dukh apna agar ham ko batana nahin aata tum ko bhi to andaza lagana nahin aata pahuncha hai buzurgon ke bayanon se jo ham tak kya baat hui kyuun vo zamana nahin aata main bhi use khone ka hunar siikh na paaya us ko bhi mujhe chhod ke jaana nahin aata is chhote zamane ke bade kaise banoge logon ko jab aapas men ladana nahin aata dhundhe hai to palkon pe chamakne ke bahane aansu ko miri aankh men aana nahin aata tarikh ki ankhon men dhuan ho gae khud hi tum ko to koi ghar bhi jalana nahin aata dukh apna agar hum ko batana nahin aata tum ko bhi to andaza lagana nahin aata pahuncha hai buzurgon ke bayanon se jo hum tak kya baat hui kyun wo zamana nahin aata main bhi use khone ka hunar sikh na paya us ko bhi mujhe chhod ke jaana nahin aata is chhote zamane ke bade kaise banoge logon ko jab aapas mein ladana nahin aata dhundhe hai to palkon pe chamakne ke bahane aansu ko meri aankh mein aana nahin aata tarikh ki aankhon mein dhuan ho gae khud hi tum ko to koi ghar bhi jalana nahin aata
Related Ghazal
सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
140 likes
हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते
Rahat Indori
102 likes
हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए
Yasir Khan
92 likes
ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी
Ali Zaryoun
102 likes
किसी लिबास की ख़ुशबू जब उड़ के आती है तेरे बदन की जुदाई बहुत सताती है तेरे गुलाब तरसते हैं तेरी ख़ुशबू को तेरी सफ़ेद चमेली तुझे बुलाती है तेरे बग़ैर मुझे चैन कैसे पड़ता हैं मेरे बगैर तुझे नींद कैसे आती है
Jaun Elia
113 likes
More from Waseem Barelvi
अपने साए को इतना समझाने दे मुझ तक मेरे हिस्से की धूप आने दे एक नज़र में कई ज़माने देखे तो बूढ़ी आँखों की तस्वीर बनाने दे बाबा दुनिया जीत के मैं दिखला दूँगा अपनी नज़र से दूर तो मुझ को जाने दे मैं भी तो इस बाग़ का एक परिंदा हूँ मेरी ही आवाज़ में मुझ को गाने दे फिर तो ये ऊँचा ही होता जाएगा बचपन के हाथों में चाँद आ जाने दे फ़स्लें पक जाएँ तो खेत से बिछ्ड़ेंगी रोती आँख को प्यार कहाँ समझाने दे
Waseem Barelvi
7 likes
भला ग़मों से कहाँ हार जाने वाले थे हम आँसुओं की तरह मुस्कुराने वाले थे हमीं ने कर दिया ऐलान-ए-गुमरही वर्ना हमारे पीछे बहुत लोग आने वाले थे उन्हें तो ख़ाक में मिलना ही था कि मेरे थे ये अश्क कौन से ऊँचे घराने वाले थे उन्हें क़रीब न होने दिया कभी मैं ने जो दोस्ती में हदें भूल जाने वाले थे मैं जिन को जान के पहचान भी नहीं सकता कुछ ऐसे लोग मिरा घर जलाने वाले थे हमारा अलमिया ये था कि हम-सफ़र भी हमें वही मिले जो बहुत याद आने वाले थे 'वसीम' कैसी तअल्लुक़ की राह थी जिस में वही मिले जो बहुत दिल दुखाने वाले थे
Waseem Barelvi
5 likes
लहू न हो तो क़लम तर्जुमाँ नहीं होता हमारे दौर में आँसू ज़बाँ नहीं होता जहाँ रहेगा वहीं रौशनी लुटाएगा किसी चराग़ का अपना मकाँ नहीं होता ये किस मक़ाम पे लाई है मेरी तन्हाई कि मुझ से आज कोई बद-गुमाँ नहीं होता बस इक निगाह मिरी राह देखती होती ये सारा शहर मिरा मेज़बाँ नहीं होता तिरा ख़याल न होता तो कौन समझाता ज़मीं न हो तो कोई आसमाँ नहीं होता मैं उस को भूल गया हूँ ये कौन मानेगा किसी चराग़ के बस में धुआँ नहीं होता 'वसीम' सदियों की आँखों से देखिए मुझ को वो लफ़्ज़ हूँ जो कभी दास्ताँ नहीं होता
Waseem Barelvi
2 likes
सभी का धूप से बचने को सर नहीं होता हर आदमी के मुक़द्दर में घर नहीं होता कभी लहू से भी तारीख़ लिखनी पड़ती है हर एक मा'रका बातों से सर नहीं होता मैं उस की आँख का आँसू न बन सका वर्ना मुझे भी ख़ाक में मिलने का डर नहीं होता मुझे तलाश करोगे तो फिर न पाओगे मैं इक सदा हूँ सदाओं का घर नहीं होता हमारी आँख के आँसू की अपनी दुनिया है किसी फ़क़ीर को शाहों का डर नहीं होता मैं उस मकान में रहता हूँ और ज़िंदा हूँ 'वसीम' जिस में हवा का गुज़र नहीं होता
Waseem Barelvi
3 likes
मुझे तो क़तरा ही होना बहुत सताता है इसी लिए तो समुंदर पे रहम आता है वो इस तरह भी मिरी अहमियत घटाता है कि मुझ से मिलने में शर्तें बहुत लगाता है बिछड़ते वक़्त किसी आँख में जो आता है तमाम उम्र वो आँसू बहुत रुलाता है कहाँ पहुँच गई दुनिया उसे पता ही नहीं जो अब भी माज़ी के क़िस्से सुनाए जाता है उठाए जाएँ जहाँ हाथ ऐसे जलसे में वही बुरा जो कोई मसअला उठाता है न कोई ओहदा न डिग्री न नाम की तख़्ती मैं रह रहा हूँ यहाँ मेरा घर बताता है समझ रहा हो कहीं ख़ुद को मेरी कमज़ोरी तो उस से कह दो मुझे भूलना भी आता है
Waseem Barelvi
4 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Waseem Barelvi.
Similar Moods
More moods that pair well with Waseem Barelvi's ghazal.







