दिन के सीने पे शाम का पत्थर एक पत्थर पे दूसरा पत्थर ये सुना था कि देवता है वो मेरे हक़ ही में क्यूँँ हुआ पथर दाएरे बनते और मिटते थे झील में जब कभी गिरा पत्थर अब तो आबाद है वहाँ बस्ती अब कहाँ तेरे नाम का पत्थर हो गए मंज़िलों के सब राही दे रहा है किसे सदा पत्थर सारे तारे ज़मीं पे गिर जाते ज़ोर से मैं जो फेंकता पत्थर नाम ने काम कर दिखाया है सब ने देखा है तैरता पत्थर तू उसे क्या उठाएगा 'आदिल' 'मीर' तक से न उठ सका पत्थर
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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का
Waseem Barelvi
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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जाम सिगरेट कश और बस कुछ धुआँ आख़िरश और बस मौत तक ज़िंदगी का सफ़र रात-दिन कश्मकश और बस पी गया पेड़ आँधी मगर गिर पड़ा खा के ग़श और बस ज़िंदगी जलती सिगरेट है सिर्फ़ दो-चार कश और बस सूखते पेड़ की लकड़ियाँ आख़िरी पेशकश और बस
Sandeep Thakur
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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सफ़र के बा'द भी मुझ को सफ़र में रहना है नज़र से गिरना भी गोया ख़बर में रहना है अभी से ओस को किरनों से पी रहे हो तुम तुम्हें तो ख़्वाब सा आँखों के घर में रहना है हवा तो आप की क़िस्मत में होना लिक्खा था मगर मैं आग हूँ मुझ को शजर में रहना है निकल के ख़ुद से जो ख़ुद ही में डूब जाता है मैं वो सफ़ीना हूँ जिस को भंवर में रहना है तुम्हारे बा'द कोई रास्ता नहीं मिलता तो तय हुआ कि उदासी के घर में रहना है जला के कौन मुझे अब चले किसी की तरफ़ बुझे दिए को तो 'आदिल' खंडर में रहना है
Aadil Raza Mansoori
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रास्ते सिखाते हैं किस से क्या अलग रखना मंज़िलें अलग रखना क़ाफ़िला अलग रखना बअ'द एक मुद्दत के लौट कर वो आया है आज तो कहानी से हादिसा अलग रखना जिस से हम ने सीखा था साथ साथ चलना है अब वही बताता है नक़्श-ए-पा अलग रखना कूज़ा-गर ने जाने क्यूँँ आदमी बनाया है उस को सब खिलौनों से तुम ज़रा अलग रखना लौट कर तो आए हो तजरबों की सूरत है पर मिरी कहानी से फ़ल्सफ़ा अलग रखना तुम तो ख़ूब वाक़िफ़ हो अब तुम्हीं बताओ ना किस में क्या मिलाना है किस से क्या अलग रखना ख़्वाहिशों का ख़म्याज़ा ख़्वाब क्यूँँ भरें 'आदिल' आज मेरी आँखों से रत-जगा अलग रखना
Aadil Raza Mansoori
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