ghazalKuch Alfaaz

कौन कहता है फ़क़त ख़ौफ़-ए-अज़ल देता है ज़ुल्म तो ज़ुल्म है, ईमान बदल देता है बेबसी मज़हबी इंसान बना देती है मान लेते हैं ख़ुदा सब्र का फल देता है वो बख़ील आज भी दाता है, भले वक़्त न दे मैं उसे याद भी कर लूँ तो ग़ज़ल देता है उस की कोशिश है कि वो अपनी कशिश बाक़ी रखे मेरे जज़्बात मचलते हैं तो चल देता है ख़ाली बर्तन ही खनकता है, तभी आदमी भी घास मत डालो तो औक़ात उगल देता है हम को मेहनत पे ही मिलना है अगर ख़ुल्द में चैन ये तो घर बैठे-बिठाये हमें थल देता है ज़ेहन में और कोई दुख नहीं रहता 'अफ़कार' जितने बल बंदे को वो ज़ुल्फ़ का बल देता है

Afkar Alvi10 Likes

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा कश्ती के मुसाफ़िर ने समुंदर नहीं देखा बे-वक़्त अगर जाऊँगा सब चौंक पड़ेंगे इक उम्र हुई दिन में कभी घर नहीं देखा जिस दिन से चला हूँ मिरी मंज़िल पे नज़र है आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा ये फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं तुम ने मिरा काँटों भरा बिस्तर नहीं देखा यारों की मोहब्बत का यक़ीं कर लिया मैं ने फूलों में छुपाया हुआ ख़ंजर नहीं देखा महबूब का घर हो कि बुज़ुर्गों की ज़मीनें जो छोड़ दिया फिर उसे मुड़ कर नहीं देखा ख़त ऐसा लिखा है कि नगीने से जड़े हैं वो हाथ कि जिस ने कोई ज़ेवर नहीं देखा पत्थर मुझे कहता है मिरा चाहने वाला मैं मोम हूँ उस ने मुझे छू कर नहीं देखा

Bashir Badr

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तेरा चुप रहना मेरे ज़ेहन में क्या बैठ गया इतनी आवाज़ें तुझे दीं कि गला बैठ गया यूँँ नहीं है कि फ़क़त मैं ही उसे चाहता हूँ जो भी उस पेड़ की छाँव में गया बैठ गया इतना मीठा था वो ग़ुस्से भरा लहजा मत पूछ उस ने जिस को भी जाने का कहा, बैठ गया अपना लड़ना भी मोहब्बत है तुम्हें इल्म नहीं चीख़ती तुम रही और मेरा गला बैठ गया उस की मर्ज़ी वो जिसे पास बिठा ले अपने इस पे क्या लड़ना फुलाँ मेरी जगह बैठ गया बात दरियाओं की, सूरज की, न तेरी है यहाँ दो क़दम जो भी मेरे साथ चला बैठ गया बज़्म-ए-जानाँ में नशिस्तें नहीं होतीं मख़्सूस जो भी इक बार जहाँ बैठ गया बैठ गया

Tehzeeb Hafi

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ठहराव तो उस में था ही नहीं, रुकती थी निकल लिया करती थी मैं कपड़े बदलते सोचता था, वो मर्द बदल लिया करती थी मुझे अपने बनाए रास्तों पर भी जूते पहनना पड़ते थे वो लोगों के सीने पर भी जूते उतार कर चल लिया करती थी मेरे हाथ ज़बूँ हो जाते थे मेरे चश्में स्याह हो जाते थे मैं उस को नक़ाब का कहता था, वो कालिख मल लिया करती थी उस औरत ने बेज़ार किया, इक बार नहीं सौ बार किया गानों पे उछल नहीं पाती थी, बातों पे उछल लिया करती थी तारीक़ महल को शाहज़ादी ने रौशन रक्खा कनीज़ों से कभी उन को जला लिया करती थी कभी उन सेे जल लिया करती थी आदाब-ए-तिज़ारत से भी ना-वाक़िफ़ थी शेर-ओ-अदब की तरह मुझे वैसा प्यार नहीं देती थी जैसी ग़ज़ल लिया करती थी

Muzdum Khan

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हिज्र में ख़ुद को तसल्ली दी, कहा कुछ भी नहीं दिल मगर हँसने लगा, आया बड़ा कुछ भी नहीं हम अगर सब्र में रहते हैं तो क्या कुछ भी नहीं जाने वालो! कभी आ देखो, बचा कुछ भी नहीं बे-दिली यूँँ ही कि रब कोई मसीहा भेजे हम मसीहा से भी कह देंगे, ओ जा! कुछ भी नहीं देखे बिन इश्क़ हुआ, देखे बिना दूर हुए इतना कुछ हो भी गया और हुआ कुछ भी नहीं सस्ते आबिद न बनें, लत को इबादत न कहें आशिक़ी लज़्ज़त-ओ-ज़िल्लत के सिवा कुछ भी नहीं मैं तेरे बा'द मुसल्ली पे बहुत रोता रहा और कहा, यार ख़ुदा! ख़ैर भला कुछ भी नहीं इश्क़ मरदाना तबीअत नहीं रखता 'अफ़कार'! वरना ये हुस्न-ओ-जमाल और अदा कुछ भी नहीं

Afkar Alvi

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चारपाई पे आ उतारी है ज़िन्दगी ज़िंदा लाश भारी है आप दुख दे रहे है रो रहा हूँ और ये फ़िलहाल जारी है रोना लिखा गया रोते है जिम्मेदारी तो जिम्मेदारी है मेरी मर्ज़ी जहाँ भी सर्फ़ करूँ ज़िन्दगी मेरी है, तुम्हारी है दुश्मनी के हजारो दर्जे है आख़िरी दर्जा रिशतादारी है

Afkar Alvi

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जो भी इज़्ज़त के डर से डर जाए मत करे इश्क़ अपने घर जाए बात आ जाए जब दु'आओं पर इस सेे बेहतर है बंदा मर जाए थोड़ी सी और देर सामने रह मेरी आँखों का पेट भर जाए अल-मुहैमिन के घर भी ख़तरे हैं जाए भी तो कोई किधर जाए हाँ अक़ीदा अगर न क़ैद रखे फिर तो इंसान कुछ भी कर जाए बेबसी की ये आख़िरी हद है मेरी औलाद आप पर जाए उस के चेहरे पर आज उदासी थी हाए 'अफ़्कार अल्वी' मर जाए

Afkar Alvi

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इस से पहले कि तुझे और सहारा न मिले मैं तिरे साथ हूँ जब तक मिरे जैसा न मिले कम से कम बदले में जन्नत उसे दे दी जाए जिस मोहब्बत के गिरफ्तार को सेहरा ना मिले लोग कहते है के हम लोग बुरे आदमी है लोग भी ऐसे जिन्होने हमें देखा ना मिले बस यही कह के उसे मैं ने ख़ुदा को सौंपा इत्तिफ़ाक़न कही मिल जाए तो रोता ना मिले बद-दुआ है के वहाँ आए जहाँ बैठते थे और ‘अफ्कार’ वहाँ आप को बैठा ना मिले

Afkar Alvi

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