ghazalKuch Alfaaz

दिल सोज़ से ख़ाली है निगह पाक नहीं है फिर इस में अजब क्या कि तू बेबाक नहीं है है ज़ौक़-ए-तजल्ली भी इसी ख़ाक में पिन्हाँ ग़ाफ़िल तू निरा साहिब-ए-इदराक नहीं है वो आँख कि है सुर्मा-ए-अफ़रंग से रौशन पुरकार ओ सुख़न-साज़ है नमनाक नहीं है क्या सूफ़ी ओ मुल्ला को ख़बर मेरे जुनूँ की उन का सर-ए-दामन भी अभी चाक नहीं है कब तक रहे महकूमी-ए-अंजुम में मिरी ख़ाक या मैं नहीं या गर्दिश-ए-अफ़्लाक नहीं है बिजली हूँ नज़र कोह ओ बयाबाँ पे है मेरी मेरे लिए शायाँ ख़स-ओ-ख़ाशाक नहीं है आलम है फ़क़त मोमिन-ए-जाँबाज़ की मीरास मोमिन नहीं जो साहिब-ए-लौलाक नहीं है

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा

Fahmi Badayuni

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वैसे मैं ने दुनिया में क्या देखा है तुम कहते हो तो फिर अच्छा देखा है मैं उस को अपनी वहशत तोहफ़े में दूँ हाथ उठाए जिस ने सहरा देखा है बिन देखे उस की तस्वीर बना लूँगा आज तो मैं ने उस को इतना देखा है एक नज़र में मंज़र कब खुलते हैं दोस्त तू ने देखा भी है तो क्या देखा है इश्क़ में बंदा मर भी सकता है मैं ने दिल की दस्तावेज़ में लिखा देखा है मैं तो आँखें देख के ही बतला दूँगा तुम में से किस किस ने दरिया देखा है आगे सीधे हाथ पे एक तराई है मैं ने पहले भी ये रस्ता देखा है तुम को तो इस बाग़ का नाम पता होगा तुम ने तो इस शहर का नक़्शा देखा है

Tehzeeb Hafi

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अपनी जौलाँ-गाह ज़ेर-ए-आसमाँ समझा था मैं आब ओ गिल के खेल को अपना जहाँ समझा था मैं बे-हिजाबी से तिरी टूटा निगाहों का तिलिस्म इक रिदा-ए-नील-गूँ को आसमाँ समझा था मैं कारवाँ थक कर फ़ज़ा के पेच-ओ-ख़म में रह गया मेहर ओ माह ओ मुश्तरी को हम-इनाँ समझा था मैं इश्क़ की इक जस्त ने तय कर दिया क़िस्सा तमाम इस ज़मीन ओ आसमाँ को बे-कराँ समझा था मैं कह गईं राज़-ए-मोहब्बत पर्दा-दारी-हा-ए-शौक़ थी फ़ुग़ाँ वो भी जिसे ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ समझा था मैं थी किसी दरमाँदा रह-रौ की सदा-ए-दर्दनाक जिस को आवाज़-ए-रहील-ए-कारवाँ समझा था मैं

Allama Iqbal

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ख़िरद के पास ख़बर के सिवा कुछ और नहीं तिरा इलाज नज़र के सिवा कुछ और नहीं हर इक मक़ाम से आगे मक़ाम है तेरा हयात ज़ौक़-ए-सफ़र के सिवा कुछ और नहीं गिराँ-बहा है तो हिफ़्ज़-ए-ख़ुदी से है वर्ना गुहर में आब-ए-गुहर के सिवा कुछ और नहीं रगों में गर्दिश-ए-ख़ूँ है अगर तो क्या हासिल हयात सोज़-ए-जिगर के सिवा कुछ और नहीं उरूस-ए-लाला मुनासिब नहीं है मुझ से हिजाब कि मैं नसीम-ए-सहर के सिवा कुछ और नहीं जिसे कसाद समझते हैं ताजिरान-ए-फ़रंग वो शय मता-ए-हुनर के सिवा कुछ और नहीं बड़ा करीम है 'इक़बाल'-ए-बे-नवा लेकिन अता-ए-शोला शरर के सिवा कुछ और नहीं

Allama Iqbal

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की हक़ से फ़रिश्तों ने 'इक़बाल' की ग़म्माज़ी गुस्ताख़ है करता है फ़ितरत की हिना-बंदी ख़ाकी है मगर इस के अंदाज़ हैं अफ़्लाकी रूमी है न शामी है काशी न समरक़ंदी सिखलाई फ़रिश्तों को आदम की तड़प उस ने आदम को सिखाता है आदाब-ए-ख़ुदावंदी

Allama Iqbal

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हर शय मुसाफ़िर हर चीज़ राही क्या चाँद तारे क्या मुर्ग़ ओ माही तू मर्द-ए-मैदाँ तू मीर-ए-लश्कर नूरी हुज़ूरी तेरे सिपाही कुछ क़द्र अपनी तू ने न जानी ये बे-सवादी ये कम-निगाही दुनिया-ए-दूँ की कब तक ग़ुलामी या राहेबी कर या पादशाही पीर-ए-हरम को देखा है मैं ने किरदार-ए-बे-सोज़ गुफ़्तार वाही

Allama Iqbal

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असर करे न करे सुन तो ले मिरी फ़रियाद नहीं है दाद का तालिब ये बंदा-ए-आज़ाद ये मुश्त-ए-ख़ाक ये सरसर ये वुसअ'त-ए-अफ़्लाक करम है या कि सितम तेरी लज़्ज़त-ए-ईजाद ठहर सका न हवा-ए-चमन में ख़ेमा-ए-गुल यही है फ़स्ल-ए-बहारी यही है बाद-ए-मुराद क़ुसूर-वार ग़रीब-उद-दयार हूँ लेकिन तिरा ख़राबा फ़रिश्ते न कर सके आबाद मिरी जफ़ा-तलबी को दुआएँ देता है वो दश्त-ए-सादा वो तेरा जहान-ए-बे-बुनियाद ख़तर-पसंद तबीअत को साज़गार नहीं वो गुल्सिताँ कि जहाँ घात में न हो सय्याद मक़ाम-ए-शौक़ तिरे क़ुदसियों के बस का नहीं उन्हीं का काम है ये जिन के हौसले हैं ज़ियाद

Allama Iqbal

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