धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो सिर्फ़ आँखों से ही दुनिया नहीं देखी जाती दिल की धड़कन को भी बीनाई बना कर देखो पत्थरों में भी ज़बाँ होती है दिल होते हैं अपने घर के दर-ओ-दीवार सजा कर देखो वो सितारा है चमकने दो यूँँ ही आँखों में क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बना कर देखो फ़ासला नज़रों का धोका भी तो हो सकता है वो मिले या न मिले हाथ बढ़ा कर देखो
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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर
Anwar Shaoor
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा
Fahmi Badayuni
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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दुख में नीर बहा देते थे सुख में हँसने लगते थे सीधे-सादे लोग थे लेकिन कितने अच्छे लगते थे नफ़रत चढ़ती आँधी जैसी प्यार उबलते चश्मों सा बैरी हूँ या संगी साथी सारे अपने लगते थे बहते पानी दुख-सुख बाँटें पेड़ बड़े बूढ़ों जैसे बच्चों की आहट सुनते ही खेत लहकने लगते थे नदिया पर्बत चाँद निगाहें माला एक कई दाने छोटे छोटे से आँगन भी कोसों फैले लगते थे
Nida Fazli
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दिन सलीक़े से उगा रात ठिकाने से रही दोस्ती अपनी भी कुछ रोज़ ज़माने से रही चंद लम्हों को ही बनती हैं मुसव्विर आँखें ज़िंदगी रोज़ तो तस्वीर बनाने से रही इस अँधेरे में तो ठोकर ही उजाला देगी रात जंगल में कोई शम्अ' जलाने से रही फ़ासला चाँद बना देता है हर पत्थर को दूर की रौशनी नज़दीक तो आने से रही शहर में सब को कहाँ मिलती है रोने की जगह अपनी इज़्ज़त भी यहाँ हँसने हँसाने से रही
Nida Fazli
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ज़मीं दी है तो थोड़ा सा आसमाँ भी दे मिरे ख़ुदा मिरे होने का कुछ गुमाँ भी दे बना के बुत मुझे बीनाई का अज़ाब न दे ये ही अज़ाब है क़िस्मत तो फिर ज़बाँ भी दे ये काएनात का फैलाव तो बहुत कम है जहाँ समा सके तन्हाई वो मकाँ भी दे मैं अपने आप से कब तक किया करूँँ बातें मिरी ज़बाँ को भी कोई तर्जुमाँ भी दे फ़लक को चाँद-सितारे नवाज़ने वाले मुझे चराग़ जलाने को साएबाँ भी दे
Nida Fazli
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आनी जानी हर मोहब्बत है चलो यूँ ही सही जब तलक है ख़ूब-सूरत है चलो यूँ ही सही हम कहाँ के देवता हैं बे-वफ़ा वो हैं तो क्या घर में कोई घर की ज़ीनत है चलो यूँ ही सही वो नहीं तो कोई तो होगा कहीं उस की तरह जिस्म में जब तक हरारत है चलो यूँ ही सही मैले हो जाते हैं रिश्ते भी लिबासों की तरह दोस्ती हर दिन की मेहनत है चलो यूँ ही सही भूल थी अपनी फ़रिश्ता आदमी में ढूँढ़ना आदमी में आदमिय्यत है चलो यूँ ही सही जैसी होनी चाहिए थी वैसी तो दुनिया नहीं दुनिया-दारी भी ज़रूरत है चलो यूँ ही सही
Nida Fazli
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हर एक घर में दिया भी जले अनाज भी हो अगर न हो कहीं ऐसा तो एहतिजाज भी हो रहेगी वा'दों में कब तक असीर ख़ुश-हाली हर एक बार ही कल क्यूँँ कभी तो आज भी हो न करते शोर-शराबा तो और क्या करते तुम्हारे शहर में कुछ और काम-काज भी हो हुकूमतों को बदलना तो कुछ मुहाल नहीं हुकूमतें जो बदलता है वो समाज भी हो बदल रहे हैं कई आदमी दरिंदों में मरज़ पुराना है इस का नया इलाज भी हो अकेले ग़म से नई शा'इरी नहीं होती ज़बान-ए-'मीर' में 'ग़ालिब' का इम्तिज़ाज भी हो
Nida Fazli
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