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dil hijr ke dard se bojhal hai ab aan milo to behtar ho is baat se ham ko kya matlab ye kaise ho ye kyunkar ho ik bhiik ke donon kaase hain ik pyaas ke dono pyase hain ham kheti hain tum badal ho ham nadiyan hain tum sagar ho ye dil hai ki jalte siine men ik dard ka phoda allhad sa na gupt rahe na phuut bahe koi marham ho koi nishtar ho ham sanjh samay ki chhaya hain tum chadhti raat ke chandraman ham jaate hain tum aate ho phir mel ki surat kyunkar ho ab husn ka rutba 'aali hai ab husn se sahra khali hai chal basti men banjara ban chal nagri men saudagar ho jis chiiz se tujh ko nisbat hai jis chiiz ki tujh ko chahat hai vo sona hai vo hiira hai vo maati ho ya kankar ho ab 'insha'-ji ko bulana kya ab pyaar ke diip jalana kya jab dhuup aur chhaya ek se hon jab din aur raat barabar ho vo raten chand ke saath gaiin vo baten chand ke saath gaiin ab sukh ke sapne kya dekhen jab dukh ka suraj sar par ho dil hijr ke dard se bojhal hai ab aan milo to behtar ho is baat se hum ko kya matlab ye kaise ho ye kyunkar ho ek bhik ke donon kase hain ek pyas ke dono pyase hain hum kheti hain tum baadal ho hum nadiyan hain tum sagar ho ye dil hai ki jalte sine mein ek dard ka phoda allhad sa na gupt rahe na phut bahe koi marham ho koi nishtar ho hum sanjh samay ki chhaya hain tum chadhti raat ke chandraman hum jate hain tum aate ho phir mel ki surat kyunkar ho ab husn ka rutba 'ali hai ab husn se sahra khali hai chal basti mein banjara ban chal nagri mein saudagar ho jis chiz se tujh ko nisbat hai jis chiz ki tujh ko chahat hai wo sona hai wo hira hai wo mati ho ya kankar ho ab 'insha'-ji ko bulana kya ab pyar ke dip jalana kya jab dhup aur chhaya ek se hon jab din aur raat barabar ho wo raaten chand ke sath gain wo baaten chand ke sath gain ab sukh ke sapne kya dekhen jab dukh ka suraj sar par ho

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए

Yasir Khan

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सुनते हैं फिर छुप छुप उन के घर में आते जाते हो 'इंशा' साहब नाहक़ जी को वहशत में उलझाते हो दिल की बात छुपानी मुश्किल लेकिन ख़ूब छुपाते हो बन में दाना शहर के अंदर दीवाने कहलाते हो बेकल बेकल रहते हो पर महफ़िल के आदाब के साथ आँख चुरा कर देख भी लेते भोले भी बन जाते हो पीत में ऐसे लाख जतन हैं लेकिन इक दिन सब नाकाम आप जहाँ में रुस्वा होगे वाज़ हमें फ़रमाते हो हम से नाम जुनूँ का क़ाएम हम से दश्त की आबादी हम से दर्द का शिकवा करते हम को ज़ख़्म दिखाते हो

Ibn E Insha

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और तो कोई बस न चलेगा हिज्र के दर्द के मारों का सुब्ह का होना दूभर कर दें रस्ता रोक सितारों का झूटे सिक्कों में भी उठा देते हैं ये अक्सर सच्चा माल शक्लें देख के सौदे करना काम है इन बंजारों का अपनी ज़बाँ से कुछ न कहेंगे चुप ही रहेंगे आशिक़ लोग तुम से तो इतना हो सकता है पूछो हाल बेचारों का जिस जिप्सी का ज़िक्र है तुम से दिल को उसी की खोज रही यूँँ तो हमारे शहर में अक्सर मेला लगा निगारों का एक ज़रा सी बात थी जिस का चर्चा पहुँचा गली गली हम गुमनामों ने फिर भी एहसान न माना यारों का दर्द का कहना चीख़ ही उठो दिल का कहना वज़्अ'' निभाओ सब कुछ सहना चुप चुप रहना काम है इज़्ज़त-दारों का 'इंशा' जी अब अजनबियों में चैन से बाक़ी उम्र कटे जिन की ख़ातिर बस्ती छोड़ी नाम न लो उन प्यारों का

Ibn E Insha

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शाम-ए-ग़म की सहर नहीं होती या हमीं को ख़बर नहीं होती हम ने सब दुख जहाँ के देखे हैं बेकली इस क़दर नहीं होती नाला यूँ ना-रसा नहीं रहता आह यूँ बे-असर नहीं होती चाँद है कहकशाॅं है तारे हैं कोई शय नामा-बर नहीं होती दोस्तो इश्क़ है ख़ता लेकिन क्या ख़ता दर-गुज़र नहीं होती रात आ कर गुज़र भी जाती है इक हमारी सहर नहीं होती बे-क़रारी सही नहीं जाती ज़िंदगी मुख़्तसर नहीं होती एक दिन देखने को आ जाते ये हवस उम्र भर नहीं होती हुस्न सब को ख़ुदा नहीं देता हर किसी की नज़र नहीं होती

Ibn E Insha

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हम उन से अगर मिल बैठे हैं क्या दोश हमारा होता है कुछ अपनी जसारत होती है कुछ उन का इशारा होता है कटने लगीं रातें आँखों में देखा नहीं पलकों पर अक्सर या शाम-ए-ग़रीबाँ का जुगनू या सुब्ह का तारा होता है हम दिल को लिए हर देस फिरे इस जिंस के गाहक मिल न सके ऐ बंजारो हम लोग चले हम को तो ख़सारा होता है दफ़्तर से उठे कैफ़े में गए कुछ शे'र कहे कुछ कॉफ़ी पी पूछो जो मआश का 'इंशा'-जी यूँँ अपना गुज़ारा होता है

Ibn E Insha

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जाने तू क्या ढूँढ़ रहा है बस्ती में वीराने में लैला तो ऐ क़ैस मिलेगी दिल के दौलत-ख़ाने में जनम जनम के सातों दुख हैं उस के माथे पर तहरीर अपना आप मिटाना होगा ये तहरीर मिटाने में महफ़िल में उस शख़्स के होते कैफ़ कहाँ से आता है पैमाने से आँखों में या आँखों से पैमाने में किस का किस का हाल सुनाया तू ने ऐ अफ़्साना-गो हम ने एक तुझी को ढूँडा इस सारे अफ़्साने में इस बस्ती में इतने घर थे इतने चेहरे इतने लोग और किसी के दर पे न पहुँचा ऐसा होश दिवाने में

Ibn E Insha

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