हिज्र में ख़ुद को तसल्ली दी, कहा कुछ भी नहीं दिल मगर हँसने लगा, आया बड़ा कुछ भी नहीं हम अगर सब्र में रहते हैं तो क्या कुछ भी नहीं जाने वालो! कभी आ देखो, बचा कुछ भी नहीं बे-दिली यूँँ ही कि रब कोई मसीहा भेजे हम मसीहा से भी कह देंगे, ओ जा! कुछ भी नहीं देखे बिन इश्क़ हुआ, देखे बिना दूर हुए इतना कुछ हो भी गया और हुआ कुछ भी नहीं सस्ते आबिद न बनें, लत को इबादत न कहें आशिक़ी लज़्ज़त-ओ-ज़िल्लत के सिवा कुछ भी नहीं मैं तेरे बा'द मुसल्ली पे बहुत रोता रहा और कहा, यार ख़ुदा! ख़ैर भला कुछ भी नहीं इश्क़ मरदाना तबीअत नहीं रखता 'अफ़कार'! वरना ये हुस्न-ओ-जमाल और अदा कुछ भी नहीं
Related Ghazal
यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
526 likes
उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
465 likes
चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
406 likes
क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
371 likes
ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
355 likes
More from Afkar Alvi
कौन कहता है फ़क़त ख़ौफ़-ए-अज़ल देता है ज़ुल्म तो ज़ुल्म है, ईमान बदल देता है बेबसी मज़हबी इंसान बना देती है मान लेते हैं ख़ुदा सब्र का फल देता है वो बख़ील आज भी दाता है, भले वक़्त न दे मैं उसे याद भी कर लूँ तो ग़ज़ल देता है उस की कोशिश है कि वो अपनी कशिश बाक़ी रखे मेरे जज़्बात मचलते हैं तो चल देता है ख़ाली बर्तन ही खनकता है, तभी आदमी भी घास मत डालो तो औक़ात उगल देता है हम को मेहनत पे ही मिलना है अगर ख़ुल्द में चैन ये तो घर बैठे-बिठाये हमें थल देता है ज़ेहन में और कोई दुख नहीं रहता 'अफ़कार' जितने बल बंदे को वो ज़ुल्फ़ का बल देता है
Afkar Alvi
10 likes
इस से पहले कि तुझे और सहारा न मिले मैं तिरे साथ हूँ जब तक मिरे जैसा न मिले कम से कम बदले में जन्नत उसे दे दी जाए जिस मोहब्बत के गिरफ्तार को सेहरा ना मिले लोग कहते है के हम लोग बुरे आदमी है लोग भी ऐसे जिन्होने हमें देखा ना मिले बस यही कह के उसे मैं ने ख़ुदा को सौंपा इत्तिफ़ाक़न कही मिल जाए तो रोता ना मिले बद-दुआ है के वहाँ आए जहाँ बैठते थे और ‘अफ्कार’ वहाँ आप को बैठा ना मिले
Afkar Alvi
38 likes
जो भी इज़्ज़त के डर से डर जाए मत करे इश्क़ अपने घर जाए बात आ जाए जब दु'आओं पर इस सेे बेहतर है बंदा मर जाए थोड़ी सी और देर सामने रह मेरी आँखों का पेट भर जाए अल-मुहैमिन के घर भी ख़तरे हैं जाए भी तो कोई किधर जाए हाँ अक़ीदा अगर न क़ैद रखे फिर तो इंसान कुछ भी कर जाए बेबसी की ये आख़िरी हद है मेरी औलाद आप पर जाए उस के चेहरे पर आज उदासी थी हाए 'अफ़्कार अल्वी' मर जाए
Afkar Alvi
38 likes
चारपाई पे आ उतारी है ज़िन्दगी ज़िंदा लाश भारी है आप दुख दे रहे है रो रहा हूँ और ये फ़िलहाल जारी है रोना लिखा गया रोते है जिम्मेदारी तो जिम्मेदारी है मेरी मर्ज़ी जहाँ भी सर्फ़ करूँ ज़िन्दगी मेरी है, तुम्हारी है दुश्मनी के हजारो दर्जे है आख़िरी दर्जा रिशतादारी है
Afkar Alvi
28 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Afkar Alvi.
Similar Moods
More moods that pair well with Afkar Alvi's ghazal.







