sherKuch Alfaaz
ऐसा मत कर वैसा मत कर उस से कहना छोड़ दिया पता नहीं क्या सूझी मैं ने ये दुख सहना छोड़ दिया

Writer
@afkar-alvi
4
Sher
4
Ghazal
1
Nazm
ऐसा मत कर वैसा मत कर उस से कहना छोड़ दिया पता नहीं क्या सूझी मैं ने ये दुख सहना छोड़ दिया
बद-दुआ है के वहाँ आए जहाँ बैठते थे और ‘अफ़्कार’ वहाँ आप को बैठा न मिले
हिज्र में ख़ुद को तसल्ली दी कहा कुछ भी नहीं दिल मगर हँसने लगा आया बड़ा कुछ भी नहीं
फिर एक रोज़ मुक़द्दर से हार मानी गई ज़बीन चूम के बोला गया "ख़ुदा हाफ़िज़"
अपने भी तुझ को अपनों में अब गिन नहीं रहे 'अफ़कार' मान जा कि तेरे दिन नहीं रहे
इस से पहले कि तुझे और सहारा न मिले मैं तिरे साथ हूँ जब तक मिरे जैसा न मिले
मैं तुम्हें बद्दुआएं देता हूँ ताकि तुम मेरा दर्द जान सको
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