दिल मोहब्बत में मुब्तला हो जाए जो अभी तक न हो सका हो जाए तुझ में ये ऐब है कि ख़ूबी है जो तुझे देख ले तिरा हो जाए ख़ुद को ऐसी जगह छुपाया है कोई ढूँढ़े तो लापता हो जाए मैं तुझे छोड़ कर चला जाऊँ साया दीवार से जुदा हो जाए बस वो इतना कहे मुझे तुम से और फिर कॉल मुंक़ता' हो जाए दिल भी कैसा दरख़्त है 'हाफ़ी' जो तिरी याद से हरा हो जाए
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है
Shabeena Adeeb
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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला
Tehzeeb Hafi
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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
Ahmad Faraz
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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे
Tehzeeb Hafi
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अश्क ज़ाया' हो रहे थे देख कर रोता न था जिस जगह बनता था रोना मैं उधर रोता न था सिर्फ़ तेरी चुप ने मेरे गाल गीले कर दिए मैं तो वो हूँ जो किसी की मौत पर रोता न था मुझ पे कितने सानिहे गुज़रे पर उन आँखों को क्या मेरा दुख ये हैं कि मेरा हम सफ़र रोता न था मैं ने उस के वस्ल में भी हिज्र काटा है कहीं वो मेरे काँधे पे रख लेता था सर रोता न था प्यार तो पहले भी उस सेे था मगर इतना नहीं तब मैं उस को छू तो लेता था मगर रोता न था गिर्या-ओ-ज़ारी को भी इक ख़ास मौसम चाहिए मेरी आँखें देख लो मैं वक़्त पर रोता न था
Tehzeeb Hafi
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इक तिरा हिज्र दाइमी है मुझे वर्ना हर चीज़ आरज़ी है मुझे एक साया मिरे तआक़ुब में एक आवाज़ ढूँडती है मुझे मेरी आँखों पे दो मुक़द से हाथ ये अँधेरा भी रौशनी है मुझे मैं सुख़न में हूँ उस जगह कि जहाँ साँस लेना भी शा'इरी है मुझे इन परिंदों से बोलना सीखा पेड़ से ख़ामुशी मिली है मुझे मैं उसे कब का भूल-भाल चुका ज़िंदगी है कि रो रही है मुझे मैं कि काग़ज़ की एक कश्ती हूँ पहली बारिश ही आख़िरी है मुझे
Tehzeeb Hafi
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ख़्वाबों को आँखों से मिन्हा करती है नींद हमेशा मुझ सेे धोखा करती है उस लड़की से बस अब इतना रिश्ता है मिल जाए तो बात वगैरा करती है आवाजों का हब्स अगर बढ़ जाता है ख़ामोशी मुझ में दरवाज़ा करती है बारिश मेरे रब की ऐसी नियमत है रोने में आसानी पैदा करती है सच पूछो तो हाफ़ी ये तन्हाई भी जीने का सामान मुहय्या करती है
Tehzeeb Hafi
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जब उस की तस्वीर बनाया करता था कमरा रंगों से भर जाया करता था पेड़ मुझे हसरत से देखा करते थे मैं जंगल में पानी लाया करता था थक जाता था बादल साया करते करते और फिर मैं बादल पे साया करता था बैठा रहता था साहिल पे सारा दिन दरिया मुझ से जान छुड़ाया करता था बिंत-ए-सहरा रूठा करती थी मुझ से मैं सहरा से रेत चुराया करता था
Tehzeeb Hafi
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सहरा से आने वाली हवाओं में रेत है हिजरत करूँँगा गाँव से गाँव में रेत है ऐ क़ैस तेरे दश्त को इतनी दुआएँ दीं कुछ भी नहीं है मेरी दु'आओं में रेत है सहरा से हो के बाग़ में आ हूँ सैर को हाथों में फूल हैं मिरे पाँव में रेत है मुद्दत से मेरी आँख में इक ख़्वास है मुक़ीम पानी में पेड़ पेड़ की छाँव में रेत है मुझ सा कोई फ़क़ीर नहीं है कि जिस के पास कश्कोल रेत का है सदाओं में रेत है
Tehzeeb Hafi
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