ghazalKuch Alfaaz

धूप ने गुज़ारिश की एक बूँद बारिश की लो गले पड़े काँटे क्यूँँ गुलों की ख़्वाहिश की जगमगा उठे तारे बात थी नुमाइश की इक पतिंगा उजरत थी छिपकिली की जुम्बिश की हम तवक़्क़ो' रखते हैं और वो भी बख़्शिश की लुत्फ़ आ गया 'अल्वी' वाह ख़ूब कोशिश की

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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बा'द में मुझ से ना कहना घर पलटना ठीक है वैसे सुनने में यही आया है रस्ता ठीक है शाख से पत्ता गिरे, बारिश रुके, बादल छटें मैं ही तो सब कुछ ग़लत करता हूँ अच्छा ठीक है जेहन तक तस्लीम कर लेता है उस की बरतरी आँख तक तस्दीक़ कर देती है बंदा ठीक है एक तेरी आवाज़ सुनने के लिए ज़िंदा है हम तू ही जब ख़ामोश हो जाए तो फिर क्या ठीक है

Tehzeeb Hafi

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सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई क्यूँँ चीख़ चीख़ कर न गला छील ले कोई साबित हुआ सुकून-ए-दिल-ओ-जाँ कहीं नहीं रिश्तों में ढूँढ़ता है तो ढूँडा करे कोई तर्क-ए-तअल्लुक़ात कोई मसअला नहीं ये तो वो रास्ता है कि बस चल पड़े कोई दीवार जानता था जिसे मैं वो धूल थी अब मुझ को ए'तिमाद की दावत न दे कोई मैं ख़ुद ये चाहता हूँ कि हालात हों ख़राब मेरे ख़िलाफ़ ज़हर उगलता फिरे कोई ऐ शख़्स अब तो मुझ को सभी कुछ क़ुबूल है ये भी क़ुबूल है कि तुझे छीन ले कोई हाँ ठीक है मैं अपनी अना का मरीज़ हूँ आख़िर मेरे मिज़ाज में क्यूँँ दख़्ल दे कोई इक शख़्स कर रहा है अभी तक वफ़ा का ज़िक्र काश उस ज़बाँ-दराज़ का मुँह नोच ले कोई

Jaun Elia

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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

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बिछड़ कर उस का दिल लग भी गया तो क्या लगेगा वो थक जाएगा और मेरे गले से आ लगेगा मैं मुश्किल में तुम्हारे काम आऊँ या ना आऊँ मुझे आवाज़ दे लेना तुम्हें अच्छा लगेगा मैं जिस कोशिश से उस को भूल जाने में लगा हूँ ज़्यादा भी अगर लग जाए तो हफ़्ता लगेगा

Tehzeeb Hafi

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दिन इक के बा'द एक गुज़रते हुए भी देख इक दिन तू अपने आप को मरते हुए भी देख हर वक़्त खिलते फूल की जानिब तका न कर मुरझा के पत्तियों को बिखरते हुए भी देख हाँ देख बर्फ़ गिरती हुई बाल बाल पर तपते हुए ख़याल ठिठुरते हुए भी देख अपनों में रह के किस लिए सहमा हुआ है तू आ मुझ को दुश्मनों से न डरते हुए भी देख पैवंद बादलों के लगे देख जा-ब-जा बगलों को आसमान कतरते हुए भी देख हैरान मत हो तैरती मछली को देख कर पानी में रौशनी को उतरते हुए भी देख उस को ख़बर नहीं है अभी अपने हुस्न की आईना दे के बनते-सँवरते हुए भी देख देखा न होगा तू ने मगर इंतिज़ार में चलते हुए समय को ठहरते हुए भी देख ता'रीफ़ सुन के दोस्त से 'अल्वी' तू ख़ुश न हो उस को तिरी बुराइयाँ करते हुए भी देख

Mohammad Alvi

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