याद कर वो दिन कि तेरा कोई सौदाई न था बावजूद-ए-हुस्न तू आगाह-ए-रानाई न था इश्क़-ए-रोज़-अफ़्ज़ूँ पे अपने मुझ को हैरानी न थी जल्वा-ए-रंगीं पे तुझ को नाज़-ए-यकताई न था दीद के क़ाबिल थी मेरे इश्क़ की भी सादगी जबकि तेरा हुस्न सरगर्म-ए-ख़ुद-आराई न था क्या हुए वो दिन कि महव-ए-आरज़ू थे हुस्न ओ इश्क़ रब्त था दोनों में गो रब्त-ए-शनासाई न था तू ने 'हसरत' की अयाँ तहज़ीब-ए-रस्म-ए-आशिक़ी इस से पहले ए'तिबार-ए-शान-ए-रुस्वाई न था
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा
Hasan Abbasi
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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का
Waseem Barelvi
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और भी हो गए बेगाना वो ग़फ़लत कर के आज़माया जो उन्हें ज़ब्त-ए-मोहब्बत कर के दिल ने छोड़ा है न छोड़े तिरे मिलने का ख़याल बार-हा देख लिया हम ने मलामत कर के देखने आए थे वो अपनी मोहब्बत का असर कहने को ये है कि आए हैं अयादत कर के पस्ती-ए-हौसला-ए-शौक़ की अब है ये सलाह बैठ रहिए ग़म-ए-हिज्राँ पे क़नाअ'त कर के दिल ने पाया है मोहब्बत का ये आली रुत्बा आप के दर्द-ए-दवाकार की ख़िदमत कर के रूह ने पाई है तकलीफ़-ए-जुदाई से नजात आप की याद को सरमाया-ए-राहत कर के छेड़ से अब वो ये कहते हैं कि संभलों 'हसरत' सब्र ओ ताब-ए-दिल-ए-बीमार को ग़ारत कर के
Hasrat Mohani
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आसान-ए-हक़ीकी है न कुछ सहल-ए-मजाज़ी मालूम हुई राह-ए-मोहब्बत की दराज़ी कुछ लुत्फ़ ओ नज़र लाज़िम ओ मलज़ूम नहीं हैं इक ये भी तमन्ना की न हो शोबदा बाज़ी दिल ख़ूब समझता है तिरे हर्फ़-ए-करम को हर-चंद वो उर्दू है न तुर्की है न ताज़ी क़ाएम है न वो हुस्न-ए-रुख़-ए-यार का आलम बाक़ी है न वो शौक़ की हंगामा-नवाज़ी ऐ इश्क़ तिरी फ़तह बहर-हाल है साबित मर कर भी शहीदान-ए-मोहब्बत हुए ग़ाज़ी कर जल्द हमें ख़त्म कहीं ऐ ग़म-ए-जानाँ काम आएगी किस रोज़ तिरी सीना-गुदाज़ी मालूम है दुनिया को ये 'हसरत' की हक़ीक़त ख़ल्वत में वो मय-ख़्वार है जल्वत में नमाज़ी
Hasrat Mohani
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अपना सा शौक़ औरों में लाएँ कहाँ से हम घबरा गए हैं बे-दिली-ए-हमरहाँ से हम कुछ ऐसी दूर भी तो नहीं मंज़िल-ए-मुराद लेकिन ये जब कि छूट चलें कारवाँ से हम ऐ याद-ए-यार देख कि बा-वस्फ़-ए-रंज-ए-हिज्र मसरूर हैं तिरी ख़लिश-ए-ना-तवाँ से हम मालूम सब है पूछते हो फिर भी मुद्दआ' अब तुम से दिल की बात कहें क्या ज़बाँ से हम ऐ ज़ोहद-ए-ख़ुश्क तेरी हिदायत के वास्ते सौग़ात-ए-इश्क़ लाए हैं कू-ए-बुताँ से हम बेताबियों से छुप न सका हाल-ए-आरज़ू आख़िर बचे न उस निगह-ए-बद-गुमा से हम पीराना-सर भी शौक़ की हिम्मत बुलंद है ख़्वाहान-ए-काम-ए-जाँ हैं जो उस नौजवाँ से हम मायूस भी तो करते नहीं तुम ज़-राह-ए-नाज़ तंग आ गए हैं कशमकश-ए-इम्तिहाँ से हम ख़ल्वत बनेगी तेरे ग़म-ए-जाँ-नवाज़ की लेंगे ये काम अपने दिल-ए-शादमाँ से हम है इंतिहा-ए-यास भी इक इब्तिदा-ए-शौक़ फिर आ गए वहीं पे चले थे जहाँ से हम 'हसरत' फिर और जा के करें किस की बंदगी अच्छा जो सर उठाएँ भी इस आस्ताँ से हम
Hasrat Mohani
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तुझ से गिरवीदा यक ज़माना रहा कुछ फ़क़त मैं ही मुब्तला न रहा आप को अब हुई है क़द्र-ए-वफ़ा जब कि मैं लाइक़-ए-जफ़ा न रहा राह-ओ-रस्म-ए-वफ़ा वो भूल गए अब हमें भी कोई गिला न रहा हुस्न ख़ुद हो गया ग़रीब-नवाज़ इश्क़ मुहताज-ए-इल्तेजा न रहा बस-कि नज़्ज़ारा-सोज़ था वो जमाल होश-ए-नज़्ज़ारगी बजा न रहा मैं कभी तुझ से बद-गुमाँ न हुआ तू कभी मुझ से आश्ना न रहा आप का शौक़ भी तो अब दिल में आप की याद के सिवा न रहा और भी हो गए वो ग़ाफ़िल-ए-ख़्वाब नाला-ए-सुब्ह-ए-ना-रसा न रहा हुस्न का नाज़ आशिक़ी का नियाज़ अब तो कुछ भी वो माजरा न रहा इश्क़ जब शिकवा संज-ए-हुस्न हुआ इल्तिजा हो गई गिला न रहा हम भरोसे पे उन के बैठ रहे जब किसी का भी आसरा न रहा मेरे ग़म की हुई उन्हें भी ख़बर अब तो ये दर्द ला-दवा न रहा आरज़ू तेरी बरक़रार रहे दिल का क्या है रहा रहा न रहा हो गए ख़त्म मुझ पे जौर-ए-फ़लक अब कोई मोरिद-ए-बला न रहा जब से देखी अबुल-कलाम की नस्र नज़्म-ए-'हसरत' में भी मज़ा न रहा
Hasrat Mohani
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है मश्क़-ए-सुख़न जारी चक्की की मशक़्क़त भी इक तुर्फ़ा तमाशा है 'हसरत' की तबीअत भी जो चाहो सज़ा दे लो तुम और भी खुल खेलो पर हम से क़सम ले लो की हो जो शिकायत भी दुश्वार है रिंदों पर इंकार-ए-करम यकसर ऐ साक़ी-ए-जाँ-परवर कुछ लुत्फ़-ओ-इनायत भी दिल बस-कि है दीवाना उस हुस्न-ए-गुलाबी का रंगीं है उसी रू से शायद ग़म-ए-फ़ुर्क़त भी ख़ुद इश्क़ की गुस्ताख़ी सब तुझ को सिखा देगी ऐ हुस्न-ए-हया-परवर शोख़ी भी शरारत भी बरसात के आते ही तौबा न रही बाक़ी बादल जो नज़र आए बदली मेरी निय्यत भी उश्शाक़ के दिल नाज़ुक उस शोख़ की ख़ू नाज़ुक नाज़ुक इसी निस्बत से है कार-ए-मोहब्बत भी रखते हैं मिरे दिल पर क्यूँँ तोहमत-ए-बेताबी याँ नाला-ए-मुज़्तर की जब मुझ में हो क़ुव्वत भी ऐ शौक़ की बेबाकी वो क्या तेरी ख़्वाहिश थी जिस पर उन्हें ग़ुस्सा है इनकार भी हैरत भी हर-चंद है दिल शैदा हुर्रियत-ए-कामिल का मंज़ूर-ए-दुआ लेकिन है क़ैद-ए-मोहब्बत भी हैं 'शाद' ओ 'सफ़ी' शाइ'र या 'शौक़' ओ 'वफ़ा' 'हसरत' फिर 'ज़ामिन' ओ 'महशर' हैं 'इक़बाल' भी 'वहशत' भी
Hasrat Mohani
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