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रास्ते सिखाते हैं किस से क्या अलग रखना मंज़िलें अलग रखना क़ाफ़िला अलग रखना बअ'द एक मुद्दत के लौट कर वो आया है आज तो कहानी से हादिसा अलग रखना जिस से हम ने सीखा था साथ साथ चलना है अब वही बताता है नक़्श-ए-पा अलग रखना कूज़ा-गर ने जाने क्यूँँ आदमी बनाया है उस को सब खिलौनों से तुम ज़रा अलग रखना लौट कर तो आए हो तजरबों की सूरत है पर मिरी कहानी से फ़ल्सफ़ा अलग रखना तुम तो ख़ूब वाक़िफ़ हो अब तुम्हीं बताओ ना किस में क्या मिलाना है किस से क्या अलग रखना ख़्वाहिशों का ख़म्याज़ा ख़्वाब क्यूँँ भरें 'आदिल' आज मेरी आँखों से रत-जगा अलग रखना

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा

Hasan Abbasi

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दिन के सीने पे शाम का पत्थर एक पत्थर पे दूसरा पत्थर ये सुना था कि देवता है वो मेरे हक़ ही में क्यूँँ हुआ पथर दाएरे बनते और मिटते थे झील में जब कभी गिरा पत्थर अब तो आबाद है वहाँ बस्ती अब कहाँ तेरे नाम का पत्थर हो गए मंज़िलों के सब राही दे रहा है किसे सदा पत्थर सारे तारे ज़मीं पे गिर जाते ज़ोर से मैं जो फेंकता पत्थर नाम ने काम कर दिखाया है सब ने देखा है तैरता पत्थर तू उसे क्या उठाएगा 'आदिल' 'मीर' तक से न उठ सका पत्थर

Aadil Raza Mansoori

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सफ़र के बा'द भी मुझ को सफ़र में रहना है नज़र से गिरना भी गोया ख़बर में रहना है अभी से ओस को किरनों से पी रहे हो तुम तुम्हें तो ख़्वाब सा आँखों के घर में रहना है हवा तो आप की क़िस्मत में होना लिक्खा था मगर मैं आग हूँ मुझ को शजर में रहना है निकल के ख़ुद से जो ख़ुद ही में डूब जाता है मैं वो सफ़ीना हूँ जिस को भंवर में रहना है तुम्हारे बा'द कोई रास्ता नहीं मिलता तो तय हुआ कि उदासी के घर में रहना है जला के कौन मुझे अब चले किसी की तरफ़ बुझे दिए को तो 'आदिल' खंडर में रहना है

Aadil Raza Mansoori

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