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दिल-ए-बेताब आफ़त है बला है जिगर सब खा गया अब क्या रहा है हमारा तो है अस्ल-ए-मुद्दआ तू ख़ुदा जाने तिरा क्या मुद्दआ' है मोहब्बत-कुश्ता हैं हम याँ किसू पास हमारे दर्द की भी कुछ दवा है हरम से दैर उठ जाना नहीं ऐब अगर याँ है ख़ुदा वाँ भी ख़ुदा है नहीं मिलता सुख़न अपना किसू से हमारा गुफ़्तुगू का ढब जुदा है कोई है दिल खिंचे जाते हैं ऊधर फ़ुज़ूली है तजस्सुस ये कि क्या है मरूँ मैं इस में या रह जाऊँ जीता यही शेवा मिरा मेहर-ओ-वफ़ा है सबा ऊधर गुल ऊधर सर्व ऊधर उसी की बाग़ में अब तो हवा है तमाशा-कर्दनी है दाग़-ए-सीना ये फूल इस तख़्ते में ताज़ा खिला है हज़ारों उन ने ऐसी कीं अदाएँ क़यामत जैसे इक उस की अदा है जगह अफ़्सोस की है बा'द चंदे अभी तो दिल हमारा भी बजा है जो चुपके हूँ कहे चुपके हो क्यूँँ तुम कहो जो कुछ तुम्हारा मुद्दआ' है सुख़न करिए तो होवे हर्फ़-ज़न यूँँ बस अब मुँह मूँद ले मैं ने सुना है कब उस बेगाना-ख़ू को समझे आलम अगरचे यार आलम-आश्ना है न आलम में है ने आलम से बाहर प सब आलम से आलम ही जुदा है लगा मैं गिर्द सर फिरने तो बोला तुम्हारा 'मीर' साहिब सर-फिरा है

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे शाम हुए ख़ुश-बाश यहाँ के मेरे पास आ जाते हैं मेरे बुझने का नज़्ज़ारा करने आ जाते होंगे वो जो न आने वाला है ना उस से मुझ को मतलब था आने वालों से क्या मतलब आते हैं आते होंगे उस की याद की बाद-ए-सबा में और तो क्या होता होगा यूँँही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे मेरा साँस उखड़ते ही सब बैन करेंगे रोएँगे या'नी मेरे बा'द भी या'नी साँस लिए जाते होंगे

Jaun Elia

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मुझे उदास कर गए हो ख़ुश रहो मिरे मिज़ाज पर गए हो ख़ुश रहो मिरे लिए न रुक सके तो क्या हुआ जहाँ कहीं ठहर गए हो ख़ुश रहो ख़ुशी हुई है आज तुम को देख कर बहुत निखर सँवर गए हो ख़ुश रहो उदास हो किसी की बे-वफ़ाई पर वफ़ा कहीं तो कर गए हो ख़ुश रहो गली में और लोग भी थे आश्ना हमें सलाम कर गए हो ख़ुश रहो तुम्हें तो मेरी दोस्ती पे नाज़ था इसी से अब मुकर गए हो ख़ुश रहो किसी की ज़िन्दगी बनो कि बंदगी मिरे लिए तो मर गए हो ख़ुश रहो

Fazil Jamili

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वो ज़माना गुज़र गया कब का था जो दीवाना मर गया कब का ढूँढ़ता था जो इक नई दुनिया लौट के अपने घर गया कब का वो जो लाया था हम को दरिया तक पार अकेले उतर गया कब का उस का जो हाल है वही जाने अपना तो ज़ख़्म भर गया कब का ख़्वाब-दर-ख़्वाब था जो शीराज़ा अब कहाँ है बिखर गया कब का

Javed Akhtar

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कब पानी गिरने से ख़ुशबू फूटी है मिट्टी को भी इल्म है बारिश झूठी है एक रिश्ते को लापरवाही ले डूबी एक रस्सी ढीली पड़ने पर टूटी है हाथ मिलाने पर भी उस पे खुला नहीं ये उँगली पर ज़ख़्म है या अँगूठी है उस का हँसना ना-मुमकिन था यूँँ समझो सी मेंट की दीवार से कोपल फूटी है हम ने इन पर शे'र नहीं लिक्खे हाफ़ी हम ने इन पेड़ों की इज़्ज़त लूटी है यूँँ लगता है दीन-ओ-दुनिया छूट गए मुझ से तेरे शहर की बस क्या छूटी है

Tehzeeb Hafi

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अब 'मीर'-जी तो अच्छे ज़िंदीक़ ही बन बैठे पेशानी पे दे क़श्क़ा ज़ुन्नार पहन बैठे आज़ुर्दा दिल-ए-उलफ़त हम चुपके ही बेहतर हैं सब रो उठेगी मज्लिस जो कर के सुख़न बैठे उर्यान फिरें कब तक ऐ काश कहीं आ कर ता गर्द बयाबाँ की बाला-ए-बदन बैठे पैकान-ए-ख़दंग उस का यूँँ सीने के ऊधर है जों मार-ए-सियह कोई काढ़े हुए फन बैठे जुज़ ख़त के ख़याल उस के कुछ काम नहीं हम को सब्ज़ी पिए हम अक्सर रहते हैं मगन बैठे शमशीर-ए-सितम उस की अब गो का चले हर-दम शोरीदा-सर अपने से हम बाँध कफ़न बैठे बस हो तो इधर-ऊधर यूँँ फिरने न दें तुझ को नाचार तिरे हम ये देखें हैं चलन बैठे

Meer Taqi Meer

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ख़त लिख के कोई सादा न उस को मलूल हो हम तो हूँ बद-गुमान जो क़ासिद-ए-रसूल हो चाहूँ तो भर के कौली उठा लूँ अभी तुम्हें कैसे ही भारी हो मिरे आगे तो फूल हो सुर्मा जो नूर बख़्शे है आँखों को ख़ल्क़ की शायद कि राह-ए-यार की ही ख़ाक धूल हो जावें निसार होने को हम किस बिसात पर इक नीम जाँ रखें हैं सो वो जब क़ुबूल हो हम इन दिनों में लग नहीं पड़ते हैं सुब्ह-ओ-शाम वर्ना दुआ करें तो जो चाहें हुसूल हो दिल ले के लौंडे दिल्ली के कब का पचा गए अब उन से खाई पी हुई शय किया वसूल हो नाकाम इस लिए हो कि चाहो हो सब कुछ आज तुम भी तो 'मीर' साहिब-ओ-क़िबला अजूल हो

Meer Taqi Meer

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मुस्तूजिब-ए-ज़ुलम-ओ-सितम-ओ-जौर-ओ-जफ़ा हूँ हर-चंद कि जलता हूँ पे सरगर्म-ए-वफ़ा हूँ आते हैं मुझे ख़ूब से दोनों हुनर-ए-इश्क़ रोने के तईं आँधी हूँ कुढ़ने को बला हूँ इस गुलशन-ए-दुनिया में शगुफ़्ता न हुआ मैं हूँ ग़ुंचा-ए-अफ़्सुर्दा कि मर्दूद-ए-सबा हूँ हम-चश्म है हर आबला-ए-पा का मिरा अश्क अज़-बस कि तिरी राह में आँखों से चला हूँ आया कोई भी तरह मिरे चीन की होगी आज़ुर्दा हूँ जीने से मैं मरने से ख़फ़ा हूँ दामन न झटक हाथ से मेरे कि सितमगर हूँ ख़ाक-ए-सर-ए-राह कोई दम में हुआ हूँ दिल ख़्वाह जला अब तो मुझे ऐ शब-ए-हिज्राँ मैं सोख़्ता भी मुंतज़िर-ए-रोज़-ए-जज़ा हूँ गो ताक़त-ओ-आराम-ओ-ख़ोर-ओ-ख़्वाब गए सब बारे ये ग़नीमत है कि जीता तो रहा हूँ इतना ही मुझे इल्म है कुछ मैं हूँ बहर-चीज़ मा'लूम नहीं ख़ूब मुझे भी कि मैं क्या हूँ बेहतर है ग़रज़ ख़ामुशी ही कहने से याराँ मत पूछो कुछ अहवाल कि मर मर के जिया हूँ तब गर्म-ए-सुख़न कहने लगा हूँ मैं कि इक उम्र जूँ शम्अ'' सर-ए-शाम से ता-सुब्ह जला हूँ सीना तो किया फ़ज़्ल-ए-इलाही से सभी चाक है वक़्त-ए-दुआ 'मीर' कि अब दिल को लगा हूँ

Meer Taqi Meer

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तंग आए हैं दिल उस जी से उठा बैठेंगे भूखों मरते हैं कुछ अब यार भी खा बैठेंगे अब के बिगड़ेगी अगर उन से तो इस शहर से जा कसो वीराने में तकिया ही बना बैठेंगे मा'रका गर्म तो टक होने दो ख़ूँ-रेज़ी का पहले तलवार के नीचे हमीं जा बैठेंगे होगा ऐसा भी कोई रोज़ कि मज्लिस से कभू हम तो एक-आध घड़ी उठ के जुदा बैठेंगे जा न इज़हार-ए-मोहब्बत पे हवसनाकों की वक़्त के वक़्त ये सब मुँह को छुपा बैठेंगे देखें वो ग़ैरत-ए-ख़ुर्शीद कहाँ जाता है अब सर-ए-राह दम-ए-सुब्ह से आ बैठेंगे भीड़ टलती ही नहीं आगे से उस ज़ालिम के गर्दनें यार किसी रोज़ कटा बैठेंगे कब तलक गलियों में सौदाई से फिरते रहिए दिल को उस ज़ुल्फ़-ए-मुसलसल से लगा बैठेंगे शोला-अफ़्शाँ अगर ऐसी ही रही आह तो 'मीर' घर को हम अपने कसो रात जला बैठेंगे

Meer Taqi Meer

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कब तलक ये सितम उठाइएगा एक दिन यूँँही जी से जाइएगा शक्ल तस्वीर-ए-बे-ख़ुदी कब तक कसो दिन आप में भी आइएगा सब से मिल चल कि हादसे से फिर कहीं ढूँडा भी तो न पाइएगा न मूए हम असीरी में तो नसीम कोई दिन और बाव खाइएगा कहियेगा उस से क़िस्सा-ए-मजनूँ या'नी पर्दे में ग़म सुनाइएगा उस के पा-बोस की तवक़्क़ो' पर अपने तीं ख़ाक में मिलाइएगा उस के पाँव को जा लगी है हिना ख़ूब से हाथ उसे लगाइएगा शिरकत-शैख़-ओ--ब्रहमन से 'मीर' का'बा-ओ-दैर से भी जाइएगा अपनी डेढ़ ईंट की जद्दी मस्जिद किसी वीराने में बनाइयेगा

Meer Taqi Meer

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