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देखना भी तो उन्हें दूर से देखा करना शेवा-ए-इश्क़ नहीं हुस्न को रुस्वा करना इक नज़र भी तिरी काफ़ी थी प-ए-राहत-ए-जाँ कुछ भी दुश्वार न था मुझ को शकेबा करना उन को याँ वादे पे आ लेने दे ऐ अब्र-ए-बहार जिस क़दर चाहना फिर बा'द में बरसा करना शाम हो या कि सहर याद उन्हीं की रखनी दिन हो या रात हमें ज़िक्र उन्हीं का करना सौम ज़ाहिद को मुबारक रहे आबिद को सलात आसियों को तिरी रहमत पे भरोसा करना आशिक़ो हुस्न-ए-जफ़ाकार का शिकवा है गुनाह तुम ख़बरदार ख़बरदार न ऐसा करना कुछ समझ में नहीं आता कि ये क्या है 'हसरत' उन से मिल कर भी न इज़हार-ए-तमन्ना करना

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इस से पहले कि तुझे और सहारा न मिले मैं तिरे साथ हूँ जब तक मिरे जैसा न मिले कम से कम बदले में जन्नत उसे दे दी जाए जिस मोहब्बत के गिरफ्तार को सेहरा ना मिले लोग कहते है के हम लोग बुरे आदमी है लोग भी ऐसे जिन्होने हमें देखा ना मिले बस यही कह के उसे मैं ने ख़ुदा को सौंपा इत्तिफ़ाक़न कही मिल जाए तो रोता ना मिले बद-दुआ है के वहाँ आए जहाँ बैठते थे और ‘अफ्कार’ वहाँ आप को बैठा ना मिले

Afkar Alvi

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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

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छोड़ कर जाने का दस्तूर नहीं होता था कोई भी ज़ख़्म हो नासूर नहीं होता था मेरे भी होंठ पे सिगरेट नहीं होती थी उस की भी माँग में सिंदूर नहीं होता था औरतें प्यार में तब शौक़ नहीं रखती थी आदमी इश्क़ में मज़दूर नहीं होता था

Kushal Dauneria

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यहाँ तुम देखना रुतबा हमारा हमारी रेत है दरिया हमारा किसी से कल पिताजी कह रहे थे मुहब्बत खा गई लड़का हमारा तअ'ल्लुक़ ख़त्म करने जा रही है कहीं गिरवा न दे बच्चा हमारा

Kushal Dauneria

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वैसे मैं ने दुनिया में क्या देखा है तुम कहते हो तो फिर अच्छा देखा है मैं उस को अपनी वहशत तोहफ़े में दूँ हाथ उठाए जिस ने सहरा देखा है बिन देखे उस की तस्वीर बना लूँगा आज तो मैं ने उस को इतना देखा है एक नज़र में मंज़र कब खुलते हैं दोस्त तू ने देखा भी है तो क्या देखा है इश्क़ में बंदा मर भी सकता है मैं ने दिल की दस्तावेज़ में लिखा देखा है मैं तो आँखें देख के ही बतला दूँगा तुम में से किस किस ने दरिया देखा है आगे सीधे हाथ पे एक तराई है मैं ने पहले भी ये रस्ता देखा है तुम को तो इस बाग़ का नाम पता होगा तुम ने तो इस शहर का नक़्शा देखा है

Tehzeeb Hafi

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और भी हो गए बेगाना वो ग़फ़लत कर के आज़माया जो उन्हें ज़ब्त-ए-मोहब्बत कर के दिल ने छोड़ा है न छोड़े तिरे मिलने का ख़याल बार-हा देख लिया हम ने मलामत कर के देखने आए थे वो अपनी मोहब्बत का असर कहने को ये है कि आए हैं अयादत कर के पस्ती-ए-हौसला-ए-शौक़ की अब है ये सलाह बैठ रहिए ग़म-ए-हिज्राँ पे क़नाअ'त कर के दिल ने पाया है मोहब्बत का ये आली रुत्बा आप के दर्द-ए-दवाकार की ख़िदमत कर के रूह ने पाई है तकलीफ़-ए-जुदाई से नजात आप की याद को सरमाया-ए-राहत कर के छेड़ से अब वो ये कहते हैं कि संभलों 'हसरत' सब्र ओ ताब-ए-दिल-ए-बीमार को ग़ारत कर के

Hasrat Mohani

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याद कर वो दिन कि तेरा कोई सौदाई न था बावजूद-ए-हुस्न तू आगाह-ए-रानाई न था इश्क़-ए-रोज़-अफ़्ज़ूँ पे अपने मुझ को हैरानी न थी जल्वा-ए-रंगीं पे तुझ को नाज़-ए-यकताई न था दीद के क़ाबिल थी मेरे इश्क़ की भी सादगी जबकि तेरा हुस्न सरगर्म-ए-ख़ुद-आराई न था क्या हुए वो दिन कि महव-ए-आरज़ू थे हुस्न ओ इश्क़ रब्त था दोनों में गो रब्त-ए-शनासाई न था तू ने 'हसरत' की अयाँ तहज़ीब-ए-रस्म-ए-आशिक़ी इस से पहले ए'तिबार-ए-शान-ए-रुस्वाई न था

Hasrat Mohani

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आसान-ए-हक़ीकी है न कुछ सहल-ए-मजाज़ी मालूम हुई राह-ए-मोहब्बत की दराज़ी कुछ लुत्फ़ ओ नज़र लाज़िम ओ मलज़ूम नहीं हैं इक ये भी तमन्ना की न हो शोबदा बाज़ी दिल ख़ूब समझता है तिरे हर्फ़-ए-करम को हर-चंद वो उर्दू है न तुर्की है न ताज़ी क़ाएम है न वो हुस्न-ए-रुख़-ए-यार का आलम बाक़ी है न वो शौक़ की हंगामा-नवाज़ी ऐ इश्क़ तिरी फ़तह बहर-हाल है साबित मर कर भी शहीदान-ए-मोहब्बत हुए ग़ाज़ी कर जल्द हमें ख़त्म कहीं ऐ ग़म-ए-जानाँ काम आएगी किस रोज़ तिरी सीना-गुदाज़ी मालूम है दुनिया को ये 'हसरत' की हक़ीक़त ख़ल्वत में वो मय-ख़्वार है जल्वत में नमाज़ी

Hasrat Mohani

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क्या वो अब नादिम हैं अपने जौर की रूदाद से लाए हैं मेरठ जो आख़िर मुझ को फ़ैज़ाबाद से सैर-ए-गुल को आई थी जिस दम सवारी आप की फूल उट्ठा था चमन फ़ख़्र-ए-मुबारकबाद से हर कस-ओ-ना-कस हो क्यूँँकर कामगार-ए-बे-ख़ुदी ये हुनर सीखा है दिल ने इक बड़े उस्ताद से इक जहाँ मस्त-ए-मोहब्बत है कि हर सू ब-ए-उन्स छाई है उन गेसुओं की निकहत-ए-बर्बाद से अब तलक मौजूद है कुछ कुछ लगा लाए थे हम वो जो इक लपका कभी न ख़ाक-ए-जहाँ आबाद से दावा-ए-तक़्वा का 'हसरत' किस को आता है यक़ीं आप और जाते रहें पीर-ए-मुग़ाँ की याद से

Hasrat Mohani

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तुझ से गिरवीदा यक ज़माना रहा कुछ फ़क़त मैं ही मुब्तला न रहा आप को अब हुई है क़द्र-ए-वफ़ा जब कि मैं लाइक़-ए-जफ़ा न रहा राह-ओ-रस्म-ए-वफ़ा वो भूल गए अब हमें भी कोई गिला न रहा हुस्न ख़ुद हो गया ग़रीब-नवाज़ इश्क़ मुहताज-ए-इल्तेजा न रहा बस-कि नज़्ज़ारा-सोज़ था वो जमाल होश-ए-नज़्ज़ारगी बजा न रहा मैं कभी तुझ से बद-गुमाँ न हुआ तू कभी मुझ से आश्ना न रहा आप का शौक़ भी तो अब दिल में आप की याद के सिवा न रहा और भी हो गए वो ग़ाफ़िल-ए-ख़्वाब नाला-ए-सुब्ह-ए-ना-रसा न रहा हुस्न का नाज़ आशिक़ी का नियाज़ अब तो कुछ भी वो माजरा न रहा इश्क़ जब शिकवा संज-ए-हुस्न हुआ इल्तिजा हो गई गिला न रहा हम भरोसे पे उन के बैठ रहे जब किसी का भी आसरा न रहा मेरे ग़म की हुई उन्हें भी ख़बर अब तो ये दर्द ला-दवा न रहा आरज़ू तेरी बरक़रार रहे दिल का क्या है रहा रहा न रहा हो गए ख़त्म मुझ पे जौर-ए-फ़लक अब कोई मोरिद-ए-बला न रहा जब से देखी अबुल-कलाम की नस्र नज़्म-ए-'हसरत' में भी मज़ा न रहा

Hasrat Mohani

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