ज़मीं दी है तो थोड़ा सा आसमाँ भी दे मिरे ख़ुदा मिरे होने का कुछ गुमाँ भी दे बना के बुत मुझे बीनाई का अज़ाब न दे ये ही अज़ाब है क़िस्मत तो फिर ज़बाँ भी दे ये काएनात का फैलाव तो बहुत कम है जहाँ समा सके तन्हाई वो मकाँ भी दे मैं अपने आप से कब तक किया करूँँ बातें मिरी ज़बाँ को भी कोई तर्जुमाँ भी दे फ़लक को चाँद-सितारे नवाज़ने वाले मुझे चराग़ जलाने को साएबाँ भी दे
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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे
Tehzeeb Hafi
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
Ahmad Faraz
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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है
Waseem Barelvi
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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो
Jaun Elia
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जिसे देखते ही ख़ुमारी लगे उसे उम्र सारी हमारी लगे उजाला सा है उस के चारों तरफ़ वो नाज़ुक बदन पाँव भारी लगे वो ससुराल से आई है माइके उसे जितना देखो वो प्यारी लगे हसीन सूरतें और भी हैं मगर वो सब सैकड़ों में हज़ारी लगे चलो इस तरह से सजाएँ उसे ये दुनिया हमारी तुम्हारी लगे उसे देखना शेर-गोई का फ़न उसे सोचना दीन-दारी लगे
Nida Fazli
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कोई किसी की तरफ़ है कोई किसी की तरफ़ कहाँ है शहर में अब कोई ज़िंदगी की तरफ़ सभी की नज़रों में ग़ाएब था जो वो हाज़िर था किसी ने रुक के नहीं देखा आदमी की तरफ़ तमाम शहर की शमएँ उसी से रौशन थीं कभी उजाला बहुत था किसी गली की तरफ़ कहीं की भूक हो हर खेत उस का अपना है कहीं की प्यास हो जाएगी वो नदी की तरफ़ न निकले ख़ैर से अल्लामा क़ौल से बाहर 'यगाना' टूट गए जब चले ख़ुदी की तरफ़
Nida Fazli
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राक्षस था न ख़ुदा था पहले आदमी कितना बड़ा था पहले आसमाँ खेत समुंदर सब लाल ख़ून काग़ज़ पे उगा था पहले मैं वो मक़्तूल जो क़ातिल न बना हाथ मेरा भी उठा था पहले अब किसी से भी शिकायत न रही जाने किस किस से गिला था पहले शहर तो बा'द में वीरान हुआ मेरा घर ख़ाक हुआ था पहले
Nida Fazli
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दिन सलीक़े से उगा रात ठिकाने से रही दोस्ती अपनी भी कुछ रोज़ ज़माने से रही चंद लम्हों को ही बनती हैं मुसव्विर आँखें ज़िंदगी रोज़ तो तस्वीर बनाने से रही इस अँधेरे में तो ठोकर ही उजाला देगी रात जंगल में कोई शम्अ' जलाने से रही फ़ासला चाँद बना देता है हर पत्थर को दूर की रौशनी नज़दीक तो आने से रही शहर में सब को कहाँ मिलती है रोने की जगह अपनी इज़्ज़त भी यहाँ हँसने हँसाने से रही
Nida Fazli
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तू क़रीब आए तो क़ुर्बत का यूँँ इज़हार करूँँ आइना सामने रख कर तिरा दीदार करूँँ सामने तेरे करूँँ हार का अपनी एलान और अकेले में तिरी जीत से इनकार करूँँ पहले सोचूँ उसे फिर उस की बनाऊँ तस्वीर और फिर उस में ही पैदा दर-ओ-दीवार करूँँ मिरे क़ब्ज़े में न मिट्टी है न बादल न हवा फिर भी चाहत है कि हर शाख़ समर-बार करूँँ सुब्ह होते ही उभर आती है सालिम हो कर वही दीवार जिसे रोज़ मैं मिस्मार करूँँ
Nida Fazli
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