तेरे मेरे में बट गया सब कुछ एक टाइम था सब हमारा था उस की यादों में दिल जले है अब जिस का चेहरा नहीं गवारा था मैं ने वो खोया जो मेरा नहीं था तुम ने वो खोया जो तुम्हारा था जीत सकता था उस सेे मैं कातिब पर बड़े हौसले से हारा था

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ

Mehshar Afridi

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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

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दुश्मनों से भी दोस्ती रक्खी मैं ने हाथों पे ज़िंदगी रक्खी मेरे हालात चाहे जो भी थे तेरे ख़ातिर कभी कमी रक्खी एक लड़के पे ज़िंदगी वारी एक लड़की सदा दुखी रक्खी हम ने तुझ को भुलाने की ख़ातिर कैसे कैसों से दोस्ती रक्खी मेरा बर्बाद होना बनता था सब सेे पहले तेरी ख़ुशी रक्खी

Himanshi babra KATIB

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उस ने दो चार कर दिया मुझ को ज़ेहनी बीमार कर दिया मुझ को क्यूँ नहीं दस्तरस में तू मेरे क्यूँ तलबगार कर दिया मुझ को कभी पत्थर कभी ख़ुदा उस ने चाहा जो यार कर दिया मुझ को उस सेे कोई सवाल मत करना उस ने इनकार कर दिया मुझ को एक इंसान ही तो माँगा था उस को भी मार कर दिया मुझ को

Himanshi babra KATIB

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बात ऐसी है ऐसा था पहले दर्द होने पे रोता था पहले जैसे चाहे वो खेला करता था मैं किसी का खिलौना था पहले तुझ पे कितना भरोसा करता था ख़ुद पे कितना भरोसा था पहले आख़िरी रास्ते पे चलने को पैर उस ने उठाया था पहले अब तो तस्वीर तक नहीं बनती मैं तो पैकर बनाता था पहले रौशनी आई जब जला कोई सबकी आँखों पे पर्दा था पहले गिनती पीछे से की गई वरना मेरा नंबर तो पहला था पहले

Himanshi babra KATIB

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आँख को आइना समझते हो तुम भी सबकी तरह समझते हो दोस्त अब क्यूँ नहीं समझते तुम तुम तो कहते थे ना समझते हो अपना ग़म तुम को कैसे समझाऊँ सब सेे हारा हुआ समझते हो मेरी दुनिया उजड़ गई इस में तुम इसे हादसा समझते हो आख़िरी रास्ता तो बाक़ी है आख़िरी रास्ता समझते हो

Himanshi babra KATIB

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