सफ़र के बा'द भी मुझ को सफ़र में रहना है नज़र से गिरना भी गोया ख़बर में रहना है अभी से ओस को किरनों से पी रहे हो तुम तुम्हें तो ख़्वाब सा आँखों के घर में रहना है हवा तो आप की क़िस्मत में होना लिक्खा था मगर मैं आग हूँ मुझ को शजर में रहना है निकल के ख़ुद से जो ख़ुद ही में डूब जाता है मैं वो सफ़ीना हूँ जिस को भंवर में रहना है तुम्हारे बा'द कोई रास्ता नहीं मिलता तो तय हुआ कि उदासी के घर में रहना है जला के कौन मुझे अब चले किसी की तरफ़ बुझे दिए को तो 'आदिल' खंडर में रहना है
Related Ghazal
तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
249 likes
बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
196 likes
ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
190 likes
सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
140 likes
ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी
Ali Zaryoun
102 likes
More from Aadil Raza Mansoori
दिन के सीने पे शाम का पत्थर एक पत्थर पे दूसरा पत्थर ये सुना था कि देवता है वो मेरे हक़ ही में क्यूँँ हुआ पथर दाएरे बनते और मिटते थे झील में जब कभी गिरा पत्थर अब तो आबाद है वहाँ बस्ती अब कहाँ तेरे नाम का पत्थर हो गए मंज़िलों के सब राही दे रहा है किसे सदा पत्थर सारे तारे ज़मीं पे गिर जाते ज़ोर से मैं जो फेंकता पत्थर नाम ने काम कर दिखाया है सब ने देखा है तैरता पत्थर तू उसे क्या उठाएगा 'आदिल' 'मीर' तक से न उठ सका पत्थर
Aadil Raza Mansoori
2 likes
रास्ते सिखाते हैं किस से क्या अलग रखना मंज़िलें अलग रखना क़ाफ़िला अलग रखना बअ'द एक मुद्दत के लौट कर वो आया है आज तो कहानी से हादिसा अलग रखना जिस से हम ने सीखा था साथ साथ चलना है अब वही बताता है नक़्श-ए-पा अलग रखना कूज़ा-गर ने जाने क्यूँँ आदमी बनाया है उस को सब खिलौनों से तुम ज़रा अलग रखना लौट कर तो आए हो तजरबों की सूरत है पर मिरी कहानी से फ़ल्सफ़ा अलग रखना तुम तो ख़ूब वाक़िफ़ हो अब तुम्हीं बताओ ना किस में क्या मिलाना है किस से क्या अलग रखना ख़्वाहिशों का ख़म्याज़ा ख़्वाब क्यूँँ भरें 'आदिल' आज मेरी आँखों से रत-जगा अलग रखना
Aadil Raza Mansoori
1 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Aadil Raza Mansoori.
Similar Moods
More moods that pair well with Aadil Raza Mansoori's ghazal.







