इस से पहले कि तुझे और सहारा न मिले मैं तिरे साथ हूँ जब तक मिरे जैसा न मिले कम से कम बदले में जन्नत उसे दे दी जाए जिस मोहब्बत के गिरफ्तार को सेहरा ना मिले लोग कहते है के हम लोग बुरे आदमी है लोग भी ऐसे जिन्होने हमें देखा ना मिले बस यही कह के उसे मैं ने ख़ुदा को सौंपा इत्तिफ़ाक़न कही मिल जाए तो रोता ना मिले बद-दुआ है के वहाँ आए जहाँ बैठते थे और ‘अफ्कार’ वहाँ आप को बैठा ना मिले
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है
Shabeena Adeeb
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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला
Tehzeeb Hafi
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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
Ahmad Faraz
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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे
Tehzeeb Hafi
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कौन कहता है फ़क़त ख़ौफ़-ए-अज़ल देता है ज़ुल्म तो ज़ुल्म है, ईमान बदल देता है बेबसी मज़हबी इंसान बना देती है मान लेते हैं ख़ुदा सब्र का फल देता है वो बख़ील आज भी दाता है, भले वक़्त न दे मैं उसे याद भी कर लूँ तो ग़ज़ल देता है उस की कोशिश है कि वो अपनी कशिश बाक़ी रखे मेरे जज़्बात मचलते हैं तो चल देता है ख़ाली बर्तन ही खनकता है, तभी आदमी भी घास मत डालो तो औक़ात उगल देता है हम को मेहनत पे ही मिलना है अगर ख़ुल्द में चैन ये तो घर बैठे-बिठाये हमें थल देता है ज़ेहन में और कोई दुख नहीं रहता 'अफ़कार' जितने बल बंदे को वो ज़ुल्फ़ का बल देता है
Afkar Alvi
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हिज्र में ख़ुद को तसल्ली दी, कहा कुछ भी नहीं दिल मगर हँसने लगा, आया बड़ा कुछ भी नहीं हम अगर सब्र में रहते हैं तो क्या कुछ भी नहीं जाने वालो! कभी आ देखो, बचा कुछ भी नहीं बे-दिली यूँँ ही कि रब कोई मसीहा भेजे हम मसीहा से भी कह देंगे, ओ जा! कुछ भी नहीं देखे बिन इश्क़ हुआ, देखे बिना दूर हुए इतना कुछ हो भी गया और हुआ कुछ भी नहीं सस्ते आबिद न बनें, लत को इबादत न कहें आशिक़ी लज़्ज़त-ओ-ज़िल्लत के सिवा कुछ भी नहीं मैं तेरे बा'द मुसल्ली पे बहुत रोता रहा और कहा, यार ख़ुदा! ख़ैर भला कुछ भी नहीं इश्क़ मरदाना तबीअत नहीं रखता 'अफ़कार'! वरना ये हुस्न-ओ-जमाल और अदा कुछ भी नहीं
Afkar Alvi
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चारपाई पे आ उतारी है ज़िन्दगी ज़िंदा लाश भारी है आप दुख दे रहे है रो रहा हूँ और ये फ़िलहाल जारी है रोना लिखा गया रोते है जिम्मेदारी तो जिम्मेदारी है मेरी मर्ज़ी जहाँ भी सर्फ़ करूँ ज़िन्दगी मेरी है, तुम्हारी है दुश्मनी के हजारो दर्जे है आख़िरी दर्जा रिशतादारी है
Afkar Alvi
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जो भी इज़्ज़त के डर से डर जाए मत करे इश्क़ अपने घर जाए बात आ जाए जब दु'आओं पर इस सेे बेहतर है बंदा मर जाए थोड़ी सी और देर सामने रह मेरी आँखों का पेट भर जाए अल-मुहैमिन के घर भी ख़तरे हैं जाए भी तो कोई किधर जाए हाँ अक़ीदा अगर न क़ैद रखे फिर तो इंसान कुछ भी कर जाए बेबसी की ये आख़िरी हद है मेरी औलाद आप पर जाए उस के चेहरे पर आज उदासी थी हाए 'अफ़्कार अल्वी' मर जाए
Afkar Alvi
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