दिल में भरा ज़-बस-कि ख़याल-ए-शराब था मानिंद आइने के मिरे घर में आब था मौजें करे है बहर-ए-जहाँ में अभी तो तू जानेगा बा'द-ए-मर्ग कि आलम हबाब था उगते थे दस्त-ए-बुलबुल-ओ-दामान गुल बहम सहन-ए-चमन नमूना-ए-यौम-उल-हिसाब था टुक देख आँखें खोल के उस दम की हसरतें जिस दम ये सूझेगी कि ये आलम भी ख़्वाब था दिल जो न था तो रात ज़-ख़ुद-रफ़तगी में 'मीर' गह इंतिज़ार ओ गाह मुझे इज़्तिराब था
Related Ghazal
चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का
Waseem Barelvi
103 likes
सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
140 likes
पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा
Fahmi Badayuni
96 likes
हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते
Rahat Indori
102 likes
इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार' तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए
Khumar Barabankvi
95 likes
More from Meer Taqi Meer
ख़राबी कुछ न पूछो मुलकत-ए-दिल की इमारत की ग़मों ने आज-कल सुनियो वो आबादी ही ग़ारत की निगाह-ए-मस्त से जब चश्म ने इस की इशारत की हलावत मय की और बुनियाद मयख़ाने की ग़ारत की सहर-गह मैं ने पूछा गुल से हाल-ए-ज़ार बुलबुल का पड़े थे बाग़ में यक-मुशत पर ऊधर इशारत की जलाया जिस तजल्ली-ए-जल्वा-गर ने तूर को हम-दम उसी आतिश के पर काले ने हम से भी शरारत की नज़ाकत क्या कहूँ ख़ुर्शीद-रू की कल शब-ए-मह में गया था साए साए बाग़ तक तिस पर हरारत की नज़र से जिस की यूसुफ़ सा गया फिर उस को क्या सूझे हक़ीक़त कुछ न पूछो पीर-ए-कनआँ' की बसारत की तिरे कूचे के शौक़-ए-तौफ़ में जैसे बगूला था बयाबाँ मैं ग़ुबार 'मीर' की हम ने ज़ियारत की
Meer Taqi Meer
0 likes
महर की तुझ से तवक़्क़ो' थी सितमगर निकला मोम समझे थे तिरे दिल को सो पत्थर निकला दाग़ हूँ रश्क-ए-मोहब्बत से कि इतना बेताब किस की तस्कीं के लिए घर से तू बाहर निकला जीते जी आह तिरे कूचे से कोई न फिरा जो सितम-दीदा रहा जा के सो मर कर निकला दिल की आबादी की इस हद है ख़राबी कि न पूछ जाना जाता है कि उस राह से लश्कर निकला अश्क-ए-तर क़तरा-ए-ख़ूँ लख़्त-ए-जिगर पारा-ए-दिल एक से एक अदद आँख से बह कर निकला कुंज-कावी जो की सीने की ग़म-ए-हिज्राँ ने इस दफ़ीने में से अक़साम-ए-जवाहर निकला हम ने जाना था लिखेगा तू कोई हर्फ़ ऐ 'मीर' पर तिरा नामा तो इक शौक़ का दफ़्तर निकला
Meer Taqi Meer
0 likes
मुस्तूजिब-ए-ज़ुलम-ओ-सितम-ओ-जौर-ओ-जफ़ा हूँ हर-चंद कि जलता हूँ पे सरगर्म-ए-वफ़ा हूँ आते हैं मुझे ख़ूब से दोनों हुनर-ए-इश्क़ रोने के तईं आँधी हूँ कुढ़ने को बला हूँ इस गुलशन-ए-दुनिया में शगुफ़्ता न हुआ मैं हूँ ग़ुंचा-ए-अफ़्सुर्दा कि मर्दूद-ए-सबा हूँ हम-चश्म है हर आबला-ए-पा का मिरा अश्क अज़-बस कि तिरी राह में आँखों से चला हूँ आया कोई भी तरह मिरे चीन की होगी आज़ुर्दा हूँ जीने से मैं मरने से ख़फ़ा हूँ दामन न झटक हाथ से मेरे कि सितमगर हूँ ख़ाक-ए-सर-ए-राह कोई दम में हुआ हूँ दिल ख़्वाह जला अब तो मुझे ऐ शब-ए-हिज्राँ मैं सोख़्ता भी मुंतज़िर-ए-रोज़-ए-जज़ा हूँ गो ताक़त-ओ-आराम-ओ-ख़ोर-ओ-ख़्वाब गए सब बारे ये ग़नीमत है कि जीता तो रहा हूँ इतना ही मुझे इल्म है कुछ मैं हूँ बहर-चीज़ मा'लूम नहीं ख़ूब मुझे भी कि मैं क्या हूँ बेहतर है ग़रज़ ख़ामुशी ही कहने से याराँ मत पूछो कुछ अहवाल कि मर मर के जिया हूँ तब गर्म-ए-सुख़न कहने लगा हूँ मैं कि इक उम्र जूँ शम्अ'' सर-ए-शाम से ता-सुब्ह जला हूँ सीना तो किया फ़ज़्ल-ए-इलाही से सभी चाक है वक़्त-ए-दुआ 'मीर' कि अब दिल को लगा हूँ
Meer Taqi Meer
0 likes
हम आप ही को अपना मक़्सूद जानते हैं अपने सिवाए किस को मौजूद जानते हैं इज्ज़-ओ-नियाज़ अपना अपनी तरफ़ है सारा इस मुश्त-ए-ख़ाक को हम मस्जूद जानते हैं सूरत-पज़ीर हम बिन हरगिज़ नहीं वे माने अहल-ए-नज़र हमीं को मा'बूद जानते हैं इश्क़ उन की अक़्ल को है जो मा-सिवा हमारे नाचीज़ जानते हैं ना-बूद जानते हैं अपनी ही सैर करने हम जल्वा-गर हुए थे इस रम्ज़ को व-लेकिन मादूद जानते हैं यारब कसे है नाक़ा हर ग़ुंचा इस चमन का राह-ए-वफ़ा को हम तो मसदूद जानते हैं ये ज़ुल्म-ए-बे-निहायत दुश्वार-तर कि ख़ूबाँ बद-वज़इयों को अपनी महमूद जानते हैं क्या जाने दाब सोहबत अज़ ख़्वेश रफ़्तगाँ का मज्लिस में शैख़-साहिब कुछ कूद जानते हैं मर कर भी हाथ आवे तो 'मीर' मुफ़्त है वो जी के ज़ियान को भी हम सूद जानते हैं
Meer Taqi Meer
0 likes
फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ में सैर जो की हम ने जा-ए-गुल छानी चमन की ख़ाक न था नक़्श-ए-पा-ए-गुल अल्लाह रे अंदलीब की आवाज़-ए-दिल-ख़राश जी ही निकल गया जो कहा उन ने हाए गुल मक़्दूर तक शराब से रख अँखड़ियों में रंग ये चश्मक-ए-प्याला है साक़ी हवा-ए-गुल ये देख सीना दाग़ से रश्क-ए-चमन है याँ बुलबुल सितम हुआ न जो तू ने भी खाए गुल बुलबुल हज़ार जी से ख़रीदार उस की है ऐ गुल-फ़रोश करियो समझ कर बहा-ए-गुल निकला है ऐसी ख़ाक से किस सादा-रू की ये क़ाबिल दुरूद भेजने के है सफ़ा-ए-गुल बारे सरिश्क-ए-सुर्ख़ के दाग़ों से रात को बिस्तर पर अपने सोते थे हम भी बिछाए गुल आ अंदलीब सुल्ह करें जंग हो चुकी ले ऐ ज़बाँ-दराज़ तू सब कुछ सिवाए गुल गुलचीं समझ के चुनियो कि गुलशन में 'मीर' के लख़्त-ए-जिगर पड़े हैं नहीं बर्ग-हा-ए-गुल
Meer Taqi Meer
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Meer Taqi Meer.
Similar Moods
More moods that pair well with Meer Taqi Meer's ghazal.







