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duur kyuun jaun yahin jalva-numa baitha hai dil mira arsh hai aur us pe khuda baitha hai but-kade men tire jalve ne tarashe patthar jis ne dekha yahi jaana ki khuda baitha hai kya hue aankh ke parde jo pade the ab tak barmala hashr men kyuun aaj khuda baitha hai naqsh-e-vahdat hi suvaida ko kaha karte hain dil men ik til hai aur us til men khuda baitha hai main jo kahta huun ki kaabe ko na barbad karo hans ke but kahte hain kya dil men khuda baitha hai asman main tiri gardish se nahin darta huun tujh ko kis baat ka ghham sar pe khuda baitha hai chashm-e-vahdat se jo insan zara ghhaur kare jis ko dekhe yahi samjhe ki khuda baitha hai apne marne ka zara ghham na karo tum 'muztar' yuun samajh lo ki jilane ko khuda baitha hai dur kyun jaun yahin jalwa-numa baitha hai dil mera arsh hai aur us pe khuda baitha hai but-kade mein tere jalwe ne tarashe patthar jis ne dekha yahi jaana ki khuda baitha hai kya hue aankh ke parde jo pade the ab tak barmala hashr mein kyun aaj khuda baitha hai naqsh-e-wahdat hi suwaida ko kaha karte hain dil mein ek til hai aur us til mein khuda baitha hai main jo kahta hun ki kabe ko na barbaad karo hans ke but kahte hain kya dil mein khuda baitha hai aasman main teri gardish se nahin darta hun tujh ko kis baat ka gham sar pe khuda baitha hai chashm-e-wahdat se jo insan zara ghaur kare jis ko dekhe yahi samjhe ki khuda baitha hai apne marne ka zara gham na karo tum 'muztar' yun samajh lo ki jilane ko khuda baitha hai

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किसी लिबास की ख़ुशबू जब उड़ के आती है तेरे बदन की जुदाई बहुत सताती है तेरे गुलाब तरसते हैं तेरी ख़ुशबू को तेरी सफ़ेद चमेली तुझे बुलाती है तेरे बग़ैर मुझे चैन कैसे पड़ता हैं मेरे बगैर तुझे नींद कैसे आती है

Jaun Elia

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बस इक निगाह-ए-नाज़ को तरसा हुआ था मैं हालांकि शहर-शहर में फैला हुआ था मैं मुद्दत के बा'द आइना देखा तो रो पड़ा किस बेहतरीन दोस्त से रूठा हुआ था मैं पहना जो रेनकोट तो बारिश नहीं हुई लौटा जो घर तो शर्म से भीगा हुआ था मैं पहले भी दी गई थी मुझे बज़्म की दुआ पहले भी इस दुआ पे अकेला हुआ था मैं कितनी अजीब बात है ना! तू ही आ गया! तेरे ही इंतिज़ार में बैठा हुआ था मैं

Zubair Ali Tabish

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे शाम हुए ख़ुश-बाश यहाँ के मेरे पास आ जाते हैं मेरे बुझने का नज़्ज़ारा करने आ जाते होंगे वो जो न आने वाला है ना उस से मुझ को मतलब था आने वालों से क्या मतलब आते हैं आते होंगे उस की याद की बाद-ए-सबा में और तो क्या होता होगा यूँँही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे मेरा साँस उखड़ते ही सब बैन करेंगे रोएँगे या'नी मेरे बा'द भी या'नी साँस लिए जाते होंगे

Jaun Elia

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जिस शाम उस को ट्रेन में बैठा के आया था मैं उस को उस के प्यार से मिलवा के आया था उस की बसी बसाई मैं दुनिया उजाड़ कर जो खा नहीं सका उसे फैला के आया था मेरे नसीब में कहीं बैठा तुम्हारा दुख लगता था जैसे माँ की क़सम खा के आया था

Kushal Dauneria

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न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का क़रार हूँ किसी काम में जो न आ सके मैं वो एक मुश्त-ए-ग़ुबार हूँ न दवा-ए-दर्द-ए-जिगर हूँ मैं न किसी की मीठी नज़र हूँ मैं न इधर हूँ मैं न उधर हूँ मैं न शकेब हूँ न क़रार हूँ मिरा वक़्त मुझ से बिछड़ गया मिरा रंग-रूप बिगड़ गया जो ख़िज़ाँ से बाग़ उजड़ गया मैं उसी की फ़स्ल-ए-बहार हूँ पए फ़ातिहा कोई आए क्यूँँ कोई चार फूल चढ़ाए क्यूँँ कोई आ के शम्अ'' जलाए क्यूँँ मैं वो बेकसी का मज़ार हूँ न मैं लाग हूँ न लगाव हूँ न सुहाग हूँ न सुभाव हूँ जो बिगड़ गया वो बनाव हूँ जो नहीं रहा वो सिंगार हूँ मैं नहीं हूँ नग़्मा-ए-जाँ-फ़ज़ा मुझे सुन के कोई करेगा क्या मैं बड़े बिरोग की हूँ सदा मैं बड़े दुखी की पुकार हूँ न मैं 'मुज़्तर' उन का हबीब हूँ न मैं 'मुज़्तर' उन का रक़ीब हूँ जो बिगड़ गया वो नसीब हूँ जो उजड़ गया वो दयार हूँ

Muztar Khairabadi

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